पर्व पर गर्व

सुबह की कोमल धूप आंगन में सुनहरी चादर-सी बिछी थी। दादी तुलसी चौरे में जल चढ़ा रही थीं। रसोई से तिल और गुड़ की महक फैल रही थी।
बुआजी ने मुस्कुराकर कहा, ‘लगता है इस बार मकर संक्रांति की तैयारियां खूब जोर-शोर से होंगी!’
मम्मी बोलीं, ‘बिल्कुल दीदी, इस बार बच्चों को भी समझाना है कि त्योहार सिर्फ छुट्टियां नहीं, बल्कि सीखने का अवसर हैं।’
तभी मीनू, सोनल और अन्नू छत से दौड़ते हुए आए। मीनू ने उत्साह से कहा, ‘बुआजी, हमने रंग-बिरंगी पतंगें ली हैं! आज ही उड़ाएं?’
बुआजी हंस पड़ीं, ‘अरे बिटिया, आज नहीं, कल मकर संक्रांति को, लेकिन पहले जानो कि ये त्योहार क्यों मनाते हैं?’
अन्नू बोला, ‘क्यों बुआजी? बस पतंग उड़ाने और तिल-गुड़ खाने के लिए न!’
दादी ने हंसते हुए कहा, ‘नटखट! त्योहार में स्वाद तो है ही, मगर उसके पीछे ज्ञान भी छिपा है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे ‘उत्तरायण’ कहा जाता है। इसका मतलब है- अब दिन लंबे होंगे और उजाला बढ़ेगा। यह बदलाव बताता है कि सर्दी ढलने लगी है और नई शुरुआत का समय आ गया है।’
मम्मी ने समझाया, ‘और बेटा, यह त्योहार सिर्फ धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक भी है। ठंड के मौसम में जब धूप कम होती है, तब शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी हो जाती है। पतंग उड़ाने की परंपरा इसलिए शुरू हुई कि लोग छत पर जाकर धूप में खेलें। इससे शरीर को ऊर्जा और गर्माहट मिलती है।’ सोनल ने विस्मय से पूछा, ‘मतलब पतंग उड़ाना सिर्फ खेल नहीं, स्वास्थ्य का तरीका भी है?’ ‘बिल्कुल!’ बुआजी बोलीं।
‘जब हम छत पर दौड़ते हैं, झुकते हैं, डोर खींचते हैं, तो शरीर का हर अंग सक्रिय होता है। धूप में पसीना भी आता है, जिससे त्वचा से विषैले तत्व निकल जाते हैं। और ऊपर से खुश मन यही तो असली सेहत है!’

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