तीन राज्यों में चुनाव उत्साह
वीरवार को देश के तीन राज्यों असम, केरल और केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में एक चरण में हुए चुनाव बड़ी सीमा तक शांतिपूर्वक और निर्विघ्न रहे हैं। इन तीन राज्यों में मतदान प्रतिशत से यह एहसास होता है कि उन्होंने चुनावों के लिए भारी उत्साह दिखाया है। असम में 84 प्रतिशत से अधिक, केरल में 72 प्रतिशत से अधिक और पुडुचेरी में भी 86 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ, जिन्हें उत्साहजनक कहा जा सकता है। ये तीनों ही राज्य अनुपातन बड़े प्रदेश नहीं हैं, परन्तु इन तीनों का अपना-अपना महत्त्व है। केरल का इसलिए कि देश भर में वामपंथी पार्टियों को विगत लम्बी अवधि से कम समर्थन मिलता रहा है, वहीं केरल में वामपंथी पार्टियों का गठबंधन पिछले 10 वर्ष से सत्ता में है। यह वाम लोकतांत्रिक मोर्चा अब तीसरी बार भी आगे आने के लिए किस्मत आज़मा रहा है। प्रदेश में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का प्रभाव अभी भी बना दिखाई दे रहा है। इसके मुकाबले में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त जनतांत्रिक मोर्चा सत्तारूढ़ गठबंधन को पूरी टक्कर दे रहा है, इस बार भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी तीसरी पार्टी के रूप में उभरा है। केरल में मुस्लिम समुदाय के लोग लगभग 27 प्रतिशत हैं और इसाई समुदाय लगभग 18 प्रतिशत है। इन दोनों का ज्यादातर सीटों पर बड़ा प्रभाव माना जाता रहा है।
पिछले 10 वर्ष में यहां कई नकारात्मक रुझान ज़रूर उभर कर सामने आए हैं, जिनमें नौकरियों की कमी और बढ़ती हिंसा भी शामिल है। चाहे इस प्रदेश को खुशहाल माना जाता है परन्तु यह भी विगत लम्बी अवधि से बड़े कज़र् के नीचे दबा दिखाई देता है। इस समय इसका कज़र् 5 लाख करोड़ से भी अधिक है। देश भर की राजनीति में जो गंदलापन दिखाई देता है, केरल भी उसकी जकड़ में फंसा हुआ है। इस राज्य के चुनाव दृश्य की जांच में इस बार के चुनाव में 38 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इन उम्मीदवारों में अधिकतर कांग्रेसी और भाजपा वाले तो शामिल ही हैं, परन्तु इस सूची में वामपंथी उम्मीदवारों की भी संख्या बहुत अधिक है। इनमें 23 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर हत्या और दुष्कर्म जैसे गम्भीर आरोप हैं। कांग्रेस पार्टी के भीतर पैदा हुई बीमारी का यह राज्य भी शिकार है। यहां भी आंतरिक टकराव उभर कर सामने आता रहा है। उम्मीदवारों के चयन में यह टकराव अधिक उभर कर सामने आया है। इसके अतिरिक्त यहां कभी बेहद प्रभावशाली रहे कांग्रेस नेताओं के. करुणाकरन, ए.के. एंटनी और ओमान चंदी जैसे नेताओं की कमी भी महसूस होती रही है।
चाहे पिछले चुनावों के विपरीत इस बार यहां किसी पार्टी के पक्ष में भी कोई स्पष्ट उभार दिखाई नहीं देता। दोनों पार्टियों में कांटे की टक्कर है और यह भी प्रतीत होता है कि जीत-हार संबंधी फैसला बहुत कांटे का होगा। असम में भी चुनाव के दौरान मतदाताओं ने भारी समर्थन दिया है। यहां पिछले दो कार्यकालों से भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा है। इस बार भी इस पार्टी के केन्द्रीय नेताओं द्वारा बहुत सख्त प्रचार करने के कारण यह पार्टी अभी भी पांवों पर खड़ी दिखाई देती है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा चाहे अपने साम्प्रदायिक बयानों के कारण विवाद में ज़रूर रहे हैं परन्तु सरमा का प्रभाव अभी भी यहां बना दिखाई देता है। चाहे वहां की कांग्रेस इकाई के प्रमुख गौरव गोगोई भी पूरी दृढ़ता से उनका मुकाबला करते नज़र आ रहे हैं।
केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी एक बहुत छोटा प्रदेश है, यहां सिर्फ साढ़े 9 लाख मतदाता ही हैं। यहां भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में रहा है। चाहे इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाला ‘इंडिया’ गठबंधन भी इसका कड़ा मुकाबला करता दिखाई दे रहा है। दोनों ही गठबंधन पुडुचेरी को राज्य का दर्जा दिलवाने के मामले पर साझी सोच रखते हैं। चाहे इन चुनावों के परिणाम पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हो रहे चुनाव के साथ 4 मई को ही आने हैं परन्तु कई पक्षों से अपना-अपना अलग रुतबा रखते इन राज्यों के आगामी समय में आने वाले चुनाव परिणामों को भी देश भर में बड़ी दिलचस्पी और गहनता से देखा जाएगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

