दगशई, इतिहास तथा तेरा सिंह चन्न
तेरा सिंह चन्न के निधन की तारीख तो पिछले सप्ताह थी, परन्तु उनकी सोच से जुड़ी बातें अभी भी हवा में हैं, सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार और हिमाचल प्रदेश के दगशई में भी, जहां उन्हें जेल में रहना पड़ा था। किसी कारण महात्मा गांधी और नाथू राम गोडसे को भी कुछ दिन रहना पड़ा था। चन्न के बेटे दिलदार और उनकी पत्नी सुल्ताना एक सप्ताह पहले ही दगशई आ चुके हैं। 1847 में पटियाला के महाराजा ने ईस्ट इंडिया कंपनी को छावनी बनाने के लिए पांच गांव (डब्बी, बुढतियाला, चूनावड़, जवाग और दगशई) दिए थे। इसके बाद अंग्रेज़ों ने 1849 में रणनीतिक कारणों से यहां एक जेल बनाई। दगशई में मुख्य आकर्षण का केन्द्र केन्द्रीय जेल और जेल संग्रहालय है, जो अंडमान द्वीप की सेलुलर जेल के बाद भारत में औपनिवेशक दौर के जेल संग्रहालयों में से एक है।
ब्रिटिश काल में दगशई केन्द्रीय जेल को बेहद कड़े सुरक्षा प्रबंधों वाली बनाया गया था। इसमें कुल 54 सेल (कोठरियां) हैं, जिनमें से 16 एकांतवास थे। इनका इस्तेमाल कट्टर भारतीय क्रांतिकारियों को कैद करने और उन्हें अमानवीय सज़ा देने के लिए किया जाता था। यहां कैद किये और फांसी पर चढ़ाए गए शुरुआती मुख्य क्रांतिकारियों में गोरखा सैनिक भी शामिल थे, जिन्होंने 1857 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था। 1920 में हुए प्रसिद्ध कनॉट रोजर्स विद्रोह के दौरान इस जेल में लगभग 14 आयरिश सैनिकों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। बाद में 2 नवम्बर, 1920 को सिर्फ एक 21 वर्षीय आयरिश सैनिक जेम्स जोसेफ डेली को गोलियां मारकर मौत के घाट उतारा गया था, जबकि शेष 13 सैनिकों की फांसी को उम्र कैद में बदल दिया गया था।
महात्मा गांधी और गोडसे का आना
आयरिश सैनिकों के दगशई में कैद किए जाने का समाचार मिलते ही महात्मा गांधी वहां पहुंच गए। वह महान आयरिश नेता इमोन डे वलेरा के प्रशंसक थे और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आयरिश लोगों के संघर्ष से बहुत प्रेरित थे। जेल अधिकारियों ने महात्मा गांधी के अनुरोध पर जेल में उनके रहने के लिए एक कोठरी का प्रबंध किया था। आज भी जेल प्रशासन द्वारा उस कोठरी में महात्मा गांधी की याद के तौर पर एक चरखा ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संभाल कर रखा गया है। एक और दिलचस्प एवं आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि गांधी जी की हत्या करने वाले नत्थूराम गोडसे को भी मुकद्दमे और फांसी की सज़ा से पहले कुछ समय के लिए इसी जेल में रखा गया था।
चन्न परिवार की दूसरी बात का संबंध उनकी बेटी सुलेखा (पत्नी डॉ. रघबीर सिंह सिरजन) से है, जो ज़्यादातर अपनी बेटी रचना सिंह के पास वैंकूवर (कनाडा) में रहती हैं। रचना ब्रिटिश कोलंबिया की शिक्षा और बाल विकास मंत्री रह चुकी हैं। चन्न परिवार का महेंद्र सूमल नामक व्यक्ति से गहरा संबंध रहा है। महेंद्र सूमल कनाडा जाने से पहले भारत में कॉलेज का छात्र होते हुए साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े थे। कनाडा पहुंचने के बाद उन्होंने पंजाबी लेखक गुरचरण रामपुरी से मिलकर 1970 में ही ये गतिविधियां शुरू कर दी थीं। 1973 में कनाडा की पहली पंजाबी साहित्य सभा की नींव रखने वाले वही थे। बाद में यह साहित्य सभा ‘पंजाबी लेखक मंच वैंकूवर’ के नाम से प्रसिद्ध हुई और मंच के पहले कोऑर्डिनेटर भी वही थे। सूमल उनके बाद कई बार पंजाबी लेखक मंच के कोऑर्डिनेटर रहे।
लेखक मंच ने कनाडा में पंजाबी साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देने में बड़ा योगदान दिया। वह बी.सी. पंजाबी कल्चरल फाउंडेशन (रजि.) के संस्थापक सदस्य भी रहे। बी.सी. में इस फाउंडेशन के नाम पर ही पुस्तक मेले लगते रहे हैं। उन्होंने पंजाबी पत्रिका ‘लोकड़ा’ के साथ भी काम किया, जिसमें प्रवासी पंजाबियों की समस्याओं को अच्छे से उभारा जाता था। इसके अतिरिक्त सूमल दर्शन गिल की साप्ताहिक पत्रिका ‘कनाडा दर्पण’ के प्रकाशन के आरम्भ से लेकर अंत तक सहयोगी रहे।
उनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की बरकतें ही समझें कि उनकी एसोसिएशन ने नस्लीय भेदभाव एवं भारतीय श्रमिकों के अधिकारों के लिए बहुत काम किया। उन्होंने वैंकूवर में पहली भांगड़ा टीम बनाई। अपने घरेलू काम छोड़कर भांगड़ा टीम को प्रशिक्षण दिया। सूमल ने अपनी शादी के लिए कनाडा आते समय अन्य सामान लाने की बजाय ढोल लाने को प्राथमिकता दी। इस टीम ने 1974 में अमरीकी शहर स्पोकेन में विश्व व्यापार मेले में भांगड़ा किया। 1976 के मॉन्ट्रियल ओलम्पिक खेल में भांगड़ा किया और पंजाबी भांगड़ा को मान्यता दिलाई।
1981 में उन्होंने पी.एन.ई. मेले में भांगड़ा करके ‘बेस्ट प्राइज़’ जीता। कनाडा में वामपंधी पार्टियों और संगठनों के साथ भी काम किया। भारत से आने वाले प्रगतिशील नेताओं और लेखकों की हर तरह से मदद करने में अग्रणी भूमिका निभाई। सूमल जीवन में आई मुश्किलों के बावजूद सितम्बर 2025 में अपनी आखिरी सांस तक साहित्य, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे।
अंतिका
(उर्दू कवि दाग देहलवी)
नहीं खेल ए ‘दाग’ यारों से कहदो
कि आती है उर्दू ज़ुबां आते आते
ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com



