गुलाब निर्यात योजना की व्यवहारिकता को भी देखने की ज़रूरत 

अपने नीदरलैंड के दौरे के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने फसली-विभिन्नता लाने हेतु बासमती संबंधी जो ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (उच्च श्रेणी का केन्द्र) स्थापित करने का फैसला किया था, उसके बाद अब बागवानी (हॉर्टिकल्चर) में गुलाब का उत्पादन करके निर्यात करने की योजना का ऐलान किया है। इसे शुरू करने से पहले इस प्रोजेक्ट की तकनीकी जांच करवा लेनी चाहिए। पंजाब का पर्यावरण और जलवायु पूरा वर्ष गुलाब उगाने के लिए अनुकूल नहीं है। 
गुलाब की काश्त सर्दियों में अक्तूबर के मध्य से लेकर फरवरी तक की जा सकती है। शेष महीनों में यहां बहुत गर्मी पड़ती है। गुलाब की काश्त के लिए ठंडे मौसम की ज़रूरत होती है। पॉली हाउस तकनीक अपनाने से उत्पादन का खर्च बहुत बढ़ जाता है। इसके लिए लगातार बिजली की ज़रूरत होती है। जब बिजली के कट लगते हैं तो जैनरेटर का खर्च असहनीय हो जाता है। गुरप्रीत सिंह शेरगिल जो गांव मजालखुर्द (पटियाला) में फूलों की काश्त करते हैं और इस व्यवसाय में एन.जी. रंगा-2015, आईएआरआई फेलो फार्मर 2016, नैशनल इनोवेटिव फार्मर और जगजीवन राम इनोवेटिव फार्मर पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं और मुख्यमंत्री बागवानी पुरस्कार से भी सम्मानित हैं, कहते हैं कि यहां गुलाब और फूलों की काश्त की बहुत सम्भावना है, परन्तु सरकार द्वारा सुविधाएं देने की ज़रूरत है। फूल उत्पादक कई वर्षों से मांग कर रहे हैं कि पंजाब में फूलों की मंडी स्थापित की जाए, चाहे सरकार एमएसपी घोषित न भी करे। इसलिए पिछली सरकार ने मोहाली में मंडी स्थापित करने के लिए कुछ कदम उठाए थे, जो पूरे नहीं हुए। गुरप्रीत सिंह शेरगिल का कहना है कि मंडी लुधियाना में स्थापित करनी उचित होगी, क्योंकि यदि मोहाली या चंडीगढ़ में स्थापित की तो हिमाचल प्रदेश के किसान अधिक फायदा उठाएंगे।
आईएआरआई द्वारा गुलाब की सफल और लाभदायक किस्में विकसित की गई हैं, जिन्हें उगाकर पांच सितारा होटलों में बेच कर अच्छी कमाई की जा सकती है, लेकिन सिर्फ सर्दी के मौसम में। पंजाब के मौसम में लगातार पूरा साल गुलाब की काश्त नहीं होगी। सिकंदर सिंह ने पटियाला के पास सरहिंद रोड पर 4-5 एकड़ में गुलाब की काश्त की थी, जो सफल नहीं हुई। बागवानी विभाग के पूर्व उप-निदेशक (सेवा-निवृत्त) डॉ. स्वर्ण सिंह मान का कहना है कि राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत पंजाब और हरियाणा में गुलाब के कई प्रोजेक्ट पॉली हाउस बना कर शुरू किए गए थे, जो गर्मी के कारण बंद हो गए। देसी गुलाब और कट-फ्लावर हाइब्रिड, दोनों की काश्त गर्मी के 7-8 महीने में करने की समस्या है। अगर सरकार फूलों की काश्त के मंडीकरण के लिए ज़रूरी सुविधाएं दे तो पूसा-आईएआरआई द्वारा विकसित पूसा अरुण, पूसा शताब्दी, पूसा अजय, पूसा कोमल और पूसा मोहित जैसी किस्मों का गुलाब उगाया जा सकता है जो शीत ऋतु में व्यापार के लिए अधिक अनुकूल है। फूलों के मंडीकरण का उचित प्रबंध न होने के कारण छोटे किसान पांच सितारा होटलों, प्रदर्शनियों और बड़े-बड़े संस्थानों जो सजावट के लिए गुलाब खरीदते हैं, के साथ सम्पर्क नहीं कर सकते।
डॉ. अलाहरंग, जो पीएयू से सेवा-निवृत्त होकर रखड़ा-धबलान मार्ग पर 100 एकड़ से ज़्यादा रकबे पर फूलों के बीज पैदा करते हैं और 1100 एकड़ पर अन्य किसानों के साथ बीज तैयार करवा कर उनसे खरीदते हैं और उनका निर्यात करते हैं, का कहना है कि फूलों की काश्त से किसानों को 1.25 लाख रुपये प्रति एकड़ की आय हो जाती है। उन्होंने पहली बार 1993 में 25 किलो फूलों का बीज निर्यात किया था जो अब 250 टन निर्यात करते हैं। फूलों के बीज पैदा करने वाले किसानों ने बताया कि वे धान-गेहूं के फसली चक्कर से दो-तीन गुना आय प्राप्त करते हैं। फूलों का बीज तैयार करने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 35 हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर की सब्सिडी भी मिलती है। 
गुलदाउदी के फूल किसानों के लिए आय का अच्छा स्रोत हैं। पूसा ने गुलदाउदी की भी कई किस्में विकसित की हैं, जिन्हें अपना कर कई छोटे और प्रगतिशील किसान फूलों की काश्त करके अपनी आय बढ़ा सकते हैं। कई किस्में लगातार पूरा साल फूल देती हैं। पूसा द्वारा विकसित गुलदाउदी की सोना किस्म जो अन्य किस्मों के मुकाबले 20 दिन पहले फूल दे देती है, गमलों में लगाने के लिए अनुकूल है और किसान इस तरह के फूल बेच कर लाभ ले सकते हैं। यदि सरकार द्वारा सही मंडीकरण का प्रबंध किया जाए तो फूलों के खरीददारों की कोई कमी नहीं होगी।
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