जीवन कतार का पहला स्थान
बच्चा पढ़ता नहीं था, अच्छी डिग्रियां नहीं हासिल करता था, तो मां-बाप सिर पीट लेते थे, कि पढ़ा-लिखा नहीं, हमारे तो भाग्य फूट गये। ज़िन्दगी कैसे काटेगे? कौन इस नौकरी देगा? इसकी जीवन नय्या कैसे चलेगी? परिवार का तो भाग्य ही रसातल में गया, परन्तु यह पुराने ज़माने की बात है, साहिब। आजकल ज़िन्दगी के बाज़ार में पढ़ाई का अवमूल्यन हो गया है। कोई कितना शातिर है, बस इसका महत्त्व है। जानते हैं आजकल बड़ी से बड़ी डिग्री बाज़ार में बिकने लगी है। जाली विद्यालयों की कतार लगी है। अब तो सुना है, ईनाम भी बिकने लगे है। पैसा फैंको ताज पहनो।
कभी आपने सुना है कि हर बड़ा लोकप्रिय अभिनेता और नेता इतनी अच्छी और विचारोत्तेजक आत्म-कथा लिख कर उसे पुस्तक बाज़ार में कैसे प्रस्तुत करने लगा है। उनकी इतनी अच्छी लिखी हुई किताबें आपको लहलहा दें, तो उनको लिखने वाले उन उदीयमान बेकार लेखकों की कल्पना कर लीजियेगा, जो उदय होने से पहले ही अस्त हो गये। अब अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिए इनके नाम से इनकी कथित आत्म-कथा लिखते हुए इन्हें क्लासिक बना रहे हैं। सुना है वास्तव में लिखी गई जैनुअन संघर्षशील कलाकारों और साहित्यकारों से अधिक ये किताबें बिक्री के खिताब ले रही हैं।
आज असल पर नकल भारी हो गई, और जीवन पर आडम्बर। जीवन के किसी भी क्षेत्र में असाधारण सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति की जगह उसकी छवि या आडम्बर अधिक प्रश्रय प्राप्त कर गया है। नेता बनना है न, तो उसके लिए जन-सेवा, बलिदान या अपने घर द्वार की चिंता छोड़ कर सब की चिंता करनी कभी ज़रूरी थी। मोती लाल नेहरू ने सस्ते ज़माने में अपनी करोड़ों की जायदाद देश के लेखे लगा कर देश-सेवा के लिए एक लंगोटी वाले का दामन थामा था। वह पहले कभी खुद बैरिस्टर था। जब देश की लौ लगी तो वह आधी चादर ओड़ विलायत के बादशाह से अपने देश की आज़ादी मांगने के लिए मिलने चला गया था।
अब नेतागिरी में आये हो तो चार बरस में अगर रोडपति से करोड़पति न हो गये, तो कैसी नेतागिरी को अपनाया? अरे आज तो उनके चेले चांटे ही कम नहीं। दुनिया जहान के हर अवैध काम को चुटकियों में करवा देने का भरोसा दे कर वे पैदल से बड़ी गाड़ी हो रहे हैं।
फिर आदमी पढ़े क्यों? भाषा का ज्ञान क्यों ले? व्याकरण में महारत क्यों हासिल करे? मैटा, गुगल और कृत्रिम मेधा के राज्य में इतना कष्ट करने की ज़रूरत ही क्या है? जो बोलो लैपटॉप के आधुनिक संस्करण न केवल उसे लिखते हैं, बल्कि उसकी भाषा भी अशुद्ध से शुद्ध, परिमार्जित और संवर्धित करके आपके लिए पेश कर देते हैं।
आप पुस्तक संस्कृति के मरने की बात करते हैं? यहां तो हर पहचान का इच्छुक अपनी-अपनी कांख में एक-एक किताब दबाये घूम रहा है। जानिये, आज के ज़माने में किताबों की कम्पोज़िंग और हज़ारों की तादाद में किताब छाप कर गोदामों में रखने वाले प्रकाशक गायब हो गये हैं। अब लैपटॉप ही आपकी छपने के काबिल किताबों का जनक है। एक अच्छी मां की तरह उन्हें अपने पेट में सम्भाल भी सकता है। फिर गोदाम में उन्हें संभालने की क्या ज़रूरत? मशीन चालू करो, सीधी छपने योग्य पुस्तक हाज़िर हो जाएगी। छापेखाने में दे दो, आपकी ज़रूरत की किताबें हाज़िर हो जाएंगी। लेखक की दस कॉपी, जो उसका एकमात्र पावना है। बांटने के लिए कुछ प्रतियां और चाहें तो आधी कीमत पर खरीदें। यह आधी कीमत इन प्रतियों की लागत से कहीं अधिक होती है। बस उन पुस्तकों के लेखक महान हो रहे हैं, जो कृत्रिम मेधा की कृपा से बाहर आई हैं। इन्हें शायद लेखक ने भी कभी नहीं पढ़ा। जैसे सत्ता के कर्णधारों से पूछिये कि हर महत्त्वपूर्ण दिन पर जो उनके सारगर्भित लेख छपते हैं, वे उनके किस ज़रूरतमंद कारिन्दे ने लिखे हैं, क्या उन्हें याद है?
अजी लिखने की छोड़िये, आज तो उनकी प्रशंसा में आयोजित गोष्ठियां भी पेशेवर और शार्टकट हो गईं। जो समर्थ लेखन में आया या राजनीति में, अगर चार दिन मेें ही उसने क्षेत्र का ताज अपने शीश पर नहीं पहना तो वह क्या इस क्षेत्र में आया।
हथेली पर सरसों जमा कर दिखाना आज दुनिया का दस्तूर हो गया है। लोग आजकल अपने प्रशंसक साथ ले कर चलते हैं, और तटस्थ मूल्यांकन का मतलब प्रशस्ति गायन हो गया है। इतिहास नायक पृथ्वी राज चौहान को तो अपनी अमर गाथा मिली क्योंकि उसके पास अपने मित्र चन्द बरदाई की कलम थी, जिसने उसके लिए पृथ्वी राज रासो लिख डाली।
आज तो आर्थिक रूप से सामर्थ्यवान हर लेखक लिखना शुरू करने से पहले अपना चन्द बरदाई साथ लेकर चलता है। सेवानिवृत्ति का बड़ा भुगतान प्राप्त करने के बाद वह क्या करे? लेखन का सुनियोजित धंधा उभर आया है। मुक्त अभिव्यक्ति के नाम पर लोग विचारचर्चाओं को नकार रहे हैं। अफसरों को पटाने के लिए चार आदमी उनके कमरे में जा कर उनसे अपनी कथित पुस्तकों का उद्घाटन करवाते हैं, और फिर मशीनी सोशल मीडिया में इसे युग प्रवर्त्तक घटना का घट जाना करार देते हैं। लीजिये, अचानक पुस्तक संस्कृति इस रूप में निर्जीव से जीवित हो उठी। लेखक उपेक्षा की जगह अभिनंदन प्राप्त करने लगे, और साहित्य के इस उजाड़ बियाबान को रेगिस्तान कहने की जगह नखलिस्तान मिल जाने का दावा कर रहे। इस नखलिस्तान में अपने मित्रों का पुष्पित अभिनंदन प्राप्त कर रहे हैं।



