किस तरह का वृत्तांत सृजित किया जा रहा है पंजाब में

धमाका दर धमाका हो रहा है देखो ज़रा साहिब,
सियासत पर सियासत का मज़ा देखो ज़रा साहिब।
—लाल फिरोज़पुरी
वैसे तो पंजाब में पिछले कुछ वर्षों से बम धमाकों का एक पैटर्न (क्रम) लगातार चलता आ रहा है कि पुलिस थानों के निकट ‘कम शक्ति’ के बम धमाके होते हैं, बहुत बार इन्हें टायर फटने की घटनाएं कह कर दृष्टिविगत भी किया जाता रहा है, परन्तु इस बार इस पैटर्न में एक फर्क सामने आया है कि एक ही दिन दो धमाके हुए, परन्तु यह थानों की बजाय सुरक्षा एजेंसियों के निकट हुए। चाहे इस बार के धमाके थोड़ा आवाज़ और आकार में बड़े प्रतीत हुए, परन्तु यह पैटर्न कायम है कि ये किसी की जान लेने वाले नहीं थे। नि:संदेह एक तरफ पुलिस तथा केन्द्रीय एजेंसियां धमाके करने वालों के सम्भावित पाकिस्तानी संबंधों की जांच कर रही हैं, परन्तु इस बार इन दो धमाकों को राष्ट्रीय मीडिया में बड़ा स्थान मिला है, इनके कारण पंजाब की राजनीति में तूफान खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने इन्हें भाजपा की ‘चुनावी तैयारी’ कह कर हमला बोल दिया है और भाजपा नेता भी मान पर जवाबी हमले कर रहे हैं। हालांकि पंजाब के डीजीपी गौरव यादव इन्हें पाकिस्तान तथा आईएसआई के साथ जोड़ रहे हैं।
अभी गत सप्ताह ही इन कालमों में राजनीति की समझ रखने वालों के एक वर्ग में चल रही चर्चा का ज़िक्र किया गया था कि ‘आप’ के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद 2027 के पंजाब विधानसभा के चुनाव के दृष्टिगत ‘आप’ तथा भाजपा में लड़ाई इतनी तीव्र हो जाएगी कि यह एहसास बनेगा कि पंजाब में मुख्य मुकाबले में ‘आप’ तथा भाजपा ही हैं और चुनावी लड़ाई में पंजाब कांग्रेस तथा अकाली दल अप्रासंगिक हो गए हैं। जिस प्रकार ‘आप’ और भाजपा एक-दूसरे पर बम धमाकों संबंधी हमलावर हुए हैं, उससे यह प्रभाव पर चर्चा को बल ही मिला है। इस वृत्तांत (नैरेटिव) की लड़ाई में कांग्रेस पिछड़ती दिखाई दे रही है और अकाली दलों के इतने टुकड़े हैं कि पंथक वोट बिखरती प्रतीत हो रही है और ऊपर से आम आदमी पार्टी का सारा ज़ोर भी इस समय पंथक दिखाई देने पर ही लगा हुआ है। 
ध्रुवीकरण तथा सीधी टक्कर 
पंजाब में बंगाल, असम या उत्तर प्रदेश जैसा ध्रुवीकरण तो हो नहीं सकता, क्योंकि सिखों तथा हिन्दुओं के संबंध हिन्दुओं तथा मुसलमानों जैसे नहीं। अंग्रेज़ी का एक शब्द ‘बाइनरी’ है, जिसके कम्प्यूटर की भाषा में अनेक अर्थ हैं, परन्तु इसका एक प्रमुख अर्थ है कि संख्या का आधार 10 नहीं अपितु सिर्फ 2 है। इस प्रकार प्रतीत होता है कि भगवंत मान का भाजपा पर बम धमाकों का सीधा आरोप एक तरह से पंजाब की राजनीति की बाइनरी खड़ी करने का एक यत्न है, अर्थात सिर्फ ‘आप’ और भाजपा  दो ही लड़ाई में हैं। वह यह प्रभाव बनाने का यत्न कर रहे प्रतीत होते हैं कि ‘आप’ ‘शांति तथा विकास’ की प्रतीक है और इसके विपरीत भाजपा ‘भय और साम्प्रदायिकता’ की सूचक है। यदि यह लड़ाई तीव्र होती है और जिस प्रकार मीडिया इसे उछाल रहा है तो स्वाभाविक है कि इस वृत्तांत में फंस कर कांग्रेस तथा अकाली दल अप्रासंगिक लगने लग पड़ें। उल्लेखनीय है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ‘आप’ ने एक नया वृत्तांत बनाया था कि पुरानी परम्परागत पार्टियां कोई ‘बदलाव’ नहीं ला सकतीं। 
परन्तु मौजूदा वृत्तांत का लाभ अकेली ‘आप’ को ही नहीं होगा, अपितु यह पंजाब भाजपा के लिए भी एक वरदान है, क्योंकि इस प्रकार भाजपा हिन्दुओं में एक बार फिर आतंकवाद फैलने का भय दिखाकर तथा बंगाल के बाद पंजाब में अपना वृत्तांत बनाने में सफल हो सकती है। वह केन्द्रीय ताकत के डबल इंजन की सरकार के नारे से सुरक्षा के आश्वासन का वृत्तांत सृजित करेगी, जो हिन्दू वोट को तो आकर्षित करेगा ही, अपितु भाजपा शांति के इच्छुक तथा भाजपा में शामिल हो चुके कुछ सिखों के वोट भी ले सकेगी। दूसरी तरफ ‘आप’ स्पष्ट रूप में श्री आनंदपुर साहिब में विधानसभा के सत्र करके, बेअदबी विरोधी कानून बना कर तथा अब ‘शुक्राना यात्रा’ करके सिख मतदाताओं को विशेष रूप से जोड़ने की कोशिश कर रही है। इस प्रकार का विभाजन दोनों पार्टियों के पक्ष में है। देखने वाली बात यह है कि 2022 में भी ‘आप’ ने बेअदबी के आरोपियों को सज़ा दिलाने के नारे के तहत ही अकाली दल के वोट बैंक को आकर्षित किया था। ‘आप’ ने नशा खत्म करने तथा सुविधाएं देने के नाम पर दलित, गरीब तथा बैकवर्ड वोट को भी बहुत आकर्षित किया था। 
स्थिति यह है कि यदि अकाली तथा कांग्रेस इस नैरेटिव से कोई बड़ा तथा अलग नैरेटिव न बना सके तो वे स्पष्ट रूप में हाशिये की ओर धकेले जाएंगे। नि:संहेद अकाली दल तथा कांग्रेस में समझौता तो कोई अलोकार बात सी प्रतीत होती है, परन्तु राजनीति सम्भावनाओं का नाम है। फिलहाल मुख्य चर्चा में ‘आप’ तथा भाजपा ही हैं। वैसे बम धमाकों का राजनीतिकरण किसी तरह भी देश हित में नहीं है। दूसरी ओर अकाली दल तथा कांग्रेस भी इस स्थिति को समझ रहे हैं। हमारी जानकारी के अनुसार वे बम धमाकों की ज़िम्मेदारी पंजाब तथा केन्द्र पर डालने के लिए ज़ोरदार हमलों की रणनीति बना रहे हैं, क्योंकि सीमा से 50 किलोमीटर तक का क्षेत्र बीएसएफ की देख-रेख में आता है और पंजाब में अमन-कानून की ज़िम्मेदारी पंजाब सरकार की है। अब यह तो समय ही बताएगा कि कौन अपनी राजनीति में सफल रहता है।
हर एक हरबा है जायज़ अगर जंग-ओ-मुहब्बत में,
तमाशा बे-महल कर के सभी को बे-महल कर दो।
(बे-महल = अप्रासंगिक)
भाजपा आखिर क्या सोचती है?
एक ओर भाजपा पंजाब में अकेले सरकार बनाने के दावे कर रही है, दूसरी ओर केन्द्र की भाजपा सरकार पंजाब के साथ कहीं भी न्याय करती दिखाई नहीं देती। ताज़ा भेदभाव देश भर में 113 औद्योगिक कलस्टर बनाने के फैसले में पंजाब को सिर्फ 3 कलस्टर ही दिए गए हैं, पंजाब पहले ही उद्योगों में बहुत पिछड़ चुका है। अब चाहे सैनिक स्कूलों में सभी क्षेत्रीय भाषाएं पढ़ाने से एक तरह से इन्कार कर दिया गया है, परन्तु यह बात पंजाबियों को अधिक चुभेगी, क्योंकि सैनिक स्कूलों में सिस्टम को स्तरीय बनाने के नाम पर अंग्रेज़ी, हिन्दी तथा संस्कृत सिर्फ तीन भाषाओं की पेशकश ही की जा रही है। पंजाबी को चौथी अतिरिक्त भाषा बना दिया गया है। यह भी कहा गया है कि 9वीं से 12वीं कक्षा के विद्यार्थी पंजाबी सहित क्षेत्रीय भाषाओं में पंजीकरण तो करवा सकते हैं, परन्तु स्कूल उनके लिए कोई अध्यापक उपलब्ध नहीं करवाएगा। उल्लेखनीय है कि पंजाब चेतना मंच जैसी संस्थाएं इसे पंजाब से भेदभाव के रूप में ले रही हैं, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी इसका विरोध किया है। यह बदलाव स्पष्ट रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के भी विपरीत है। उल्लेखनीय है कि एक बार पहले भी सैनिक स्कूलों ने 2022 में ऐसा फैसला लिया था, परन्तु बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन तरलोचन सिंह तथा अन्य के विरोध के बाद क्षेत्रीय भाषाओं संबंधी फैसला बदल दिया गया था। 
आस क्या अब तो उम्मीद-ए-ना-उम्मीदी भी नहीं,
कौन दे मुझ को तसल्ली कौन बहलाए मुझे।
—मुंशी अमीरउल्ला तस्लीम
टकराव से डर लगता है
पंजाब सरकार द्वारा विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित ‘जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) कानून-2026’ सिखों में टकराव का कारण न बन जाए, इससे भय लगता है। यह ठीक है कि श्री अकाल तख्त साहिब तथा शिरोमणि कमेटी को अपने एतराज़ कानून बनने से पहले रखने चाहिए थे। पहले वह दुविधा में रहे और इसे सरकार पर छोड़ दिया गया। चाहे दोनों पक्षों पर राजनीतिक खेल खेलने के आरोप लगते रहे, परन्तु हमारे लिए चिन्ता तथा भय का कारण यह है कि इस संबंधी सिख कौम में विभाजन हो सकता है। वैसे भी इस कानून को इतनी जल्दबाज़ी में बनाया और पारित किया गया है कि यह कई सवाल पैदा करता है। इस कानून पर धार्मिक आपत्तियों के अतिरिक्त 5 बड़े सवाल भी खड़े हैं कि इसके तहत गिरफ्तारी के लिए किसी वारंट की ज़रूरत नहीं, ज़मानत की व्यवस्था नहीं, समझौता नहीं किया जा सकता, केस के फैसले के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है और सबसे बड़ी बात पुलिस की कोई जवाबदेही भी निश्चित नहीं है। ऐसी स्थिति में हम पंजाब के मुख्यमंत्री को विनती करना चाहते हैं कि वह अब भी श्री अकाल तख्त, सिख संस्थाओं तथा बुद्धजीवियों से इस संबंध में विचार-विमर्श करके इसमें आवश्यक संशोधन करने के लिए सहमति बनाएं, ऐसा पंजाब तथा सिख कौम दोनों के लिए ही अच्छा होगा और हमारी समझ के अनुसार ऐसे दृष्टिकोण का लाभ ‘आप’ को भी अवश्य होगा।
पुराने मंज़र के ़ख्वाबों से भी डर लगता है उन को,
पुराने मंज़रों से जिन की आंखें कट चुकी हैं।

-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
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