बौखलाहट को छोड़ कर ममता दीदी को मंथन करना चाहिए
पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार के बाद, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी खुद की सीट भी गंवा दी है, से बौखलाकर उन्होंने एक प्रैस कॉन्फ्रैस कहा है कि वह सीएम के पद से इस्तीफा नहीं देंगी, क्योंकि वह चुनाव हारी नहीं हैं बल्कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलकर उनकी 100 सीटें लूटी हैं। उनका यह भी आरोप है कि चुनाव से दो दिन पहले उनके लोगों को गिरफ्तार किया गया और जगह-जगह छापे मारे गये। हालांकि चुनाव सम्पन्न होने के तुरंत बाद या मतगणना के पहले तक उन्होंने नहीं कहा था कि चुनाव के दो दिन पहले उनके लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यही नहीं जब ऐतिहासिक बंपर वोटिंग पड़ रही थी, जो आज़ादी के बाद आजतक किसी भी चुनाव में नहीं पड़ी थी, तब उनका ताल ठोककर यही कहना था कि वह भाजपा को बुरी तरह से हरायेंगी। उनके मुताबिक प्रदेश में हो रही बंपर वोटिंग भाजपा की एसआईआर साजिश का बदला है। उनके मुताबिक भारी तादाद में मतदाता उन्हें जिताने के लिए घरों से निकले ताकि भाजपा की कोई मंशा पूरी न हो सके।
लेकिन मतगणना के बाद जब रिजल्ट आया, तो सन्नाटा छा गया। भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने मिलकर प्रदेश में 208 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस और उसके गिने चुने साथी मिलकर कुल 80 सीटें ही जीत सके जबकि दोनों के वोट प्रतिशत में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। भाजपा को जहां 45.84 प्रतिशत वोट मिले हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस को करारी हार के बाद भी 41.08 प्रतिशत वोट मिले हैं। इस तरह देखा जाए तो कुल 4 प्रतिशत का ही फर्क है और अगर समय रहते ममता बनर्जी थोड़ी सी विनम्र होकर कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लेतीं, जो कि महज 10 सीटों तक में गठबंधन स्वीकार करने के लिए तैयार थी, तो आज शायद उनकी यह हालत नहीं होती। कांग्रेस को इस चुनाव में भले महज दो सीटें मिली हों, लेकिन उसे 2.97 प्रतिशत मत मिले हैं। ममका बनर्जी पश्चिम बंगाल के बाहर तो वाम दलों के साथ भी एकजुट होने के लिए तैयार हैं, क्योंकि उनका कहना है कि भाजपा को हराने के लिए कुछ भी किया जा सकता है, किन्तु पश्चिम बंगाल में भी अगर थोड़ा बहुत कुछ एडजस्ट कर लेतीं, तो शायद आज जीत का सेहरा तृणमूल कांग्रेस के गले में होता।
चुनाव के समय तो ममता दीदी यही कह रह रही थीं कि वो प्रदेश में सारे दलों की छुट्टी कर देंगीं। उन्हें निर्णायक बहुमत मिलने जा रहा है, लेकिन अब जबकि जनता ने उनको हकीकत का आईना दिखा दिया है, तो वह इस चुनाव को ही मानने को तैयार नहीं। एक और बात गौर करने लायक है। ममता बनर्जी ने बार-बार कहा है कि भाजपा की चुनाव आयोग के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में वोटों की डकैती की है और प्रदेश के मतदाता इसे किसी भी रूप में नहीं स्वीकार करेंगे। लेकिन क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि उनकी करारी हार के बाद प्रदेश में कहीं भी मतदाता उनके पक्ष में सड़कों पर नहीं उतरे। यहां तक कि उस भवानीपुर में भी टीएमसी के पक्ष में हजार लोग सड़कों पर नहीं निकले, जहां पर वह खुद 15000 से ज्यादा वोटों से हार गई हैं। सोशल मीडिया में जितने भी आम लोगों के सीधे इंटरव्यू दिखाये गये हैं, उनमें से आधे से ज्यादा ने तो डरकर कैमरे में कुछ कहने से मना कर दिया, लेकिन जिन्होंने कुछ कहा भी, उनमें से ज्यादातर का यही मानना था कि टीएमसी कार्यकर्ताओं की गुण्डागर्दी से वो बहुत परेशान हैं।
ममता बनर्जी ने जिस तरह से पूरे चुनाव को बाहरी बनाम भीतरी का रंग दे दिया था, उससे प्रदेश के बाहर के लोग बेहद डरे हुए थे। उन्हें लग रहा था कि अगर टीएमसी जीतकर आती है तो उनकी खैर नहीं होगी। अगर इस दहशत ने भाजपा के पक्ष में कुछ प्रतिशत वोट बढ़ाएं हों, तो आश्चर्य नहीं क्योंकि बंगाल की कम से कम 45 सीटों पर हिंदी भाषी यानी बाहरी लोगों की अच्छी खासी संख्या मौजूद है और इन सीटों पर टीएमसी पिछली बार के मुकाबले इस बार सिर्फ एक तिहाई सीटें ही जीत सकी है। इससे साफ पता चलता है कि टीएमसी की इस तरह की हार के पीछे साजिश या बेईमानी से ज्यादा वजह उनके 15 सालों की ऐंटीइनकमबेंसी थी। लोग उनसे त्रस्त हो चुके थे। प्रदेश में जिस स्तर की बेरोज़गारी और जिस तरह का बाहरी बनाम भीतरी का उन्होंने धुव्रीकरण कर दिया था, उससे भी लोग डरे हुए थे, परेशान थे और शायद उन्होंने अपने डर और गुस्से का बदला भाजपा को जिताकर लिया है। टीएमसी या ममता बनर्जी जिन मुस्लिम मतदाताओं पर आंख मूंद कर भरोसा कर रही थीं, इस बार वह मुस्लिम मतदाता भी या तो कई जगह पर बंट गया या उनसे कुछ तटस्थ हो गया, वरना मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना में वह हालत न होती, जो हुई है।
दरअसल मुस्लिम वोट कांग्रेस, टीएमसी और असदुद्दीन ओवैसी के बीच बंट गये और इस तरह उन्हें पिछली बार जहां मुर्शिदाबाद रेंज में 44 सीटें मिली थीं, इस बार कुल 32 मिलीं। यह भी उनकी हार का एक बड़ा कारण था। सबसे बड़ी बात यह थी कि जिस आरजीकर कॉलेज मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था, उस पर तृणमूल सरकार का रवैया संदिग्ध रहा भाजपा ने पीड़िता की मां को टिकट दिया और इस बात ने कई सीटों को प्रभावित किया। कुल मिलाकर देखें तो ममता बनर्जी को अपनी बौखलाहट और बचकानेपन को छोड़कर ठंडे दिलो-दिमाग से सोचना चाहिए कि आखिर उनकी इस बुरी तरह से हार के लिए कौन जिम्मेदार है तथा अब उनकी खोई हुई जमीन कैसे दोबारा हासिल की जा सकती है। लोकतंत्र का यही तकाज़ा है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



