क्या पश्चिम बंगाल में लाखों लोग मतदान से वंचित रह जाएंगे ?

ऐसा लग रहा है कि पश्चिम बंगाल में इस बार लाखों लोग विधानसभा चुनाव में मतदान से वंचित रह जाएंगे। इसका कारण मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के काम में हुई देरी है। असल में किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले पश्चिम बंगाल में एसआईआर का काम ज्यादा जटिल हो गया। चुनाव आयोग ने दूसरे राज्यों के मुकाबले तार्किक विसंगति का मुद्दा बंगाल में ज्यादा उठाया और लाखों मतदाताओं के दस्तावेज़ों की कई-कई बार जांच हुई। अभी एक बार और ट्रिब्यूनल में जांच होनी है। इसीलिए ऐसा लग रहा है कि इस बार लाखों लोग वोट नहीं डाल पाएंगे। हालांकि यह सवाल अपनी जगह है कि क्या लाखों लोगों को वोट डालने से वंचित करके चुनाव कराया जा सकता है? इस मामले में हर जगह सुप्रीम कोर्ट शामिल है और सुप्रीम कोर्ट को भी अंदाज़ा है कि लोगों के नाम कटेंगे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इसके बावजूद चुनाव की प्रक्रिया पूरी होगी। इसका एक संकेत सुप्रीम कोर्ट की पिछले बुधवार की टिप्पणी से भी मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईआर की वजह से एक चुनाव में किसी मतदाता का नाम कट जाने का यह मतलब नहीं है कि उसका नाम हमेशा के लिए कट गया। ज़ाहिर है कि नाम कटने के बाद भी चुनाव की प्रक्रिया तय कार्यक्रम के हिसाब से आगे बढ़ेगी। इससे साफ है कि चुनाव आयोग जान-बूझ कर किसी खास मकसद से लाखों लोगों को वोट डालने से वंचित रखेगा।
हार के लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार होगी  
पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए सबसे अच्छी स्थिति दक्षिणी राज्यों में है। चुनाव सर्वेक्षणों में बताया जा रहा है कि कांग्रेस केरल में चुनाव जीत सकती है। तमिलनाडु में भी डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन वापस सत्ता हासिल कर सकता है, लेकिन केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में स्थिति जटिल है। 30 विधानसभा सीटों वाले राज्य पुडुचेरी में 2016 में कांग्रेस जीती थी और वी. नारायणसामी को मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन 2021 के चुनाव में कांग्रेस बहुत बुरी तरह से हारी और कांग्रेस के कारण डीएमके भी हारी। इस बार भी अगर पुडुचेरी में एनडीए चुनाव जीतता है तो उसका कारण कांग्रेस पार्टी होगी। पुडुचेरी में कांग्रेस के लिए माहौल ठीक नहीं है। इसके बावजूद जैसे पिछली बार कांग्रेस ने ज़िद करके ज्यादा सीटें लीं और गठबंधन को हरवाया। इस बार भी वह ज्यादा सीटें लेकर लड़ रही है। गौरतलब है कि 2021 में कांग्रेस 14 सीटों पर लड़ी थी और सिर्फ  दो सीट जीत पाई थी। दूसरी ओर डीएमके 13 सीटों पर लड़ कर छह पर जीती थी। इससे पहले 2016 में कांग्रेस ने 17 सीटें जीती थीं। नारायणसामी ने कांग्रेस को 17 में से दो सीट पर ला दिया। इस बार भी कांग्रेस ने ज़िद करके 16 सीटें ली हैं और डीएमके को पहले की तरह 13 सीटें दी हैं। यही नहीं, बाद में कांग्रेस ने पांच और सीटों पर भी उम्मीदवार उतार दिए।
बुज़ुर्ग राज्यपालों के लिए राहत
भारत में राज्यपाल बनने के बाद सक्रिय राजनीति में लौटना कोई अनोखी बात नहीं है। कई नेता राज्यपाल रहने के बाद सक्रिय राजनीति में लौटे और मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बने हैं। सुशील कुमार शिंदे से लेकर मोतीलाल वोरा तक की मिसालें हैं। भाजपा ने भी उत्तर प्रदेश में बेबीरानी मौर्य से लेकर तमिलनाडु में तमिलिसाई सौंदर्यराजन तक को चुनाव लड़ाया। लेकिन अगर भाजपा का कोई नेता बुज़ुर्ग हो और राज्यपाल रहा हो फिर भी उसे चुनाव लड़ने का मौका मिले तो यह भाजपा के कई बुज़ुर्ग नेताओं के लिए बड़ी राहत की बात होगी। असल में भाजपा ने एक अघोषित नियम बना रखा है कि 75 साल के बाद सेवा-निवृत्त कर दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसका अपवाद बनाया गया है। लेकिन इस बार भाजपा केरल में पूर्व राज्यपाल के. राजशेखरन को चुनाव लड़ा रही है, जिनकी उम्र 73 साल है। गौरतलब है कि कुम्मनम राजशेखरन मिज़ोरम के राज्यपाल रहे हैं। वह इस बार अरानमुला सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। एक समय दक्षिण भारत और खास कर केरल की राजनीति में वह भाजपा का चेहरा माने जाते थे। लंबे समय तक संघ प्रचारक और भाजपा के नेता रहे राजशेखरन की कुल संपत्ति एक लाख रुपये की है। बहरहाल, वह राज्यपाल रहे है, फिर भी चुनाव लड़ रहे हैं। इसीलिए भाजपा के जो नेता राज्यपाल बनाए गए हैं और जिनकी उम्र 70 साल से ज्यादा हो गई है, उन्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। आवश्यकता होने पर पार्टी उन्हें चुनाव लड़ा सकती है।
कैमरे लगाओ, उतारो, फिर लगाओ
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने सुरक्षा और खास कर महिला सुरक्षा का हवाला देकर लाखों सीसीटीवी कैमरे लगवाए थे। अब रेखा गुप्ता की भाजपा सरकार कह रही है कि दिल्ली में लगे एक लाख 40 हज़ार कैमरे एक ही चाइनीज़ कंपनी के हैं। इनसे जासूसी का खतरा बताया जा रहा है।  इसलिए उनको हटाया जाएगा। यह काम शुरू भी हो गया है। इन कैमरों को लगाने का काम 2020 में शुरू हुआ था और 2022 के अंत तक यह काम चला था। इनकी जगह नए सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे। वैसे पूरी दिल्ली में कुल दो लाख 74 हज़ार से कुछ ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, जो बहुत कम हैं। सोचने वाली बात है कि अगर चीन की कंपनी के कैमरे होने की वजह से जासूसी का खतरा है तब तो पूरे देश में इस किस्म का खतरा होगा। भारत में कई संवेदनशील जगहों पर चीन की कंपनियों के कैमरे लगे हैं। सिर्फ कैमरे ही नहीं, बल्कि दूसरे इलेक्ट्रानिक उपकरण भी चीनी कंपनियों के हैं। भारत में तो ज्यादातर लोगों के हाथ में चीनी कंपनियों के मोबाइल फोन हैं, जिनसे करोडों क्या अरबों तस्वीरें रोज़ खींची जाती हैं और वीडियो बनाए जाते हैं। अगर चीनी उपकरणों से जासूसी होने का खतरा है तब तो सारे उपकरण बदलने चाहिए। दिल्ली के सीसीटीवी कैमरे बदल देने से क्या चीन की जासूसी से छुटकारा मिल जाएगा?
ममता का ‘दिल्ली चलो’ ऐलान
ममता बनर्जी ने एक बार फिर ‘दिल्ली चलो’ का ऐलान कर दिया है। वह हर विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह का ऐलान करती हैं। उनकी पार्टी भी इस तरह की घोषणा करती है। 2021 में ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं ने बहुत साफ तरीके से कहा था कि दिल्ली का रास्ता बंगाल से होकर जाएगा। यह भी कहा गया था कि विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति के लिए कूच करेंगी और 2024 में प्रधानमंत्री बनेंगी। लेकिन 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए विपक्ष के एक मज़बूत गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक का गठन हुआ तो ममता बनर्जी ने खुद को उससे अलग कर लिया और बंगाल की राजनीति ही करती रहीं। अब फिर उनके दिल्ली फतेह करने की चर्चा शुरू हो गई है।
 इस बार उन्होंने खुद ही कहा है कि 2026 में बंगाल जीतने के बाद दिल्ली जीतेंगे। माना जा रहा है कि हर बार बांग्ला मानुष को यह संदेश दिया जाता है कि उनकी नेता ममता बनर्जी देश की नेता बनने योग्य हैं और वह जीतीं तो देश की राजनीति करके प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं। गौरतलब है कि आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी भागीदारी बंगाल की रही थी, लेकिन आज तक वहां का कोई नेता प्रधानमंत्री नहीं बन सका है। यह भी कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी इस बात का ज्यादा प्रचार कराते हैं कि ममता दिल्ली जाएंगी। वह दिल्ली जाएंगी तभी कोलकाता में मुख्यमंत्री की कुर्सी अभिषेक के लिए खाली होगी।

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