विधानसभा चुनावों के नतीजे भाजपा के पूरे भारत में मज़बूत होने का संकेत
पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे पूरे भारत में भाजपा के और मज़बूत होने और विपक्षी ‘इंडिया गठबंधन’ के लिए नए झटकों के साफ संकेत देते हैं। विपक्ष के दो दिग्गज नेता पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन हार गए हैं। जहां बंगाल में भाजपा की जीत ज़बरदस्त है, वहीं तमिलनाडु में टीवीके के नए-नए राजनीति में आए तमिल फिल्म स्टार विजय द्रमुक राजनीति के चुनावी नक्शे में एक प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर उभरे हैं। उन्होंने सत्ताधारी द्रमुक को दूसरे स्थान पर धकेल दिया है, जिससे तमिलनाडु की दो-ध्रुवीय राजनीति में तीसरी द्रविड़ पार्टी के आगमन का संकेत मिलता है।
गहन विश्लेषण से पता चलता है कि भाजपा ने असम में अपनी लगातार बढ़त को और मज़बूत किया है, केरल में पहली बार विधानसभा में तीन सीटें जीतकर अपनी पैठ बनाई है, बंगाल में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल किया है, और एम.के. स्टालिन के सत्ता से हटने का फायदा उठा रही है। भाजपा तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले अपने एनडीए गठबंधन के ज़रिये अपना राजनीतिक दांव-पेंच बखूबी खेल सकती है, जिसे टीवीके और द्रमुक के बाद तीसरा स्थान मिला है। इस तरह भाजपा को तमिलनाडु की राजनीति में बड़े पैमाने पर प्रवेश करने का एक बड़ा अवसर मिल रहा है, क्योंकि वह इस उथल-पुथल भरी स्थिति का फायदा उठा सकती है। अब यह टीवीके प्रमुख विजय पर निर्भर करता है कि वह मंत्रिमंडल गठन के लिए किसे चुनते हैं।
जहां तक कांग्रेस की बात है, पार्टी के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने 2026 के विधानसभा चुनावों में केरल को वापस जीत लिया है। इसकी उम्मीद पहले से ही थी, क्योंकि इस साल जनवरी में हुए स्थानीय चुनावों में कांग्रेस की बढ़त का रुझान पहले ही दिख चुका था। केरल में सत्ता का यह बदलाव एक सामान्य प्रक्रिया है। सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाला एलडीएफ हार गया है, लेकिन उसका सांगठनिक आधार अभी भी मज़बूत है और पार्टी, सीपीआई के साथ मिलकर, अगले चुनावों में फिर से सत्ता में वापसी के लिए लड़ने की स्थिति में है। केरल में कांग्रेस और वामपंथियों के लिए चिंता की बात यह होनी चाहिए कि राज्य में भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में एक सीट जीतने के बाद भाजपा ने विधानसभा में तीन सीटें हासिल कर ली हैं। भाजपा से उम्मीद की जा रही है कि वह 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले अपनी ताकत काफी बढ़ाने के लिए अपने दक्षिणी अभियान के तहत केरल में ज़ोरदार कोशिश करेगी।
कांग्रेस ने बंगाल में सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसका मकसद अपना खुद का स्वतंत्र आधार मज़बूत करना था। हालांकि पार्टी का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है, लेकिन वोटिंग प्रतिशत से सभी निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी की मौजूदगी का अंदाज़ा लगेगा। इससे पार्टी को आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल राज्य में सत्ताधारी भाजपा सरकार से मुकाबला करने के लिए अपनी राजनीतिक रणनीति का आकलन करने में मदद मिलेगी। असम में कांग्रेस को भाजपा की 82 सीटों के मुकाबले लगभग 19 सीटें ही मिली हैं। इसकी उम्मीद पहले से ही थी, क्योंकि कांग्रेस आलाकमान आखिरी पल तक असम में एक उचित संयुक्त मोर्चा बनाने में बुरी तरह नाकाम रहा। भाजपा के पास अपनी सम्प्रदायवादी रणनीति थी और वह काम कर गई। तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी द्रमुक पर निर्भर है। चुनाव के नतीजे ऐसे आने की उम्मीद नहीं थी। कांग्रेस के कुछ राज्य नेता तो चुनावों से पहले विजय से बात भी करना चाहते थे। अब यह देखना होगा कि कांग्रेस द्रमुक के साथ बनी रहती है या गठबंधन को लेकर कुछ नए सिरे से विचार करती है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि बंगाल में 15 साल के शासन के बाद टीएमसी सरकार को सत्ता से हटाना रही है। भाजपा आलाकमान ने ‘अंग’ और ‘कलिंग’यानी बिहार और ओडिशा के बाद ‘बंग’ (बंगाल) को जीतने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए हर संभव कोशिश की। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने ही बैठकों, रोड शो और रणनीति सत्रों के लिए बंगाल में कई दिन बिताए। भारत के चुनावी इतिहास में, किसी भी अन्य राज्य में अधिकारियों का इतने बड़े पैमाने पर तबादला नहीं हुआ है, और इनमें से कई तबादले भाजपा नेताओं द्वारा दी गई सूची के आधार पर किए गए थे। चुनावों से पहले और चुनावों के दौरान, टीएमसी सरकार और पार्टी, दोनों ही पूरी तरह केंद्रीय सरकारी मशीनरी की घेराबंदी में थीं।
सत्ता-विरोधी लहर के अलावा, केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका ने भी चुनावों में टीएमसी की हार में एक अहम भूमिका निभाई। जब वोटिंग के आंकड़ों का पूरा ब्योरा सामने आएगा, तो विश्लेषण करना और भी आसान हो जाएगा, लेकिन अभी यह साफ ज़ाहिर है कि एसआईआर के तहत मतदाताओं के नामों को बड़े पैमाने पर हटाने से टीएमसी पर बुरा असर पड़ा। टीएमसी की अपनी चुनावी मशीनरी, जिसने पिछले दो चुनावों में ‘फर्जी मतदाताओं’ का इस्तेमाल किया था, केंद्रीय बलों द्वारा बूथों की व्यापक गश्त और जांच के कारण इस बार कोई फायदा नहीं उठा पाई। निश्चित रूप से, हिंदू मतदाताओं का एक बड़ा ध्रुवीकरण हुआ, लेकिन यह दक्षिण बंगाल में टीएमसी के गढ़ों में उसकी करारी हार को सही नहीं ठहराता। वोटिंग के आंकड़े यह दिखा सकते हैं कि मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा उम्मीदवारों की ओर मुड़ गया।
टीएमसी नेतृत्व, विशेष रूप से ममता बनर्जी के लिए, यह चुनौती बहुत बड़ी है। टीएमसी की मौजूदा ताकत 80 है, जबकि भाजपा के पास 206 सीटें हैं। इसके साथ ही, भाजपा का राज्य नेतृत्व टीएमसी की पूरी मशीनरी को पंगु बनाने पर तुला रहा। चुनाव के बाद के दिनों में बंगाल में इससे गम्भीर आंतरिक टकराव पैदा हो सकते हैं। केंद्रीय बल अगले 60 दिनों तक वहां तैनात रहेंगे, लेकिन उनकी निष्पक्षता पर संदेह बना हुआ है। इस पृष्ठभूमि में, टीएमसी को अपनी कई समस्याओं को सुलझाना होगा। इस हार के बाद ममता बनर्जी इन सभी मुद्दों से कैसे निपटती हैं, यह देखने वाली बात होगी। ‘इंडिया गठबंधन’ को चुनाव नतीजों की समीक्षा करने और भाजपा तथा नरेन्द्र मोदी सरकार का मुकाबला करने के लिए एक ठोस रणनीति बनाने के लिए अपने सहयोगी दलों की बैठक तुरंत बुलानी चाहिए। भाजपा और केंद्रीय एजेंसियों की ज़बरदस्त ताकत के आगे ‘इंडिया गठबंधन’ के सभी दलों को झुकना पड़ा है। इसलिए उन्हें अपने आपसी अहम की समस्या को सुलझाना होगा और एनडीए तथा मोदी सरकार के खिलाफ लड़ाई के लिए हाथ मिलाना होगा। देश की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।
विधानसभा चुनावों के बाद का यह दौर ‘इंडिया गठबंधन’ के लिए एक बुरा मोड़ साबित हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे लोकसभा चुनावों के बाद का समय भाजपा के लिए कुछ समय के लिए एक मुश्किल दौर था। ‘इंडिया गठबंधन’ के नेताओं को यह समझना होगा कि अब समय तेज़ी से निकलता जा रहा है। अगर वे हाथ नहीं मिलाते और पूरी दृढ़ता के साथ ‘भगवा’ ताकतों का मुकाबला नहीं करते, तो एक राष्ट्र के तौर पर भारत खतरे में पड़ जाएगा। (संवाद)



