विश्व प्रसिद्ध है चमोली स्थित फूलों की घाटी
जैसे ही गोविंद घाट पर उतरा तो सुबह के दस बज चुके थे। मैं इधर-उधर देखने लगा। मेरी नज़र एक साइन पोस्ट पर पड़ी। लिखा था- फूलों की घाटी: 16 किमी; हेमकुंड साहिब: 19 किमी। उत्तराखंड के चमोली ज़िले में स्थित फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह 87 वर्ग किमी में फैली एक ऊंचाई पर स्थित हिमालयी घाटी है, जो सैंकड़ों प्रकार के अल्पाइन जंगली फूलों, विदेशी आर्किड और पोस्त के फूलों के लिए विख्यात है। जून से अक्तूबर तक खुला रहने वाला यह उद्यान, जुलाई के मध्य से अगस्त के मध्य तक अपने चरम पर होता है, जो एक जीवंत और मनोरम ट्रेकिंग अनुभव प्रदान करता है। इससे आपने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि मैं पिछले साल अपनी अगस्त के पहले सप्ताह की यात्रा के बारे में बता रहा हूं।
बहरहाल, साइन बोर्ड को पढ़ते ही जहां मेरे मन में मखदूम की पंक्ति ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’ गूंजने लगी, वहीं मुझे बचपन के वे दिन भी याद आ गये जब मैंने फ्रैंक स्मिथ की ‘द वैली ऑ़फ फ्लावर्स’ (फूलों की घाटी) पढ़ी थी। इस किताब ने मुझे इतना प्रभावित किया था कि मैं अक्सर जागते में भी यह सपने देखता कि मैं घाटी में घूम रहा हूं, जहां हर रंग व खुश्बू के फूल खिल रहे हैं। हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही है, वह अपने साथ फूलों की सुगंध ला रही है, जो मेरे बदन को स्पर्श करते हुए जा रही है। यह सपना मैं अब भी देख लेता हूं और अब मात्र 16 किमी का सफर तय करके मेरा सपना साकार हो सकता था। पहाड़ी पर चढ़ता हुआ 13 किमी का पतला सा रास्ता मुझे एक छोटे से सोते हुए गांव गंगरिया ले गया। यहां से सड़क दो फाड़ हो रही थी- 3 किमी बाएं का ट्रैक फूलों की घाटी ले जाता है और 6 किमी दाएं का ऊबड़-खाबड़ रास्ता हेमकुंड साहिब ले जाता है।
मैंने अपना लगेज गोविंद घाट गुरुद्वारे के क्लॉक रूम में रखा और छोटा सा बैग लेकर अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। गुरद्वारे से कुछ सौ मीटर के फासले पर एक पतली सी नदिया पर एक पुराना पुल बना है, जिसके दूसरी तरफ से सड़क निरंतर पतली होती जाती है। इस सड़क के एक तरफ हिमालय है और दूसरी तरफ गहरी घाटी। सुंदर नज़ारे को देखते हुए मैं कुछ सौ मीटर ही चला होउंगा कि मैंने एक बुज़ुर्ग को छड़ी बेचते हुए देखा उन यात्रियों को जो फूलों की घाटी व हेमकुंड साहिब जा रहे थे। मैं उन बुजुर्ग के पास पहुंचा तो वह बोले, ‘सर, एक छड़ी खरीद लीजिए। यह ट्रैकिंग में बहुत काम आयेगी। कीमत सिर्फ पंद्रह रूपये है। लेकिन जब आप गोबिंद घाट को लौट रहे हों तो कृपया छड़ी वापस कर देना, मैं आपको 5 रूपये लौटा दूंगा।’
हालांकि मुझे प्रस्ताव अच्छा लगा, कुछ अजीब सा भी, लेकिन मैंने बिना कुछ कहे छड़ी खरीद ली। उन्होंने फिर कहा, ‘कृपया, छड़ी वापस करना न भूलें। मैं याद से आपको पांच रूपये लौटा दूंगा।’ मैंने यह सुनते हुए मुड़कर देखा, और उन बुज़ुर्ग को यकीन दिलाने वाली मुस्कान दी। उन शानदार व अति सुंदर फूलों के बीच जो अनुभव हुआ वह इस दुनिया से बाहर का था, अलौकिक था। उसे व्यक्त करने के लिए 250 पन्नों की पुस्तक भी अपर्याप्त होती। मैंने गंगरिया में दो जादुई रातें गुज़रीं। ट्रैक पर छड़ी बहुत भरोसेमंद साथी साबित हुई। उसके मज़बूत सहारे ने मुझे दर्द व परेशानी से सुरक्षित रखा। तीसरे दिन जब मैं गोविंद घाट लौटा तो मैंने बुज़ुर्ग को उसी जगह पर पाया। छड़ी को उनके सामने चटाई पर रखते हुए मैंने कहा, ‘यह रही आपकी छड़ी।’ उन्होंने मेरी तरफ पांच रूपये का सिक्का बढ़ाते हुए, एहसान की मुद्रा में कहा, ‘बहुत, बहुत शुक्रिया।’ मैंने उनसे कहा कि पैसा वह अपने पास ही रख लें। दरअसल, मेरी दिलचस्पी यह जानने में अधिक थी कि वह सभी यात्रियों से छड़ी लौटने के लिए क्यों कहते हैं? ‘सर, कारण बहुत साधरण है। अगर लोग छड़ी लौटा देते हैं, तो एक ही छड़ी बहुत सारे यात्रियों के काम आ सकती है,’ उन्होंने समझाते हुए कहा और अपनी बात को जारी रखते हुए बोले, ‘सर, यह छड़ी लेने के लिए मुझे वन में बहुत अंदर तक जाना पड़ता है। छड़ी लेने का अर्थ है किसी पेड़ का एक अंग काटना, जिससे मुझे अपराधबोध होता है। मुझे अधिक पैसा नहीं चाहिए।
मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि लोग ज्यादा समझदार बनें। बहुत लोग मुझसे छड़ी खरीदते हैं, लेकिन जब वापस लौटते में उन्हें इसकी ज़रुरत नहीं होती तो उसे घाटी में फेंक देते हैं। मैं जब उनसे छड़ी के बारे में मालूम करता हूं तो सभी का उत्तर समान होता है- ‘आप चिंता क्यों कर रहे हैं? क्या मैंने आपको पैसे नहीं दिए थे?’ यह कितने दु:ख की बात है कि जब हमें जीवन में किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं रहती तो हम उसे फेंक देते हैं बिना यह सोचे कि वह किसी और के काम आ सकती है। देखो, ऐसा करने से हम प्रकृति को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं। थोड़ा सा अधिक हमदर्द होने से हम एक-दूसरे का समय, पैसा व ऊर्जा बचा सकते हैं, लेकिन यह बात मैं हर किसी को किस तरह समझाऊं?’ उन बुज़ुर्ग से बात करते हुए मैंने महसूस किया कि ज़रूरी नहीं है कि ज्ञान व जागृति धर्मस्थलों के दर्शन करने से ही हासिल होते हों। हर जगह ज्ञान बिखरा हुआ है-लोगों में, पेड़ पौधे व वादियों में, जानवरों में-बस अपने आंख, कान व दिमाग को खुला रखने की आवश्यकता है।
बहरहाल, जब जुलाई से सितम्बर तक मानसून की बारिश घाटी को एक हरे-भरे, रंगीन समा में बदल देती है, तो वह अलौकिक प्रतीत होती है। नंदा देवी जैव मंडल अभयारण्य के भीतर स्थित इस पार्क में जो बेमिसाल वनस्पतियां, रोडोडेंड्रोन के जंगल व झरने हैं, वो इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। अगर आपकी दिलचस्पी ट्रैकिंग में है, तो यहां मध्यम स्तर का 6 दिवसीय ट्रैक (लगभग 38 किमी) है जो गोविंद घाट से शुरू होता है और घांघरिया से होकर गुज़रता है, जो बेस कैंप के रूप में भी काम करता है। इस ट्रैक का महत्व इस लिहाज़ से भी है क्योंकि यह हेमकुंड साहिब की पवित्र, उच्च ऊंचाई वाली झील और गुरुद्वारे (14,000 फीट से अधिक) से जोड़ता है। फूलों के अतिरिक्त यह पार्क हिम तेंदुए और हिमालयी कस्तूरी हिरण जैसी दुर्लभ प्रजातियों का भी घर है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





