अपने हिस्से की ज़िंदगी

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

‘एम.बी.ए. करके कलम घुमाएगा?’
‘अभी तो नशे में है, जल्दी होश आ जाएगा।’
पड़ोसियों की नजरें बदल गईं। वो नज़रें जो पहले सम्मान से देखती थीं, अब हमदर्दी और तिरस्कार से देखने लगीं।
लेकिन आलोक अब बदल चुका था। वह हर दिन लिखता। सुबह उठकर, दोपहर को, रात को जागकर। अपने दर्द को, अपने सपनों को, अपनी कहानी को। कभी-कभी तो ऐसा लगता कि वह खुद को शब्दों में उतार रहा है, जैसे हर अक्षर उसकी जान का टुकड़ा हो। कई बार उसकी रचनाएं अस्वीकृत हो जातीं। संपादक लौटा देते, ‘ऐसा कुछ नया नहीं है,’ ‘लोगों को पसंद नहीं आएगा,’ ‘इसमें वो वाली बात नहीं है।’
कई बार वह टूट जाता... रात को अकेले बैठकर रोता.. सवाल करता कि क्या सच में वह पागल है? क्या पिता सही थे? क्या रिश्तेदार सही कहते हैं? लेकिन फिर रिया का एक फोन आता। या कभी वह खुद आकर उसके सामने बैठ जाती। बिना कुछ कहे। सिर्फ बैठी रहती। और यह चुप्पी ही आलोक को संभाल लेती। रिया हर कदम पर उसके साथ थी। लेकिन कभी उसके लिए नहीं, बल्कि उसके साथ। वह कहती, ‘हर गिरना तुम्हें मजबूत बना रहा है। असली कहानी तो अब शुरू हुई है।’
एक दिन आलोक ने अपनी मां से बात की। उसने उन्हें अपनी एक कहानी सुनाई। उस कहानी में एक मां थी जो अपने सपने भूल गई थी, लेकिन उसका बेटा उन्हें वापस ला रहा था। मां ने पूरी कहानी सुनी। कोई शब्द नहीं बोले। बस आंखें पोंछीं। और फिर बहुत धीरे से बोलीं, ‘लिखते रहो बेटा।’
इन तीन शब्दों में आलोक को दुनिया भर की ताकत मिल गई। धीरे-धीरे आलोक की मेहनत रंग लाने लगी। उसकी एक कहानी एक प्रसिद्ध पत्रिका में छपी। उस दिन वह देर तक उस पन्ने को देखता रहा... उसने अपना नाम दस बार पढ़ा। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार ये आंसू हार के नहीं, जीत के थे। वो जीत जो किसी अवार्ड से बड़ी थी। अपने शब्दों को दुनिया के सामने देखने की जीत।
कुछ ही महीनों में उसकी कहानियां लोगों के दिलों तक पहुंचने लगीं। लोग उसके शब्दों में खुद को देखने लगे। अपने टूटे सपने, अपनी अधूरी कहानियां, अपनी चुप रह गई आवाजें। एक दिन उसने अपनी पहली किताब पिता को थमाई। किताब का मुखपृष्ठ सादा था। बस एक लाइन लिखी थी, ‘उन सपनों के लिए जो कभी बोले नहीं गए।’
पिता ने चुपचाप किताब खोली...कुछ पन्ने पढ़े...एक पन्ने पर रुक गए...फिर एक और...और उनकी आंखें नम हो गईं।
किताब में एक कहानी थी, एक ऐसे पिता की जो अपने सपने मारकर बच्चों को पालता है, और एक ऐसे बेटे की जो उसी मारे हुए सपने को जिंदा करता है। उन्होंने पहली बार आलोक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘मुझे तुम पर गर्व है, बेटा।’
उनकी आवाज कांप रही थी। आलोक ने देखा कि पिता की आंखों में वो नमी थी जो शायद सालों से दबी हुई थी। शायद उसके पिता भी कभी कुछ सपने देखते थे। शायद वह भी कभी अपनी ज़िंदगी को जीना चाहते थे, लेकिन हालात ने मना कर दिया था।
आलोक के लिए यह पल किसी भी सफलता से कम नहीं था।
आज आलोक एक सफल लेखक है। उसकी किताबें बिकती हैं, उसकी बातें सुनी जाती हैं। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि वह खुश है, सच में खुश है। वह खुशी जो सफलता से नहीं, खुद से जीने से मिली थी।
एक शाम उसने रिया से कहा, ‘तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी दी है।’
रिया मुस्कुराई और बोली, ‘नहीं आलोक, तुमने खुद अपनी ज़िंदगी चुनी है। मैंने तो सिर्फ एक आईना दिखाया था। तुमने खुद अपनी ज़िंदगी को जीना सीख लिया है।’
आलोक ने आसमान की ओर देखा...तारे चमक रहे थे। उसी तरह जैसे बचपन में देखा करता था। अब उसे कोई डर नहीं था। ना गिरने का, ना अकेले चलने का, ना दुनिया की बातों का। क्योंकि उसने समझ लिया था, ज़िंदगी किसी और के फैसलों से नहीं, अपने साहस से लड़ी जाती है। सपने देखना कोई पागलपन नहीं है। पागलपन तो यह है कि सपने देखकर भी उन्हें पूरा न करने दिया जाये।उस दिन से उसका नजरिया बदल गया था। अब वह समझ आ गया था कि ज़िंदगी की सार्थकता दूसरों की कहानी का हिस्सा बनने में नहीं, बल्कि अपनी नियति का लेखक स्वयं बनने में है। (समाप्त) 
(सुमन सागर)

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