सहज संचार के स्वामी सुरजीत पातर
कदी बंदियां दे वांग सानूं मिलिया वी कर
एैवैं लंघ जानै, पानी कदे ’वा बन के।
उपरोक्त शब्दों वाले सुरजीत पातर 11 मई, 2024 को हमेशा के लिए अलविदा कह गए थे। उनकी अप्रकाशित रचनाएं ‘रब, रोटी, भाषा ते राग’ लोकगीत प्रकाशन मोहाली ने एक खूबसूरत जिल्द के साथ (पृष्ठ 190, कीमत 350 रुपये) जारी करके प्रशंसा प्राप्त की है। इसके पहले 22 पृष्ठ रब व रोटी की बात करते हुए पातर के शब्दों की प्रशंसा करते हैं और इनके स्वागत में लिखे उनके पीछे रह गई उनकी जीवन साथी भूपिंदर पातर के ‘उदास बोल’ लेखक के विनम्रता वाले सहज संचार एवं स्वभाव को निम्नलिखित शब्दों से उजागर करते हैं:—
‘पातर साहिब कवि थे और वह अपने भीतर के कवि से कभी दूर नहीं होते थे। लेकिन वह घर में कभी कवि पति या कवि पिता नहीं बनते थे, बल्कि पति कवि और पिता कवि ही होते थे। इसीलिए उनके अचानक चले जाने को मैं तथा मेरे बच्चे अपने निजी घाटे के रूप में तो महसूस करते ही हैं, परन्तु सारे सांस्कृतिक घाटे को भी समझते हैं। लेकिन किसी रिश्ते, शख्सियत और हस्ती के चले जाने की कमी कभी पूरी नहीं होती। इसीलिए जब तक पंजाब अपने-आप से जुड़ा रहेगा, तब तक यह कविता से भी जुड़ा रहेगा। जब तक यह कविता से जुड़ा रहेगा, तब तक यह पातर साहिब से भी जुड़ा रहेगा, क्योंकि पातर, कविता और पंजाब को अलग करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि ये तीनों ही एक-दूसरे का अटूट हिस्सा हैं।’
वह बहुत ही विनम्र थे। हर बात कहने का उनका अपना अंदाज़ होता था, लेकिन उनका सुनने का अंदाज़ भी अपना ही था। वह दूसरों की बात को ऐसे सुनते थे, जैसे वह कविता बोल रहा हो और वह खुद सिर्फ श्रोता हों। उनमें कवि होने या कविता का ज़रा भी अहं नहीं था। वह इतनी जल्दी अपनी कविता नहीं सुनाते थे और दूसरों की कविता बहुत ध्यान से सुनते थे। यहां तक कि उनका प्रशंसा करने का अंदाज़ भी अपना ही था। उनके लिए कोई बड़ा-छोटा नहीं होता था। उनके लिए बड़े -छोटे में बस इतना ही अंतर था कि वह बड़े का सम्मान करते थे और छोटे से प्यार करते थे।
सुरजीत पातर के मीठे शब्दों का आनंद मैंने भी लिया है। वह 1977-78 में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में मेरे सहकर्मी थे। हालांकि हमारे कामकाज के विभाग अलग-अलग थे। निम्नलिखित धारणाओं तथा भावनाओं को ताज़ा रचना में जो शब्द रूप दिया गया है, इसके समय एवं स्थिति बारे मुझे कोई जानकारी नहीं। इसके अस्तित्व को सही मानते हुए मैं बेहद संतुष्ट हूं।
कुदरत दे बलिहार गिया मैं,
गिया ना उस तों पार।
साडे पुरखियां दा तूं रब हैं,
साडा वी कुछ लगदैं।
रचना हैं जां रचनहार हैं,
इक रहस्स जिहा लगदैं।
़खौफनाक नंगी असलीयत,
आसां दे संग कज्जदैं।
हे जी नामदेव दे बीठल,
हे रविदास दे माधो।
हे जी राजा रंक दे राखे,
आम खास दे माधो।
हे जी मेरे ़खौफ ़खुदाई,
सुपन आस दे माधो।
हे ईसा दे परम पिता,
तेरा पुत्तर सूली चढ़िया।
अंबर गुंबद हेठां किल्लां,
मूरत वांगूं जड़िया।
रत्त-भिज्जा चन्न सूलीओं लत्था,
फुल्ल डाली तों झड़िया।
याद है तैनूं इक दिन बुल्ला,
तेरे दर ’ते आ के।
आखण लग्गा लुक ना,
मेरे भाईयां नूं मरवा के।
इक नूं सूली चाढ़़िया,
दूजा मारिया खल्ल लुहा के।
ओह जो नानक जी ने तै,
सवाल सी इक दिन पाया।
ऐती मार पई कुरलाणे,
तैं की दर्द न आया।
तैं जी फिर कोई उत्तर दित्ता,
तैं जी कुछ फरमाया।
शायद नानक जी नूं होवे,
तूं कुझ इयों फरमाया।
तूं ही तां ओह दर्द हैं
नानक जो मेरे मन आया।
तूं ही मेरी अनंत चुप नूं,
गाऊंदा कावि बनाया।
तेरे वरगे जाएयां बाझों
औत रहे करतार।
मैं तो स्वर्गवासी पातर की आज्ञा से नई पुस्तक के नाम को आगे-पीछे करके राग, भाषा, रोटी तथा रब कह कर भी खुश हूं। इसलिए कि मनुष्य जन्म लेने के बाद पहले रोता है, फिर भाषा के माध्यम से रोटी मांगता है, और वह भी रब से। नवजात मनुष्य की इस भावना को भूपिन्द्र तथा सुरजीत पातर के बेटे अंकुर ने आस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन शहर में रह कर अपनी डिजिटल चित्रकारी के ज़रिये उजागर किया है। प्रकाशक ने अपनी किस्म के सरवरक को चांद-तारों से रौशन किया है।
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