थलापति विजय ने ऐसे लिखी कामयाबी की परी-कथा

तमिलनाडु की राजनीति में 2026 का विधानसभा चुनाव एक ऐतिहासिक मोड़ बनकर उभरा है। अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय चंद्रशेखर उर्फ थलापति विजय की तमिलगा वेट्री कझगम यानी टीवीके ने न केवल चुनावी समीकरण बदल दिए हैं बल्कि पिछले 6 दशक से प्रदेश की राजनीति की दिशा तय कर रही द्रविड़ियन राजनीति की जड़ों को चुनौती दी है। किसी ने नहीं सोचा था कि जिस दिन 2026 विधानसभा चुनाव के परिणाम आएंगे, एक झटके में सारी राजनीति बदल जायेगी। हालांकि बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे दौर की वोटिंग के तुरंत बाद 29 अप्रैल, 2026 को जो पांचों राज्य विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल आये थे, उनमें एक पोल एजेंसी ‘एक्सेस माई इंडिया’ ने भविष्यवाणी की थी कि तमिलनाडु की राजनीति में उलटफेर हो सकता है। 
टीवीके किंगमेकर की जगह खुद किंग बनकर उभर सकती है। इस पोल एजेंसी का मानना था कि टीवीके इस चुनाव में 98 से 120 तक सीटें जीत सकती है, लेकिन उसके अलावा किसी और ने इस पार्टी को 1 से लेकर 6 सीटों से ज्यादा नहीं दी थी। ऐसे में लग रहा था कि शायद 6 दूसरी पोल एजेंसियों से यह अलग इसलिए जा रही है, क्योंकि इसका कोई टीवीके के साथ विशेष लगाव है या खास बायस है, यही कारण है कि लोग इसे गंभीरता से नहीं ले रहे थे।  लेकिन जब 4 मई, 2026 को मतगणना शुरू हुई तो पहले 30 मिनट के भीतर ही टीवीके ने अपने को लेकर की गई भविष्यवाणी के रंग दिखाने शुरू कर दिये और दोपहर के 12 बजते-बजते यह पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई। सालों से चुनाव नतीजों का विश्लेषण कर रहे मशहूर समाजशास्त्री और सेफोलॉजिस्ट योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘टीवीके ने तमिल राजनीति में इतना बड़ा उलटफेर किया है, जिसकी आम चुनाव विश्लेषकों की तो छोड़िये, राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले किसी भी विशेषज्ञ ने कल्पना तक भी नहीं की थी।’ इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तमिल विधानसभा चुनाव में टीवीके ने विजय का जो परचम फहराया है, वह कितनी बड़ी बात है। महज दो साल पहले अस्तित्व में आयी और कई तरह के हिचकोले खाती हुई विधानसभा चुनाव तक पहुंची टीवीके ने अपने पहले चुनाव में ही इस तरह का इतिहास रच दिया है कि बड़े-बड़े चुनावी पंडितों को उसको समझने के लिए अपने सारे सिद्धांतों को उलटफेर करना पड़ रहा है। टीवीके का यह पहला चुनाव प्रदर्शन ही इतना जबर्दस्त रहा है कि न केवल उसने पहली बार में ही 234 सीटों में से 108 सीटें जीतकर तमिलनाडु की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी है, साथ ही उसने इस चुनाव में 34.92 प्रतिशत वोट हासिल किए, जो तमिलनाडु की सभी राजनीतिक पार्टियों में से सबसे ज्यादा है।
इस बार के चुनाव में जहां सबसे मजबूत दावा पेश कर रही द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने 59 सीटें हासिल कीं, वहीं दूसरी प्रमुख प्रतिद्वंदी द्रविड़ पार्टी, आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) और उसके समूचे गठबंधन को कुल मिलाकर 47 सीटें मिलीं हैं, जोकि 2021 के मुकाबले 19 सीटें कम हैं। 2021 में एआईएडीएमके को 66 सीटें मिली थीं, जबकि तब डीएमके को 133 सीटें मिली थीं। इस बार उसे 73 सीटें कम मिली हैं। इस तरह देखा जाए तो डीएमके को जहां 24 प्रतिशत, एआईएडीएमके को 21 प्रतिशत, कांग्रेस को 3 प्रतिशत, भाजपा को लगभग 3 प्रतिशत और अन्य सभी पार्टियों को मिलाकर करीब 13.5 प्रतिशत वोट मिले हैं। वहीं इन सबसे ज्यादा टीवीके ने अकेले करीब 35 प्रतिशत वोट हासिल किए, जोकि डीएमके से 10 प्रतिशत और एआईएडीएमके से 14 प्रतिशत से ज्यादा हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि टीवीके ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में किस कदर तहलका मचाया है। अभिनेता से नेता बने थलापति विजय ने अपने अविश्वसनीय प्रदर्शन से राजनीति की सफल इबारत लिख दी है। प्रदेश की राजनीति में वह डीएमके और एआईएडीएमके के मजबूत विकल्प बनकर उभरे हैं और जनाकांक्षाओं का नया केन्द्र बन गये हैं। 
मगर सवाल है उन्होंने आखिर यह सफलता हासिल कैसे की? दरअसल उनकी रणनीति युवा मतदाताओं पर फोकस, भ्रष्टाचार विरोधी छवि और फिल्मी लोकप्रियता की साझी कामयाबी का कॉकटेल है। खास बात यह है कि वह तमिलनाडु की राजनीति में भरोसे और बदलाव के रूप में उभरे हैं। उनकी भावनात्मक अपील और ठोस वायदों का समीकरण मतदाताओं को उनकी तरफ आकर्षित करने में अहम भूमिका निभायी है क्योंकि तमिलनाडु में मतदाता एक ऐसे विकल्प की तलाश में थे, जो एमके स्टालिन की निरंकुश हो चुकी राजनीति के लिए ज़रूरी था। इस मायने में यह एक साधारण जीत नहीं है बल्कि तमिल राजनीति का एक मजबूत विकल्प है। यही कारण है कि उनकी जीत को विश्लेषकों ने सीटों की संख्या के आधार पर नहीं बल्कि एक राजनीतिक संस्कृति के उदय के रूप में चिन्हित किया है। उनका करिश्माई व्यक्तित्व, साफ-सुथरी छवि और पारंपरिक जातीय तथा सरलीकृत द्रविड़ समीकरणों की राजनीति को पीछे छोड़ना थलापति विजय की एक बहुत बड़ी कामयाबी है, जिससे यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या उनके साथ ही तमिलनाडु से द्रविड़ियन राजनीति की विदाई हो जायेगी?हालांकि इस तरह का अनुमान अभी न केवल जल्दबाजी है बल्कि वाकई सरलीकृत होगा। क्योंकि 1967 के बाद से द्रविड़ियन राजनीति, तमिल राजनीति की न केवल अस्मिता बनकर उभरी है बल्कि उसके पार किसी ने अभी तक कुछ सोचा ही नहीं। इसलिए यकायक एक झटके में द्रविड़ियन राजनीति इस कदर नहीं उखड़ सकती, जिसकी टीवीके की कामयाबी से अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन यह भी सही है कि टीवीके की कामयाबी ने द्रविड़ राजनीति को एक संक्रमण काल में तो साबित ही कर दिया है लेकिन इसकी वैचारिक जड़े अभी बहुत मजबूत हैं और टीवीके का विकल्प इतना मजबूत नहीं है, न अभी किसी तरह से बल्कि तरह के तुलनात्मक झंझावतों से गुजरा है। इसलिए इतना बड़ा श्रेय बिना किसी ठोस मुठभेड़ के नहीं दिया जा सकता। फिर भी जिस तरह से टीवीके ने डीएमके और एआईएडीएमके दोनों को हतप्रभ करते हुए सत्ता की पहली दावेदार बनकर उभरी है, उससे यह तो माना ही जा सकता है कि तमिलनाडु का मतदाता अब परम्परा से ज्यादा प्रदर्शन और विकल्प को प्राथमिकता दे रहा है। 
हालांकि दोनों के गठबंधनों की संयुक्त ताकत भले टीवीके से ज्यादा हो, लेकिन दोनों द्रविड़ पार्टियां मिल करके भी टीवीके के बराबर सीटें नहीं जीत पायीं। यह विजय की अकेली स्टार पावर नहीं है बल्कि उनका मतदाताओं के साथ यह सही वेबलेंथ पर राजनीतिक कनेक्ट है। इसे सिर्फ तात्कालिक आकर्षण कहना सरलीकरण होगा। दो साल कम नहीं होते और मतदाता भी कम पारखी नहीं होते। आखिरकार पिछले दो सालों में तमिलनाडु के मतदाताओं को कुछ तो उनमें ऐसा दिखा होगा, जो सारे स्थापित राजनेताओं पर भारी पड़ा है। तभी तो टीवीके ने ऐतिहासिक विजय हासिल की है और कामयाबी की ऐसी परीकथा लिखी है कि पूरा देश उसे समझने और समझाने में लगा है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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