बुज़ुर्गों की उपेक्षा नहीं, उनका सशक्तिकरण होना चाहिए
अक्सर युवाओं का देश, नारी सशक्तिकरण, महिला आरक्षण आत्म-निर्भर भारत की बात सुनाई देती है। इसके विपरीत विडम्बना है कि सेवा-निवृत्त यानी जो कभी बहुत उपयोगी थे, अचानक उन्हें घर, परिवार और समाज में कई बार उपेक्षित किया जाने लगता है। कोई और न भी समझे पर वे अपने को बोझ समझने लगते हैं। ऐसे लोगों की पीढ़ी को संरक्षण की नहीं, सशक्तिकरण की आवश्यकता है।
सोच में बदलाव : हमारे देश में संयुक्त परिवार की जीवन शैली रही है और आज भी कई पीढ़ियों के लोग साथ रहते हैं। जैसे-जैसे आजीविका के लिए संघर्ष बढ़ा, साथ रहना मुश्किल होता गया और फिर एकल परिवार का दौर शुरू हुआ। अब फिर से दो तीन पीढ़ियों के एक साथ रहने की संभावना तलाशी जा रही है। इसका कारण यह नहीं कि अचानक युवा पीढ़ी को यह अहसास होने लगा हो कि सब साथ रहेंगे तो बेहतर होगा, एक दूसरे के सुख-दुख में सहभागिता बढ़ेगी बल्कि अधिकतर यह हकीकत है कि बुज़ुर्गों से अधिक युवावर्ग को अकेलापन महसूस होने के कारण वे चाहने लगे हैं कि घर के बड़े उनके साथ रहेंगे तो उनका जीवन सहज होगा। उम्र भी लंबी होती जा रही है क्योंकि सेहत के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ी है। इसलिए यह ज़रूरी हो जाता है कि साठ साल से अधिक उम्र वालों के अनुभव और उनकी अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर सरकार कोई ऐसी नीति बनाए जिससे उनका सशक्तिकरण हो और वे अपने को उपयोगी समझें। इसके साथ ही यह समझा जाना चाहिए कि बुज़ुर्ग होना, दया का नहीं बल्कि इस पीढ़ी के मूलभूत अधिकारों का विषय है।
पिछले दिनों लंदन से एक परिचित युवा दंपति भारत आए। पति इंग्लैंड में ही जन्मे, पढ़े लिखे और अपना व्यवसाय करते हैं। पत्नी भारत से पढ़ने के लिए गईं और फिर वहीं नौकरी कर ली और विवाह भी। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि वहां युवाओं को व्यस्क हो जाने पर अपने खर्च का पैसा स्वयं जुटाना होता है, परिवार से न उनकी कोई अपेक्षा होती है, न उनका कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी कि बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होते देखने के लिए वे अपनी जमापूंजी उन पर खर्च करें। भारत में यह माना जाता है कि संतान की शिक्षा, रोज़गार या नौकरी तक का प्रबंध करना माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। पश्चिमी देशों में इस तरह के व्यवहार को आश्चर्य के रूप में देखा जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब तुम बड़े हो गए हो, अपना स्वयं देखो, अगर कभी हमारी ज़रूरत पड़े या मिलने का मन करे तो पहले से सूचित कर हमारी सुविधा के अनुसार आ सकते हो। यह माता-पिता पर भी लागू होता है कि यदि वे अपने बच्चों से बातचीत करना या मिलना चाहते हैं तो उन्हें अपनी नहीं उनकी सुविधा के अनुसार ही तय करना होगा।
बढ़ती उम्र की विशेषता : अब उम्र को तो बढ़ना ही है और हरेक के जीवन में ऐसा समय आता है जिसे सेवा-मुक्ति कहते हैं। जहां यूरोपियन तथा अन्य विकसित देशों में लोग इसे जीवन का एक पड़ाव मानते हैं, भारत में यह एक ठहराव माना जाता है कि अब शेष जीवन नाती-पोतों की संगत में व्यतीत करने का समय आ गया है या परिवार में एक बड़े बुज़ुर्ग की तरह ज़िम्मेदारी संभालनी होगी और वही करना होगा जो संतान चाहे या कह सकते हैं कि निर्देश दे। इसमें ऐसा नहीं है कि आदर या निरादर करने जैसा कुछ है, बल्कि यह मान कर चला जाता है कि जीवन में बहुत कुछ कर लिया, अब विश्राम करने का समय है। यह न कोई पूछता है न जानना चाहता है कि उम्र के इस मोड़ पर सक्रिय जीवन से मुक्त हो जाने की इच्छा है भी या नहीं। ठीक है, नौकरी से अवकाश ग्रहण करना तय है लेकिन एकदम से कुछ करने को न हो या जो अब करने का मन हो, उसमें किंतु-परंतु लग जाए या अगर कुछ करना ही है तो उसके लिए पारिवारिक सहमति हो तब ही किया जा सकता हो। यह ऐसी स्थिति है जो ज़रूरत से ज़्यादा देखभाल करने की है। यह तय करने का काम किसका है कि बुज़ुर्गों को सहारे की आवशयकता है या नहीं? प्रश्न यह है कि इस आयु में सहारा चाहिए या आज़ादी के साथ जीने या जो अब तक किसी कारण से नहीं कर पाए या विपरीत परिस्थितियों के कारण संभव नहीं था, उसे कैसे किया जाए? सवाल यह नहीं है कि हम अपने बुज़ुर्गों को कितनी सुविधाएं देते हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें उम्र के अंतिम चरण में अपनी मज़र्ी से जीने का कितना अधिकार देते हैं?
सम्मान और गरिमा चाहिए : अब हम इस बात पर आते हैं कि साठ साल की आयु तक का सफर तय करने के बाद मान लीजिए सौ वर्ष तक जीना है अर्थात् पूरे चालीस वर्ष का कार्यकाल तय करना किसके हाथ में है। परिवार की बात तो बहुत हो गई, क्या कोई ऐसी नीति या कानून है जिसके आधार पर इस पूरी पीढ़ी को सुबह की सैर, लाफ्टर क्लब या किसी भी तरह से दिन भर अपना समय बिताने के अतिरिक्त कुछ और काम भी दिया जा सकता है। उनकी क्षमता, कार्य कुशलता और जीवन में प्राप्त की गईं उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए कोई ऐसी योजना बनाई जा सकती है जो उन्हें एक तरफ अपने अनुपयोगी होने के अहसास से दूर रखने में सहायक हो और दूसरी तरफ उनकी सामर्थ्य के अनुसार उनके लिए कुछ ऐसे कार्यों में शामिल करने की कोशिश हो जिससे वे अकेलेपन की आधुनिक बीमारी से दूर रहें और अंतिम सांस तक देश के लिए अपना सार्थक योगदान दे सकें।
एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए जिसमें कुछ पदों या कार्यों के लिए केवल बुज़ुर्गों को ही प्राथमिकता दी जाए, यानी उन्हें भी आरक्षण मिले। शोध बताते हैं कि बुज़ुर्ग होना उम्र का थमना नहीं है, बल्कि अब तक के अनुभव को पराकाष्ठा तक पहुंचाना है। उन्हें विशेष दर्जा नहीं चाहिए लेकिन अपने उपयोगी होने की उम्मीद में कुछ नया करने की व्यवस्था अवश्य चाहिए। यदि वे काम करना चाहते हैं तो परिवार, समाज या किसी अन्य को कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। सहारा नहीं सार्थकता चाहिए, क्योंकि अंतिम सांस तक प्रासंगिक बने रहना ही जीवन है।



