लॉर्ड्स में भारतीय परियों ने रचा इतिहास
क्रिकेट इतिहास के 142 सालों बाद
जिस समय उत्साही खेल प्रेमियों का फोकस फुटबॉल विश्व कप पर है और इस बात की निराशा भी कि टी-20 विश्व चैंपियन भारत आयरलैंड से 0-2 व इंग्लैंड से 0-4 से श्रृंखलाएं हारा है, ठीक उसी समय हरमनप्रीत कौर के नेतृत्व वाली भारतीय महिला टीम ने मज़बूत मेज़बान इंग्लैंड पर लॉर्ड्स में 270 रन से ऐतिहासिक व प्रभावी टेस्ट जीत दर्ज करके दिल बाग-बाग कर दिया है। ये दोनों टीमें क्रिकेट के मक्का यानी लॉर्ड्स पर आज तक का पहला महिला टेस्ट खेल रही थीं, जहां भारतीय पुरुषों को यहां 11 प्रयासों में अपना पहला टेस्ट जीतने में 54 वर्ष लगे थे। क्योंकि भारत ने लॉर्ड्स में पहला टेस्ट 1932 में खेला था, जबकि इस मैदान पर उसे पहली कामयाबी कपिल देव के नेतृत्व में 1986 में मिली थी। गौरतलब है लॉर्ड्स पर पहला टेस्ट इंग्लैंड बनाम ऑस्ट्रेलिया 1884 में खेला गया था यानी महिलाओं को लॉर्ड्स में टेस्ट खेलने का अवसर 142 वर्ष बाद मिला।
बहरहाल, यह जीत इसलिए भी विशेष है कि यह भारत में महिला टेस्ट क्रिकेट के 50वें वर्ष में आयी है। भारतीय महिलाओं ने अपना पहला टेस्ट वेस्टइंडीज के खिलाफ 1976 में खेला था। यह जीत टीम के संयुक्त प्रयास का नतीजा है और हाल के टी-20 महिला विश्व कप के एकदम विपरीत है, जिसमें भारतीय टीम का प्रदर्शन इतना निम्नस्तरीय था कि वह सेमीफाइनल में भी न पहुंच सकी, विशेषकर खराब फील्डिंग की वजह से। लेकिन टेस्ट में भारतीय परियों ने सारी भूलों को सुधार लिया। भारत व इंग्लैंड की महिलाओं के बीच आज तक 16 टेस्ट खेल गये हैं, जिनमें भारत की यह चौथी जीत थी, जबकि इंग्लैंड ने सिर्फ एक टेस्ट जीता है और शेष 11 ड्रा रहे। भारत की पहली तीन जीत इस प्रकार रही थीं- टांटन (2006) में 5 विकेट से, वोर्म्सले (2014) में 6 विकेट से और मुंबई (2023) में 347 रन से।
इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद कप्तान हरमनप्रीत कौर ने कहा, ‘इससे बेहतर पटकथा नहीं हो सकती थी। ईश्वर बेहतर लेखक है और उसने बहुत अच्छी पटकथा लिखी। हमारी सलामी बैटर्स हमारी ताकत हैं, जिस तरह से उन्होंने पहले हाफ में बल्लेबाज़ी की, वह विशेष थी। सपोर्ट स्टाफ ने बहुत टेस्ट क्रिकेट खेली है, जिससे वह जानता था कि लॉर्ड्स में गेंद किस तरह से मूव करती है, इसलिए हमें अच्छा फीडबैक मिला। हमारे लिए यह समर हमारी इच्छाओं के अनुरूप नहीं गुज़रा (कि टी-20 विश्व कप में निराशाजनक प्रदर्शन रहा), लेकिन हमने टेस्ट में धमाकेदार वापसी की। मैं उम्मीद करती हूं कि अब हमें 10 और टेस्ट खेलने का अवसर मिलेगा।’
भारत ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए पहली पारी में 285 रन बनाये, जिसमें स्मृति मंधना (83), हरमनप्रीत कौर (58), दीप्ती शर्मा (57) व जेमिमा रोड्रिग्स (35) का अच्छा योगदान रहा। इंग्लैंड अपनी पहली पारी में सिर्फ 170 रन ही बना सका क्योंकि क्रांति गौड़ ने घातक तेज़ व स्विंग गेंदबाज़ी करते हुए मात्र 37 रन देकर 5 विकेट लिए और अपना नाम लॉर्ड्स के ऑनर बोर्ड पर दर्ज कराया। भारत की दूसरी पारी में स्मृति मंधना ने एक बार फिर अर्द्धशतक (70) लगाया, लेकिन असल कमाल किया यस्तिका भाटिया के करियर के पहले शतक (113) ने और ऋचा घोष के नाबाद 50 रन ने, जिसकी बदौलत भारत ने अपनी दूसरी पारी 7 विकेट खोकर 341 रन पर घोषित की। अब इंग्लैंड की टीम के सामने 457 रन का विशाल लक्ष्य था और वह टेस्ट के चौथे दिन मात्र 186 रन पर सिमट गयीं, स्नेह राणा ने 42 रन खर्च करके 4 विकेट लिए। भारत को 270 के प्रभावी अंतर से जीत मिली।
यस्तिका भाटिया पहली महिला बैटर हैं, जिन्होंने लॉर्ड्स पर टेस्ट शतक लगाया है और इस तरह वह लॉर्ड्स के ऑनर बोर्ड पर उन 10 भारतीय क्रिकेटरों के साथ अपना नाम दर्ज कराने में कामयाब हो गईं, जिन्होंने इस मैदान पर टेस्ट शतक लगाये हैं- वीनू मांकड़ (1952), गुंडप्पा विश्वनाथ (1979), दिलीप वेंगसरकर (तीन शतक 1979, 1982, 1986), रवि शास्त्री (1990), मुहम्मद अज़हरुद्दीन (1990), सौरव गांगुली (1996), अजित अगरकर (2002), राहुल द्रविड़ (2011), अजिंके रहाणे (2014) और केएल राहुल (2021)। यस्तिका भाटिया का अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में आना व बने रहना अपने आपमें एक ऐसी कहानी है, जिसे किस्मत ही लिख सकती थी। एक नवम्बर 2000 को बड़ोदा में जन्मीं यस्तिका हमेशा से एथलेटिक थीं। वह ज़िला स्तर की बैडमिंटन खिलाड़ी, तैराक और कराटे में ब्लैक बेल्ट रहीं यानी यस्तिका का जन्म एथलीट बनने के लिए ही हुआ था। जब वह 8 साल की थीं, तो उनके बैडमिंटन कोच ने अपना बेस बदल लिया और यस्तिका ने खेल बदल लिया। वह बड़ोदा की क्रिकेट अकादमी में दाखिल हो गईं, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा को भी अनदेखा नहीं किया। हालांकि उन्होंने गेंदबाज़ी आल-राउंडर के रूप में शुरुआत की, लेकिन विकेटकीपिंग को उन्होंने ऐसे अपनाया जैसे मछली पानी को। 2021 में उन्होंने तीनों फॉर्मेट में डेब्यू किया, ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर। यस्तिका अपने करियर में चोटों से जूझती रही हैं, गंभीर चोटों से भी, लेकिन उन्होंने हर बार मज़बूती के साथ वापसी की है।
बहरहाल, ऐतिहासिक शतक के बावजूद यस्तिका प्लेयर ऑ़फ द मैच के खिताब से वंचित रहीं। यह श्रेय क्रांति गौड़ को मिला, जो वास्तव में इसकी हकदार भी थीं क्योंकि पहली पारी में उनके पांच विकेट से भारत को 115 रन की बढ़त मिली, इंग्लैंड दबाव में आया और भारत की मैच पर पकड़ मज़बूत हुई। क्रांति ने दूसरी पारी में भी दो विकेट लिए यानी मैच में उन्होंने कुल 7 विकेट लिए और निर्णायक भूमिका अदा की। क्रांति के अनुसार, ‘मैंने प्लेयर ऑ़फ द मैच अवार्ड के बारे में कभी सोचा नहीं था। लेकिन जिस दिन मैच शुरू हुआ और मैंने लॉर्ड्स के ऑनर बोर्ड पर भारतीय के नाम देखे- मुहम्मद निसार (1932), इशांत शर्मा (2014) व जसप्रीत बुमराह (2025), तो मेरी भी इच्छा हुई कि बोर्ड पर मेरा नाम भी होना चाहिए। मेरी योजना तो बहुत सरल थी कि लाइन व लेंथ हिट करूं और उस पर फोकस करूं जो कोच ने मुझे बताया था। मुझे अपने प्रदर्शन पर गर्व है और मेरे परिवार को भी। मैंने यादगार के तौरपर एक स्टंप भी लिया है। मेरे घर में एक छोटा सा म्यूजियम रूम है जहां मैं उसे रखूंगी।’
इत्तेफाक देखिये कि भारत की यह जीत 13 जुलाई को आयी यानी एक ऐसी तारीख पर जो भारतीय क्रिकेट की लोककथा का हिस्सा है। पूरे 24 वर्ष पहले इसी तारीख को, लॉर्ड्स के ही मैदान पर मुहम्मद कैफ (87 नाबाद) व युवराज सिंह (69) ने नैट-वेस्ट सीरीज फाइनल में भारत को इंग्लैंड पर एक यादगार जीत दिलायी थी, जिससे प्रेरित होकर तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने लॉर्ड्स की पवेलियन बालकनी में अपनी शर्ट उतारकर जश्न मनाया था। भारत ने तब 326 रन चेज़ किये थे। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि महिलाओं के टेस्ट अब दिलचस्प व रोमांचक होते जा रहे हैं, इसलिए भारत की महिला टीम के मुख्य कोच अमोल मजूमदार ने एकबार फिर दोहराया है कि महिला विश्व टेस्ट चैंपियनशिप शुरू की जानी चाहिए ताकि टेस्ट क्रिकेट, जिसमें खिलाड़ी के हुनर की असल परीक्षा होती है, को ज़िन्दा रखा जा सके।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





