रुक जाओ न मंगला!
तड़प ही तो उठी थी मंगला। फोन पर मिलने वाली सूचना ही ऐसी थी। रिसीवर उसके हाथ से छूटता इससे पहले ही उसने उसे मजबूती से पकड़ लिया।
‘...यह कैसे हुआ?’ एक दबी-दबी सी चीख उसके गले में फंसकर रह गई। उधर से क्या जवाब आया, उसे कुछ भी तो सुनाई नहीं दिया था। मरे-मरे हाथों से रिसीवर रख कर वह धम्म से सोफे में धंस गई। आंसू थे कि किसी अनचाहे अतिथि की भांति उमड़े चले आ रहे थे। उसने मन ही मन प्रार्थना की, ‘हे प्रभु, उन्हें मेरी भी उम्र लग जाये।’ दोनों आंखों से आंसू बह-बह कर उसके ब्लाउज़ को भिगोने लगे थे। यह स्थिति जाने कब तक रहती कि फोन फिर बज उठा, लेकिन इस बार किसी से नम्बर गलत लग गया था।
उसने हिम्मत करके हाथ मुंह धो कर आल्मारी से दो चार कपड़े निकाले और उन्हें बैग में डालकर, बैग कंधे पर लटकाकर बाहर निकल आई। अभी देहरादून के लिए गाड़ी मिल सकती थी, यदि वह समय पर स्टेशन पहुंच जाए तो। उसने जाते हुए एक थ्रीव्हीलर को संकेत से बुलाया और बिना देर किए बोली, ‘रेलवे स्टेशन’। स्टेशन पहुंच कर देहरादून का टिकट लिया और गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगी। गाड़ी भी समय पर आ गई और सीट भी मिल गई। बैग बगल में रखकर मंगला ने पीठ ट्रेन की सीट से टिका दी। सूनी आंखों से ट्रेन की छत को तकने लगी किन्तु वहां था ही क्या जो उसे दिखता। थोड़ी ही देर बाद उसे छत के पटल पर गिरीश का चेहरा नज़र आने लगा। बीमार और थका हुआ गिरीश, मौत से लड़ता हुआ गिरीश।
गिरीश की बहन दीपा ने ही उसे फोन पर गिरीश के हृदयाघात की सूचना दी थी। उसने कहा था, ‘हालत अच्छी नहीं है।’
वैसे तो गिरीश को सेवा निवृत्त हुए दो साल हो चुके थे किन्तु उनका परिचय कल की बात तो नहीं थी। वह तो उसे तब से जानती थी जब अपने गांव के स्कूल में वह दसवीं क्लास में पढ़ती थी।
लम्बी-लम्बी दो चोटियां झुलाती मंगला अपने बापू के बड़े से बाग से गुलेल से मार-मार कर आम तोड़ रही थी। मालियों की भला क्या मजाल जो सरपंच की इकलौती बेटी को कुछ कह देते। अभी वह कुछ और आम तोड़ती कि उसकी गुलेल से छूटा पत्थर, बाग के साथ बनी सड़क पर चलने वाले एक पथिक के सिर में जा लगा। इसमें भला बेचारी मंगला का क्या कसूर! फिर भी मंगला को न जाने क्यों डर-सा लगने लगा और वह भाग कर घर आ गई।
दूसरे दिन जब मंगला ने अपने नये अध्यापक के माथे पर पट्टी बंधी देखी, तभी उसे पता चला था कि उसकी गुलेल से छूटा पत्थर किसके लगा था। उसके इस नए अध्यापक का नाम गिरीश कुमार था। नव-युवक अध्यापक ने इतना ही कहा, ‘कि बजाय शरारतें करने के अगर तुम पढ़ने में ध्यान दो तो अच्छे नम्बर ले सकती हो।’ उसकी इस बात से मंगला को यह अनुमान हो गया कि मास्टर जी जानते हैं कि पत्थर किसने मारा है। मंगला शर्म से पानी-पानी हुई जा रही थी।
पर हां, इतना तो हुआ कि उस घटना के बाद वह सारी शरारतें छोड़कर पूरी गम्भीरता से पढ़ने लगी थी, लेकिन गिरीश बहुत थोड़े दिन ही गांव में रहा। इसी दौरान उसे कालेज में लैक्चरर शिप मिल गई और वह मेरठ शहर चला गया। गांव से मेरठ ज्यादा दूर भी नहीं था। गिरीश कभी-कभी छुट्टी में सरपंच जी से मिलने गांव आ जाता और मंगला से उसकी पढ़ाई के बारे में भी पूछता रहता। इसका असर यह हुआ कि मंगला ने दसवीं में अच्छे नम्बर लिए और फिर गिरीश से कहकर मंगला ने आगे की पढ़ाई मेरठ से करने की आज्ञा अपने बापू से ले ली।
अब मंगला ने बी.ए. तक पढ़ाई भी उसी कालेज से पूरी की जहां गिरीश था। वजह तो मंगला ही जानती थी पर बापू ने गिरीश के भरोसे ही उसे मेरठ में पढ़ने की आज्ञा दी थी और गिरीश ने भी पढ़ाई में उसकी बहुत मदद की। यह बात अलग है कि जो बात मंगला के दिल में थी, वह उसके दिल में ही रही और गिरीश का तबादला देहरादून हो गया।
बापू से मंगला ने देहारदून रहकर एम.ए. पढ़ने की अनुमति तो ले ली किन्तु सारे कालेज छानने पर भी इतना ही पता चल सका कि गिरीश वहां से भी त्याग पत्र देकर कहीं और चला गया है। कहां, यह तो किसी को भी चता नहीं था। फिर आगे की पढ़ाई के लिए मंगला को रिश्ते की एक बहन के पास भेज दिया गया।
छुट्टियों में मंगला जब भी घर आती तो उसका मन चाहता कि वह गिरीश के बारे में कुछ जाने, लेकिन किससे? बस बापू से इतना ही जान सकी कि गिरीश को फिर से देहारदून में ही कहीं लैक्चरार का पद मिल गया था। इससे अधिक पूछने की उसे हिम्मत ही न हुई और एम.ए. के बाद मंगला संगीत में पी.एच.डी. के लिए फिर से देहरादून चली गई। ट्रेन झटके से रुकी तो मंगला ने चौंक कर इधर-उधर देखा। कोई छोटा-सा स्टेशन था। शायद सिग्नल डाउन नहीं हुआ था वरना यहां तो गाड़ी रुकने का कोई प्रश्न ही नहीं था। उसने बैग में से पानी की बोतल निकाली और बोतल का ढक्कन खोल कर थोड़ा-सा पानी पिया, फिर बोतल बंद करके उसे वापस बैग में रख दिया और फिर से सीट से पीठ टिका कर आंखें बंद कर लीं। गाड़ी फिर चल पड़ी। (क्रमश:)



