अस्थायी नहीं ठोस परिणाम की ज़रूरत
अमरीका-इज़रायल और ईरान के बीच लगभग पिछले 6 सप्ताह से चले आ रहे भयानक युद्ध में ईरान का प्रत्येक पक्ष से बेहद नुकसान हुआ है। ईरान द्वारा इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप अमरीका पक्षीय खाड़ी देशों पर मिसाइलों और ड्रोनों से किए गए हमलों के कारण इन छोटे-छोटे देशों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। विश्व भर में तेल की कीमतों के साथ-साथ अन्य ज़रूरी वस्तुओं की कीमतें भी आसमान छू गई हैं। इसी दौरान पाकिस्तान, तुर्की और कुछ अन्य देशों के यत्नों से 7 अप्रैल को अमरीका और ईरान दो सप्ताह के लिए युद्ध-विराम के लिए सहमत हुए हैं।
चाहे हुए इस अस्थायी समझौते के संबंध में लगातार अनिश्चितता बनी रही है, परन्तु विश्व भर के देशों ने इसे एक अच्छा कदम माना है। यूरोपियन आयोग की अध्यक्ष उर्सा वैन ने कहा कि इस युद्ध को खत्म करना आज सबसे बड़ी ज़रूरत है। बातचीत द्वारा इसका स्थायी हल निकाला जाना ज़रूरी है। भारत ने भी शुरू होने वाली इस बातचीत का स्वागत किया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा है कि यह समझौता स्थायी होना चाहिए और होर्मुज़ जलडमरू मार्ग समुद्री आवागमन के लिए खोला जाना बेहद ज़रूरी है। स्पेन, जर्मन और अन्य लगभग सभी बड़े देशों ने इस नए बदलाव पर संतोष प्रकट किया है। शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमरीका के अधिकारियों की भेंट होनी है। समाचारों के अनुसार अमरीका के उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस इस्लामाबाद पहुंच भी गए हैं। चाहे अपने हुए बड़े नुकसान के बाद ईरान भी इस युद्ध से निकलना चाहता है, दूसरी तरफ अमरीकी राष्ट्रपति पर भी इस युद्ध को खत्म करने के लिए चारों तरफ से सख्त दबाव बना हुआ है, परन्तु इस अस्थायी समझौते के बाद दोनों पक्षों की बातचीत को आगे बढ़ाने के मार्ग में अनेक तरह की कठिनाइयां पेश आ रही हैं। इज़रायल द्वारा अमरीका के साथ मिल कर ईरान पर हमलों के साथ-साथ अपने दुश्मन हिज़्बुल्लाह, जिसके बड़े ठिकाने लेबनान में हैं, पर भी हमले किए जा रहे हैं। क्योंकि हिज़्बुल्लाह ने इस युद्ध में ईरान का डट कर साथ दिया है। इसका एक कारण यह भी है कि ईरान ने ही इस संगठन का लगातार प्रत्येक पक्ष से पालन-पोषण किया है। हिज़्बुल्लाह के अतिरिक्त आतंकी संगठन हमास ने भी पिछले लम्बे समय से इज़रायल के विरुद्ध युद्ध छेड़ा हुआ है।
हिज़्बुल्लाह तो इज़रायल के वर्ष 1948 में बनने के बाद ही इसका अस्तित्व मिटाने के लिए लगातार सक्रिय रहा है। हिज़्बुल्लाह और इज़रायल में युद्ध जारी रहने के कारण अमरीका-इज़रायल और ईरान के बीच युद्ध-विराम प्रभावित हो रहा है। ईरान लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर हमले रोकने की भी मांग कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा घोषित अस्थायी समझौते की कड़ियां इसलिए बहुत कमज़ोर दिखाई दे रही हैं क्योंकि उसने ऐसी पैदा हुई जटिल स्थिति संबंधी कोई विस्तारपूर्वक और परिपक्व समाधान नहीं सुझाये, कुछ धाराओं को पूरी तरह से स्पष्ट करने की बजाये आधे-अधूरे ढंग से ही इस समझौते को सफल बनाने का यत्न किया। इज़रायल ने अस्थायी युद्ध-विराम की घोषणा के बाद भी लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर भीषण बमबारी की है, जिसमें सैकड़ों ही लोग मारे गए हैं। जहां ईरान इस जारी युद्ध को एक बेहद गम्भीर मुद्दा बना कर यह कह रहा है कि अस्थायी समझौते की एक शर्त लेबनान पर किए जा रहे इज़रायली हमलों को रोकना भी था, परन्तु इज़रायल ने इस बात से इनकार किया है कि इस समझौते में लेबनान संबंधी कोई भी बात हुई थी। इस समझौते का एक आधार ईरान द्वारा होर्मुज़ समुद्री मार्ग खोलना था परन्तु ईरान इस संबंध में लगातार आनाकानी करता आ रहा है। इसी समय खाड़ी देश कुवैत ने भी ईरान द्वारा ड्रोन हमले किए जाने की शिकायत की है। ईरान ने लेबनान पर इज़रायल हमलों संबंधी भी कड़ा रूख धारण करते हुए इस समझौता वार्ता में शामिल होने से आनाकानी करनी शुरू कर दी है। डोनाल्ड ट्रम्प ने भी होर्मुज़ मार्ग न खोले जाने पर ईरान को पुन: धमकियां देनी शुरू कर दी है।
पैदा हुए ऐसे अनिश्चित हालात में इस होने वाली वार्ता पर बादल मंडराते जा रहे हैं। यदि ऐसी स्थिति में यह वार्ता होती भी है तो वह कितनी सफल हो सकेगी, इस संबंधी भी आशंका बनी दिखाई दे रही है, परन्तु जिस तरह विश्व भर के देशों की इस संबंध में प्रतिक्रियाएं आई हैं, उनसे यह उम्मीद ज़रूर जागती है कि इस समय संयुक्त अन्तर्राष्ट्रीय यत्न इस युद्ध को धीमा करने के लिए प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं। नि:संदेह सभी को आज ऐसे हालात से निकलने की बेहद ज़रूरत है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

