धरती से चांद तक : इंसानी हौसले की बेमिसाल दास्तान
आज के लिए विशेष
20 जुलाई, 1969 का दिन इंसानी इतिहास के सबसे महान और कभी न भूलने वाले दिनों में से एक है। इस दिन इंसान ने अंतरिक्ष की सीमाएं पार करके पहली बार चांद की सतह पर अपना कदम रखा था। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ के अपोलो-11 मिशन के तहत भेजे गए अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर अपना पहला कदम रखा, तो पूरी दुनिया इस ऐतिहासिक पल की गवाह बन गई थी। यह सिर्फ एक देश की जीत नहीं थी, बल्कि पूरी इंसानी सभ्यता की वैज्ञानिक कामयाबी का शिखर था। यह ऐतिहासिक मिशन 16 जुलाई, 1969 को फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से शुरू हुआ था। अपोलो-11 अंतरिक्ष यान को सैटर्न-5 नाम के एक बड़े रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा गया था। इस मिशन में तीन मुख्य अंतरिक्ष यात्री शामिल थे—नील आर्मस्ट्रांग, बज़ एल्ड्रिन और माइकल कॉलिन्स। इन तीन यात्रियों के कंधों पर लाखों लोगों के सपने सवार थे। चार दिन की लंबी और जोखिम भरी यात्रा के बाद 20 जुलाई को यह यान चांद की कक्षा में पहुंच गया। 20 जुलाई को मिशन का सबसे नाज़क मोड़ आया।
मुख्य यान कोलंबिया से अलग होकर ईगल नामक लूनर मॉड्यूल चांद की सतह की ओर बढ़ने लगा। माइकल कॉलिन्स मुख्य यान में ही रहे, जबकि नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन ईगल के ज़रिए चांद की ओर बढ़े। लैंडिंग के दौरान कंप्यूटर में कुछ खराबी आ गई और यान के नीचे बड़े पत्थर भी थे।
आर्मस्ट्रांग ने बहुत समझदारी से यान को हाथ से नियंत्रित किया और चांद के ‘सी ऑफ ट्रैंक्विलिटी’ नामक मैदान पर सुरक्षित उतारा। इसके बाद आर्मस्ट्रांग ने धरती पर संदेश भेजा, ‘द ईगल हैज़ लैंडड’ अर्थात ईगल उतर चुका है। यान के उतरने के कुछ घंटे बाद नील आर्मस्ट्रांग ने यान का दरवाज़ा खोला और सीढ़ी से नीचे उतरे। जब उन्होंने अपना बायां पैर चांद की सतह पर रखा, तो उनके मुंह से निकले शब्द अमर हो गए, ‘यह इंसान के लिए एक छोटा-सा कदम है, परन्तु इंसानियत के लिए एक बड़ी छलांग है।’ इससे कुछ मिनट बाद बज़ एल्ड्रिन भी आ गए। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद की सतह पर लगभग अढ़ाई घंटे बिताए। वहां का गुरुत्वाकर्षण धरती की तुलना में छठा हिस्सा होने का कारण वे कूद रहे थे। उन्होंने वहां अमरीकी राष्ट्रीय ध्वज फहराया। जानकारी के मुताबिक उन्होंने चांद की मिट्टी और चट्टानों के करीब 21.5 किलोग्राम नमूने इकट्ठा किए ताकि उन्हें धरती पर लाकर जांच की जा सके। उन्होंने वहां एक तख्ती भी छोड़ी, जिस पर लिखा था, ‘हम पूरी मानवता की शांति के लिए यहां हैं।’ अपना काम पूरा करने के बाद दोनों यात्री वापस ईगल में आए और मुख्य यान कोलंबिया से जा जुड़े। 24 जुलाई, 1969 को तीनों नायक प्रशांत महासागर में सुरक्षित उतर गए।
इस मिशन ने साबित कर दिया कि इंसान अपनी मेहनत, विज्ञान और दृढ़ इरादे से किसी भी असम्भव कार्य को सम्भव बना सकता है। 20 जुलाई की यह घटना सिर्फ एक अंतरिक्ष यात्रा नहीं थी, बल्कि इसने इंसानी सोच और सपनों के दायरे को बहुत बढ़ा दिया। इसने भावी पीढ़ियों को साइंस और अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आज जब हम चांद को देखते हैं, तो 20 जुलाई, 1969 का वह दिन हमें याद दिलाता है कि इंसान के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भी अपने चंद्रयान मिशनों के ज़रिए भारत का नाम दुनियाभर में रोशन किया है। भारत ने कम बजट और उच्च तकनीक से चांद के कई अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठाया है। भारत ने अपने पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 को 22 अक्तूबर, 2008 को लांच किया था। यह एक ऑर्बिटर मिशन था, जिसका मकसद चांद की परिक्रमा करना और उसकी सतह का अध्ययन करना था। इस मिशन की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक सफलता यह थी कि इसने चांद की सतह पर पानी के अणुओं की खोज की। इसरो ने 22 जुलाई, 2019 को चंद्रयान-2 लॉन्च किया। इस मिशन में एक ऑर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर शामिल थे। भारत चांद के दक्षिण ध्रुव पर उतरने का यत्न कर रहा था। हालांकि चांद की सतह से मात्र 2.1 किलोमीटर पहले लैंडर का सम्पर्क टूट गया और हार्ड-लैंडिंग (क्रैश) हो गई। लेकिन इसका ऑर्बिटर आज भी चांद के चक्कर लगा रहा है और महत्वपूर्ण डेटा और तस्वीरें लगातार धरती पर भेज रहा है।
चंद्रयान-2 की विफलता से सबक लेते हुए इसरो ने 14 जुलाई, 2023 को चंद्रयान-3 लांच किया। 23 अगस्त, 2023 को भारत ने वह कर दिखाया जो दुनिया का कोई अन्य देश नहीं कर सका था। भारत के विक्रम लैंडर ने चांद के दक्षिण ध्रुव पर सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग कर ली। इसके साथ ही भारत चांद पर पहुंचने वाला दुनिया का चौथा और दक्षिण ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला देश बन गया।
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