नक्सलवाद : अभी शेष हैं कुछ चुनौतियां
देश के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलियों की कमर तोड़ने में अभूतपूर्व और उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि भारत अभी पूरी तरह नक्सलवाद मुक्त हुआ है। हां, सरकार की कोशिशें सराहनीय हैं। आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के कुछ ज़िलों में नक्सली गतिविधियां बनी हो सकती हैं। फरवरी 2026 तक नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर 6-7 रह गई थी, मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र (बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर) में। वहीं, मार्च 2026 के अंत में सुकमा में नक्सली मुठभेड़ हुई, जहां एक नक्सली मारा गया।
गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि नक्सलवाद लगभग समाप्ति की कगार पर है, लेकिन औपचारिक घोषणा प्रक्रिया पूरी होने पर होगी। सरकारी दावा करते हुए अमित शाह ने 30 मार्च, 2026 को लोकसभा में कहा कि ‘देश नक्सल मुक्त हो चुका है और नक्सलवाद विलुप्ति की ओर है।’ 31 मार्च, 2026 की समय-सीमा के ठीक पहले भी कार्रवाइयां चल रही थीं, जिसमें सैकड़ों नक्सली मारे गए या आत्म-समर्पण कर चुके हैं। फिर भी बस्तर जैसे क्षेत्रों में सीमित गतिविधियां जारी प्रतीत हो रही हैं। प्रगति के आंकड़े बताते हैं कि नक्सल प्रभावित जिले 126 (2010) से घटकर 6-7 (2026) पर पहुंच गए और ज्यादातर नक्सली मारे गए। 700 से अधिक तो हाल के वर्षों में। आत्म-समर्पण करने वाले 4,800 से अधिक नक्सली दूसरे धंधों में जुड़ चुके हैं। बहरहाल, नक्सलवाद बहुत कमजोर हो चुका है। भारत में नक्सल प्रभावित 6 जिलों की स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है, जहां सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं। ये जिले मुख्यत: छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में केंद्रित हैं।
सबसे अधिक प्रभावित 6 ज़िले हैं। छत्तीसगढ़ के बीजापुर, कांकेर/नारायणपुर, नारायणपुर, सुकमा। झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम। महाराष्ट्र का गढ़चिरौली। इनमें नक्सली गतिविधियां सीमित लेकिन सक्रिय हैं, जैसे छिपे हुए कैंप और छोटे हमले। सुरक्षा बलों ने हाल के ऑपरेशनों से इन क्षेत्रों में घुसपैठ बढ़ाई है। जहां तक वर्तमान अभियान की बात है तो छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और गरियाबंद (कभी-कभी सूचीबद्ध) में हाई-अलर्ट सर्च ऑपरेशन चल रहे हैं। सरकार ने अंतिम बड़े अभियान की तैयारी की है, जिसमें आत्म-समर्पण और मुठभेड़ पर ज़ोर है। मार्च 2026 तक हिंसा में भारी कमी आई लेकिन पूर्ण नियंत्रण बाकी है। वहीं प्रगति संकेत यह है कि नक्सली संख्या घटी, सैकड़ों आत्म-समर्पण हुए। विकास परियोजनाएं शुरू हुइ—जैसे सड़कें और स्कूल।
लिहाजा, 31 मार्च, 2026 की समय-सीमा के बाद भी इन जिलों पर फोकस रहेगा। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने नक्सल प्रभावित उक्त 6 जिलों को नक्सल मुक्त करने के लिए बहु आयामी रणनीति अपनाई है।
सुरक्षा बलों ने इन ज़िलों में सघन सर्च ऑपरेशन तेज़ कर दिए हैं, जैसे कुर्रेगुट्टालू पहाड़ मॉडल पर आधारित लंबे अभियान। नक्सलियों के सहयोगी नेटवर्क को निशाना बनाया जा रहा है, साथ ही 576 मजबूत पुलिस स्टेशन और 336 नए कैंप स्थापित किए गए। मुठभेड़ और घेराबंदी से नक्सली कमांडरों को खत्म करने पर ध्यान केन्द्रित है।
वहीं नक्सलियों के आत्म-समर्पण और पुनर्वास पर बल दिया गया है। नक्सलियों के आत्म-समर्पण को प्रोत्साहित करने के लिए उदार नीति लागू है, जिसमें वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और रोज़गार दिया जाता है। हाल के वर्षों में हज़ारों नक्सली आत्म-समर्पण कर चुके हैं। पकड़े गए या आत्म-समर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए कौशल विकास केंद्र खोले जा रहे हैं। विकास पहल तेज़ है। इन जिलों में 137 केंद्र योजनाओं का तेज़ वितरण, सड़कें, स्कूल, अस्पताल और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित हो रहे। एसआरई योजना के तहत क्षमता निर्माण जारी रहेगा ताकि नक्सलवाद न लौटे। 10-नुकाती योजना में वित्तीय सहायता प्रणाली तोड़ना और स्थानीय विकास शामिल है।
फिर भी अपेक्षित लक्षय पूरा होनाअभी बाकी है। सरकार ने ठीक ही कहा है कि 31 मार्च, 2026 के बाद अर्बन नक्सल पर नज़र रखी जाएगी। ये प्रयास नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने के करीब हैं, लेकिन जंगलों में छिटपुट चुनौतियां बाकी हैं। (युवराज)



