ईरान के साथ लड़ाई लम्बी होती जाने के कारण असहज होते जा रहे ट्रम्प
डोनाल्ड ट्रम्प को व्हाइट हाउस से अपना पहला युद्ध संबंधी भाषण दिये हुए बहुत थोड़ा ही समय बीता है कि उनके झूठ, उनकी शेखियों और भौंडी दावेदारियों की एक-एक करके पोल खुलनी शुरू हो गई है। चार घटनाएं ऐसी हुई हैं जो बताती हैं कि ट्रम्प ने अपने लिए मुगालतों की जो दुनिया बना रखी है, वह किस तरह से काफी संगीन संकट में फंस चुकी है। पहली घटना यह है कि अमरीकी वायुसेना का एक अत्याधुनिक फाइटर जेट और एक बेहद आधुनिक हेलिकॉप्टर ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम ने गिरा दिया। दूसरी घटना यह है कि अमरीकी युद्ध नीति पूरी तरह से भ्रम में फंस चुकी है और उसके भीतर एक ज़बरदस्त दरार दिखने लगी है। इसका सबूत उस समय मिला जब ट्रम्प के रक्षा मंत्री पीटर हेशगेट ने अमरीकी सेना के चीफ और कुछ अन्य अहम जनरलों को अनायास पद से हटा दिया। तीसरी घटना यह है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था पर ईरान के पलटवार के कारण लम्बे खिंचते जा रहे युद्ध के दुष्प्रभाव दिखने लगे हैं जिससे पूरे यूनाइटेड स्टेट में ट्रम्प के खिलाफ क्षोभ बढ़ता जा रहा है। चौथी घटना यह है कि ईरान ने युद्धविराम करने से पूरी तरह से इन्कार कर दिया है जिसके कारण पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र द्वारा की जा रही मध्यस्थता नाकाम हो गई है। इन चारों कारणों से ट्रम्प के खेमे में एक ज़बरदस्त हड़बड़ी, एक तरह की घबराहट देखी जा रही है। ट्रम्प की दिमागी हालत तो ऐसी हो गई है कि वे बार-बार अपने नज़दीकी और अहम पदों पर बैठे लोगों के दरवाज़े पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। कल ही एक पार्टी में वे अचानक कहने लगे कि अगर ईरान के साथ युद्धविराम पर समझौता न हुआ तो वे इस विफलता का ज़िम्मेदार उप-राष्ट्रपति जे.जी. वैंस को मानेंगे और अगर समझौता हो गया तो उसका पूरा श्रेय खुद ले लेंगे। इस अजीब सी बात को कहते ही ट्रम्प का लगा कि अरे, उन्होंने यह क्या कह दिया। यह एहसास होते ही वे हंसने लगे ताकि दिखा सकें कि वे तो मज़ाक कर रहे थे। ये चार घटनाएं बताती हैं कि जिस युद्ध को ‘आसान जीत’ के तौर पर पेश किया गया था, वह ‘लम्बा और महंगा संघर्ष’ बनने की तरफ जा चुका है।
ट्रम्प ने दावा किया था कि ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम लगभग खत्म हो चुका है और अब वे ईरान के आसमान पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ हासिल कर चुके हैं। यह दावा गलत साबित हो गया है। ईरान ने अपनी एयर डिफेंस की क्षमता दिखा दी है। ईरान ने दक्षिण-पश्चिमी ईरान (खुजिस्तान क्षेत्र) में अमरीकी अतिआधुनिक एफ-51ई स्ट्राइक ईगल नामक विमान को युद्ध के 35वें दिन मार गिराया। कुछ रिपोर्ट्स बता रही हैं कि कुवैत या हॉर्मुज क्षेत्र में अमरीका के एक ए-10 वारतोक अटैक विमान और दो यूएच-60 ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टरों को भी ईरान ने निशाना बना कर दिखा दिया है। ये बड़े मशहूर हैलिकॉप्टर हैं। इनके ऊपर ‘ब्लैक हॉक डाउन’ जैसी मशहूर फिल्म हालीवुड बना चुका है। मशहूर निर्देशक रिडली स्कॉट ने इसे बनाया था।
यह घटना कई तरह से अहम है। पिछले कई युद्धों में अमरीका को फाइटर जैट जैसे अत्यंत महंगे और प्रतिष्ठित विमान का ऐसा नुकसान पहली बार हुआ है। ईरान ने इस कामयाबी को अपने ‘नए एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम’ का कमाल बताया है। यह घटना दिखाती है कि अमरीका के पास पूरी तरह से एयर सुप्रीमेसी नहीं है। ईरान का शॉर्ट/मीडियम रेंज मिसाइल सिस्टम काम कर रहा है। मोबाइल राडार या कंधे पर लांचर रख कर मिसाइल या रॉकेट फायर करने वाले सिस्टम अभी भी लो-लेबिल या अचानक हमले का खतरा पैदा कर सकते हैं।
अब जाकर दुनिया को पता चल रहा है कि ईरान की वायु रक्षा प्रणाली एक बहुस्तरीय नेटवर्क है, जिसमें रूसी और स्वदेशी सिस्टम शामिल हैं। ट्रम्प ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि ईरान को ‘पूरी तरह कुचल’ दिया गया है। इसके मुकाबले ईरान की यह सफलता एक ‘डबल झटका’ है- ट्रम्प की शेखीखोरी को चोट पहुंची। हालांकि ट्रम्प ने कहा कि ऐसा नुकसान युद्ध में होता ही रहता है, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि अमरीका को अब ज्यादा सतर्कता प्तबरतनी पड़ेगी। हवाई हमले कम जोखिम वाले नहीं रह गए हैं। ट्रम्प सरकार पर दबाव बढ़ सकता है कि या तो तेजी से और आक्रामक हमले करें (जैसे पुलों और बिजली घरों पर) या जल्दी समझौता करें। ईरान दिखा रहा है कि वह अभी भी लड़ सकता है। इससे युद्ध का लंबा खिंचना तय है। इज़रायल और अमरीका के अन्य सहयोगी देशों में इससे चिंता बढ़ेगी। अमरीका में ट्रम्प की आलोचना बढ़ सकती है कि उन्होंने यह युद्ध अच्छी तरह नियोजित नहीं किया। इससे अमरीका को सैन्य रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। हो सकता है कि वह अपने नये हमले करने में ऐसे हथियारों का इस्तेमाल करे जिनका संचालन पायलट या नेविगेटर नहीं करते, जैसे ड्रोन। इस घटना से अमरीका में डर पैदा हो सकता है कि अगर ईरान ने उसके पायलट या कोई और सैनिक कैप्चर कर लिये और फिर उनका मीडिया में प्रदर्शन किया गया, या उन्हें बंधक बनाकर सौदेबाज़ी की गई तो ट्रम्प की रही-सही छवि का अमरीका में कबाड़ा हो जाएगा।
अमरीकी युद्ध नीति ऐसा लगता है कि चरमरा कर बैठी जा रही है। ट्रम्प ने अपने आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज को तत्काल प्रभाव से रिटायर कर दिया है। स्पष्ट तौर पर इसके कारण दो हैं। पहला, ईरान संघर्ष के दौरान रणनीति पर मतभेद हैं। ट्रम्प की आक्रामक नीति के मुकाबले जनरल ने सोच-समझ कर सतर्क रहने की सलाह दी थी। ट्रम्प ऐसी किसी सलाह को सुनना ही नहीं चाहते जो उनके राजनीतिक स्वार्थ की तुष्टि न करती हो। उन्होंने एयरफोर्स वाइस चीफ को भी हटाया है। रक्षा मंत्री पेट हेगसेथ का तर्क यह है कि इन परिवर्तनों को करना ज़रूरी था क्योंकि ‘सेना को मूल मिशन (युद्ध जीतना) पर फोकस’ रहना चाहिए। असली बात कुछ और है। ट्रम्प चाहते हैं वफादारी और नियंत्रण। उनका ज़ोर है कि फौजी नेतृत्व संवैधानिक वफादारी के साथ-साथ उनकी नीतियों का समर्थन करे। दरअसल यह फौज के ‘राजनीतिकरण’ के अलावा कुछ नहीं है।
युद्ध के बहाने ट्रम्प ने कुछ पुराने हिसाब भी चुकता किये हैं। सीरिया, अफगानिस्तान, ईरान या अन्य ऑपरेशंस में आदेशों को मानने में हीला हवाला करने की सज़ा भी कई अफसरों को मिली है। ट्रम्प ने पूर्व जॉइंट चीफ्स चेयरमैन मार्क मिले को रिटायर कर दिया। ध्यान रहे कि उन्होंने ट्रम्प को ‘फासिस्ट’ कहा था और कुछ फैसलों पर उनकी सार्वजनिक आलोचना की थी। ट्रम्प द्वारा किये गये ये बदलाव बहुत विवादास्पद रहे हैं- कुछ का कहना है कि इससे सेना की स्वतंत्रता और तैयारियां प्रभावित हो रही हैं। ध्यान रहे कि ट्रम्प ने अपने दोनों कार्यकालों में कई उच्च-स्तरीय सैन्य अधिकारियों (जनरलों और एडमिरलों) को हटाया या उनके साथ झगड़ा किया। वे नहीं चाहते कि फौज के निर्णयकारी पदों पर कोई महिला या अल्पसंख्यक या अश्वेत लाया जाए। जनरल रैंडी के साथ उनके मतभेदों का एक बड़ा कारण यह भी था। जनरल रैंडी कुछ महिला और अल्पसंख्यक अधिकारियों को पदोन्नत करना चाहते थे, लेकिन रक्षा मंत्री इसमें रुकावट डाल रहे थे।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



