रील की लत का शिकार युवा वर्ग
आज का किशोर व युवा वर्ग एक ऐसे दौर में जी रहा है जहां दुनिया उसकी हथेली पर सिमट आई है। ज्ञान, मनोरंजन, मित्रता और अभिव्यक्ति। सब कुछ मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध है। लेकिन इसी सुविधा के बीच एक नई चुनौती तेज़ी से उभरी है। रील को देखने की लत। कुछ सैकेंड के मनोरंजक वीडियो कब घंटों का समय निगल जाते हैं, इसका एहसास तब होता है जब पढ़ाई अधूरी रह जाती है, नींद कम होने लगती है और परिवार से संवाद लगभग समाप्त हो जाता है। यह केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि किशोरों, युवाओं के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गहरा प्रभाव डालने वाली समस्या बनती जा रही है। किशोरावस्था जीवन का वह दौर है जब जिज्ञासा सबसे अधिक होती है। नई चीज़ें सीखने, नए लोगों को जानने और स्वयं को अभिव्यक्त करने की इच्छा प्रबल रहती है। सोशल मीडिया मंच इसी मनोविज्ञान को समझ कर ऐसे एल्गोरिद्म तैयार करते हैं कि एक रील समाप्त होते ही दूसरी स्वत: सामने आ जाती है। किशोर सोचता है कि बस एक और वीडियो देखकर मोबाइल रख दूंगा, लेकिन यह ‘बस एक और’ कभी समाप्त नहीं होता है।
रील की सबसे बड़ी विशेषता उसका छोटा और तेज़ प्रारूप है। दस, बीस या तीस सैकेंड में हंसी, रोमांच, नृत्य, फैशन, खाना, यात्रा, चुटकुले और सनसनी। सब कुछ परोस दिया जाता है। कहने का मतलब यह है कि रील वाला यह आभासी मनोरंजन इतना तीव्र है कि पल भर में दूसरी रील हाज़िर हो जाती है। देखने वाला इसके जाल में फंसकर रह जाता है। मस्तिष्क को लगातार नया दृश्य और नई जानकारी मिलती रहती है। धीरे-धीरे दिमाग इसी तेज़ उत्तेजना का अभ्यस्त हो जाता है। परिणाम यह होता है कि पाठ्य पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़ना भी उबाऊ लगने लगता है। ध्यान की अवधि घटने लगती है और एकाग्रता कमज़ोर हो जाती है। आज अनेक माता-पिता शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा पढ़ने बैठता तो है, लेकिन हर पांच-दस मिनट में मोबाइल देखने लगता है। यह केवल अनुशासन की कमी नहीं, बल्कि आदत का परिणाम है। रील देखने के दौरान मिलने वाला त्वरित आनंद मस्तिष्क को बार-बार उसी अनुभव की ओर खींचता है। धीरे-धीरे पढ़ाई, खेल, संगीत, पुस्तकें और परिवार के साथ बिताया समय पीछे छूटने लगता है।
इस लत का सबसे बड़ा असर शिक्षा पर पड़ता है। गृहकार्य अधूरा रह जाता है, परीक्षा की तैयारी अंतिम समय तक टलती रहती है और स्मरण शक्ति प्रभावित होने लगती है। कई किशोर देर रात तक रील देखते रहते हैं, जिससे उनकी नींद पूरी नहीं होती। पर्याप्त नींद न मिलने से चिड़चिड़ापन, थकान, सिरदर्द और पढ़ाई में मन न लगना जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव कम गंभीर नहीं है। रीलों में अक्सर अत्यधिक सुंदर जीवन, महंगे वस्त्र, विलासिता, लोकप्रियता और त्वरित सफलता दिखाई जाती है। किशोर इन कृत्रिम दृश्यों की तुलना अपने वास्तविक जीवन से करने लगता है। उसे लगता है कि उसका जीवन नीरस है, वह दूसरों जितना आकर्षक नहीं है या उसके पास वैसी सुविधाएं नहीं हैं। इससे हीनभावना, चिंता और आत्मविश्वास में कमी आने लगती है।
एक और चिंता का विषय है रील बनाने की अंधी दौड़। अधिक लाइक और फॉलोअर पाने के लिए कुछ किशोर खतरनाक स्टंट करते हैं, सार्वजनिक स्थानों पर अनुचित हरकतें करते हैं या निजी जीवन की गोपनीयता तक दांव पर लगा देते हैं। क्षणिक प्रसिद्धि पाने की चाह कभी-कभी दुर्घटनाओं और कानूनी परेशानियों का कारण भी बन जाती है। घंटों एक ही स्थिति में बैठकर मोबाइल देखने से आंखों पर तनाव बढ़ता है, गर्दन और पीठ में दर्द होने लगता है। बाहर खेलना, दौड़ना, साइकिल चलाना और मित्रों के साथ प्रत्यक्ष संवाद धीरे-धीरे कम हो जाता है। इसका असर शरीर की सक्रियता और समग्र स्वास्थ्य पर पड़ता है। परिवार से भी दूरी बढ़ने लगती है। पहले जहां भोजन के समय बातचीत होती थी, अब कई घरों में हर सदस्य अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देता है। किशोर माता-पिता की बातों को अनसुना करने लगता है। यदि मोबाइल कुछ समय के लिए ले लिया जाए तो वह क्रोधित या बेचैन हो सकता है। यह स्थिति बताती है कि मनोरंजन धीरे-धीरे निर्भरता में बदल रहा है। इस समस्या का समाधान केवल मोबाइल छीन लेने में नहीं है। किशोरों को डांटने से अधिक आवश्यक है उन्हें समझना। माता-पिता स्वयं भी संतुलित डिजिटल व्यवहार अपनाएं। यदि बड़े हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों से अलग व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
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