बच्चों पर ज़रूरत से ज्यादा सख्ती करना अच्छा नहीं
बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है। दुनिया के हर पैरेंट्स अपने बच्चों की ज्यादा से ज्यादा बेहतरी के लिए सोचते हैं। लेकिन पैरेंट्स भी गलतियां करते हैं। क्योंकि वो भी पैरेंटिंग की कोई नियमित शिक्षा नहीं लेते। बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करने के दौरान ही वे सब कुछ सीखते हैं। पैरेंट्स को बच्चे अपना दुश्मन ही समझने लगते हैं। लेकिन पैरेंट्स को जाने अंजाने पता नहीं होता कि उनके कौन से बिहेव का असर बच्चों पर कैसे पड़ेगा, जैसे-
उनका सम्मान करें : बढ़ती उम्र के साथ पैरेंट्स को अपने बच्चे की प्राइवेसी और उसके जीवन की छोटी-छोटी चीजों को महत्व देना चाहिए। ज्यादातर पैरेंट्स यह नहीं समझ पाते कि बड़े होने के बाद उसके भीतर सेल्फ रिस्पैक्ट, सेल्फ वैल्यू और अपनी स्वतंत्रता जैसी चीजों के भी मायने होते हैं। किसी के भी सामने बच्चों को भला बुरा बोलना, बच्चों की छोटी-छोटी बातों को किसी के साथ शेयर करना, हर वक्त बच्चों को डांटना डपटना, उन्हें सम्मान न देना, इस तरह की बातें बच्चे छोटेपन में तो भूल जाते हैं, लेकिन इनका बुरा असर बच्चों पर ताउम्र रहता है और वे धीरे-धीरे पैरेंट्स को अपना दुश्मन समझने लगते हैं।
अपनी पसंद उस पर न थोपें : बच्चे का भला बुरा सोचना पैरेंट्स की जिम्मेदारी होती है। लेकिन अपनी पसंद उस पर थोपना कहां की समझदारी है? आपकी पसंद का विषय वह पढ़े, पहनने ओढ़ने में आप उसकी इच्छा का ध्यान न करें। उसको किसके साथ दोस्ती करनी है, इसका निर्णय भी आप ही करें। इस तरह का व्यवहार बच्चे को भीरू और कायर तो बनाता ही है, उसे घर का माहौल भी दमघोटू लगने लगता है। वह अपनी अलग पहचान बना पाने में धीरे-धीरे अक्षम होने लगता है। अगर उसकी चाहत, उसकी पसंद को आप बार-बार नकार देते हैं तो एक समय के बाद उसकी अपनी चाहत और पसंद ही खत्म हो जाती है और उसका नतीजा होता है कि पैरेंट्स के प्रति उसके मन में नफरत पैदा होने लगती है।
बच्चों के डिसिजन खुद लेना : इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पैरेंट्स का यह अधिकार है कि वह बच्चों के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लें। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि इसमें बच्चों को कोई छूट न दी जाए। उसके विषय में कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले उसकी राय ज़रूर ली जाए। अगर उसकी असहमति है तो इस पर विचार किया जाए। अपने डिसिजन बच्चों पर थोपकर आप उन्हें अपना दुश्मन ही बनाते हैं। बच्चे को प्रेरित करें कि अपने जीवन से जुड़े फैसले वे स्वयं करें।
समझें उनकी भावनाओं को : उम्र बढ़ने के साथ साथ बच्चों में शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं। टीनएज में किसी के प्रति अट्रैक्शन होना स्वाभाविक है। बच्चे कच्ची उम्र में ही किसी के प्यार में भी पड़ सकते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि यह उम्र पढ़ने और कॅरियर बनाने की होती है। लेकिन इस तरह की भावनाओं को जब पैरेंट्स कोई महत्व नहीं देते, इससे भी बच्चों में घुटन पैदा होती है। उनके किसी के प्रति प्रेम, अट्रैक्शन, लगाव को समझना जरूरी है वर्ना पैरेंट्स की उनके साथ दूरी बनने लगती है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



