बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण की आवश्यकता

भारत आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। 2024 में भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ को पार कर गई। यह एक ऐसी समस्या है जो देश के विकास, संसाधनों, पर्यावरण और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डालती है। एक तरफ  जहां देश विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती जनसंख्या उस विकास में बाधा बन रही है। सड़कों पर भीड़, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों में जगह की कमी और बेरोज़गारी, ये सब बढ़ती जनसंख्या के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। 
जब किसी परिवार में कमाने वाला एक होता है और खाने वाले अधिक, तो गरीबी अपने आप आ जाती है। यही बात पूरे देश पर लागू होती है। भारत में उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेज़ी से आबादी बढ़ रही है। नतीजा यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय कम रह जाती है। करोड़ों लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं। गरीबी का सीधा संबंध अधिक जनसंख्या से है।
हर साल लाखों युवा पढ़-लिखकर नौकरी ढूंढने निकलते हैं, लेकिन नौकरियां उतनी तेज़ी से नहीं बढ़तीं जितनी तेज़ी से लोग बढ़ रहे हैं। एक सरकारी पद के लिए लाखों आवेदन आते हैं। इससे निराशा, अपराध और सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है। अगर जनसंख्या नियंत्रित होती तो हर हाथ को काम मिलना आसान हो जाता है।
सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में 60-70 बच्चे बैठते हैं, जहां शिक्षक का ध्यान हर बच्चे पर देना असंभव हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में मरीज़ों की इतनी भीड़ होती है कि डॉक्टर को एक मरीज़ को देखने के लिए मुश्किल से दो मिनट मिलते हैं। बढ़ती आबादी के कारण सरकार चाहकर भी हर व्यक्ति तक अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंचा पाती।
अधिक जनसंख्या के लिए ज्यादा ज़मीन की ज़रूरत, ज्यादा पानी की खपत, ज्यादा प्रदूषण और ज्यादा कचरा। जंगल काटकर बस्तियां बसाई जा रही हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ पानी और साफ हवा भी नसीब नहीं होगी।
शहरों में जगह कम पड़ रही है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग तंग और अस्वच्छ जगहों पर रहने को मजबूर हैं। ट्रैफिक जाम, पानी की कमी और बिजली की समस्या, ये सब अधिक जनसंख्या का ही नतीजा है। जब लोगों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं होतीं तो अपराध बढ़ता है। भूख, बेरोज़गारी और निराशा लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती है। अधिक जनसंख्या वाले इलाकों में चोरी, लूट और हिंसा की घटनाएं ज्यादा देखी जाती हैं।
हमारे समाज में कई ऐसी पुरानी मान्यताएं प्रचलित हैं जो लोगों को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन मान्यताओं की जड़ें धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में हैं। बेटे की चाह में लोग कई संतानें पैदा करते हैं। समाज में यह धारणा गहरी जड़ें जमाए बैठी है कि बेटा वंश आगे बढ़ाता है, बुढ़ापे का सहारा बनता है। इसलिए अधिकतर लोग बेटे की इच्छा रखते हैं। दूसरी ओर वर्तमान में बेटियां हर क्षेत्र में बेटों से आगे निकल रही हैं। चाहे सेना हो, अंतरिक्ष हो, खेल हो या प्रशासन, बेटियां हर जगह अपना परचम लहरा रही हैं। आज के समय में ज्यादा बच्चे होने का मतलब ज्यादा खर्चा और ज्यादा चिंता है। (अदिति)

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