बिखरता शीराज़ा
गत दिवस 5 राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद देश की राजनीति में जो महत्त्वपूर्ण बातें उभरी हैं, उनमें ‘इंडिया गठबंधन’ के बिखर रहे शीराज़े की बात अधिक उभरी है। एक समय था जब इस गठबंधन ने भाजपा और इसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) को एक चुनौती दी थी। वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के समय इस गठबंधन का प्रभाव भी सामने आया था, जिस कारण लोकसभा में भाजपा की सीटें कम हुई थीं और उसे सरकार बनाने के लिए अपने सहयोगियों का सहारा लेना पड़ा था। उस समय कांग्रेस भी 99 सीटें जीत कर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी थी। लोकसभा में राहुल गांधी को विपक्षी दलों का नेता चुन लिया गया था। इंडिया गठबंधन बनाने की योजना जुलाई, 2023 को पटना में बनाई गई थी।
कांग्रेस का भी उस समय राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में शासन था। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, तमिलनाडू में डी.एम.के. (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) और दिल्ली में ‘आप’ की भी उस समय तूती बोलती थी। उड़ीसा में भी बीजू जनता दल का शासन था। लोकतंत्र में राजनीतिक हालात एक जैसे नहीं रहते। इनमें लगातार बदलाव आते रहते हैं। किसी भी गठबंधन को लम्बी अवधि तक प्रभावशाली ढंग से स्थापित रखने के लिए पार्टियों के भीतर इस संबंध में प्रतिबद्धता का होना ज़रूरी होता है और बदलते हालात में अपनी पार्टी को पहल देने के स्थान पर साझी भावना और एकता को प्राथमिकता देनी बनती है। राजनीतिक नेताओं के लिए भी अपने अहंकार और अवसरवादी राजनीति को दर-किनार करना ज़रूरी होता है। कभी 26 पार्टियों द्वारा दिखाई गई एकजुटता आज कुछ वर्षों बाद ही हांफती और बिखरती दिखाई देने लगी है। धीरे-धीरे इसका दम निकलता दिखाई दे रहा है। इससे पहले वर्ष 2004 में यू.पी.ए. (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस) का संगठन बना था, जिसमें कांग्रेस बड़ी सहयोगी पार्टी थी। उसके बाद ही उसकी तज़र् पर वर्ष 2023 में ‘इंडिया गठबंधन’ बनाने की घोषणा की गई थी। नितीश का जनता दल (यू) भी उसमें शामिल था, परन्तु बाद में जनता दल (यू) ने पाला बदल लिया था। कुछ समय बाद ‘आप’ भी पीछे हट गई थी। इंडिया गठबंधन के एक और सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल ने भी इसे छोड़ दिया था।
पिछले वर्ष हुए दिल्ली चुनाव में चाहे ममता, अखिलेश यादव, शरद पवार और उद्धव ठाकरे आदि ने अपनी पार्टियों का पूरा समर्थन उस समय सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को दिया था परन्तु कांग्रेस उसके साथ मिलकर चुनाव लड़ने के स्थान पर अकेले चुनाव मैदान में उतरी थी। उस समय दिल्ली की 70 में से भाजपा 48 सीटें जीत गई थी। ‘आप’ को 22 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को एक सीट भी प्राप्त नहीं हुई थी। सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई थी। पिछले वर्ष उमर अब्दुल्ला ने चुनाव के दौरान ‘इंडिया गठबंधन’ की पार्टियों के आपसी घमासान को देखते हुए यह कहा था कि यह गठबंधन अब वैंटीलेटर पर है। इस समय इसकी स्थिति यह है कि जैसे इसे वैंटीलेटर से भी उठा लिया गया हो। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी 15 वर्षों के शासन के बाद इस तरह घमंड में आ गई प्रतीत होती थी कि उन्होंने इंडिया गठबंधन में अपनी सहयोगी रही कांग्रेस के साथ भी इकट्ठे चुनाव मैदान में उतरने से इनकार कर दिया था। तमिलनाडू में एम.के. स्टालिन ने ज़रूर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। एक तरफ ‘इंडिया गठबंधन’ पूरे बिखराव की स्थिति में है, दूसरी तरफ अब 5 राज्यों के हुए चुनाव में भाजपा और भी मज़बूत होकर निकली है। आगामी समय में इसका राज्यसभा में भी प्रभाव बढ़ता दिखाई देगा।
आगामी वर्ष 2027 में पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और हिमाचल प्रदेश के चुनाव आ रहे हैं। भाजपा इस समय देश में सबसे शक्तिशाली और मज़बूत राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी है। यदि कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों ने आगामी समय के लिए सूझबूझ वाली और मज़बूत योजनाबंदी न की तो उनकी हालत और भी बदतर होने का अनुमान लगाया जाना कठिन नहीं होगा। ऐसी स्थिति में मज़बूत बनकर उभरी भाजपा को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व में अपना सैद्धांतिक एजेंडा लागू करने में कोई ज्यादा मुश्किल पेश नहीं आएगी, जिसके हर तरह के परिणाम भुगतने के लिए देश और देशवासियों को तैयार होना पड़ेगा।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

