तेलंगाना का सांस्कृतिक महापर्व है बोनालू उत्सव

हैदराबाद के ऐतिहासिक गोलकुंडा किले में स्थित श्रीजगदंबा महाकाली मंदिर से शुरु होने वाला गोलकुंडा बोनालू उत्सव पूरे एक महीने तक तेलंगाना के अनेक शक्तिपीठों पर आयोजित होता है। इस साल यह 19 जुलाई (रविवार) 2026 से शुरु होगा। इसके बाद क्रमश: सिकंदराबाद के उज्जैनी महाकाली मंदिर, पुराने शहर के लाल दरवाजा व अन्य प्रमुख शक्तिपीठों में लगातार रविवारों को बोनालू उत्सव आयोजित होगा और पूरे तेलंगाना में यह पर्व लगभग एक महीना चलेगा। तेलंगाना की तरह ही यह उत्सव आंध्र प्रदेश में भी मनाया जाता है, चूंकि पहले आंध्र प्रदेश का ही एक हिस्सा तेलंगाना था, जबकि अब दो अलग-अलग प्रांत हो चुके हैं, तो शक्ति, लोक आस्था और तेलगू की सांस्कृतिक आत्मा का यह महापर्व दोनों प्रांतों में मनाया जाता है। लेकिन ज्यादा भव्य और आकर्षक तेलंगाना में ही होता है।
यह धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक, सामाजिक और सरकारी उत्सव भी है। इसलिए इसकी शुरुआत सरकारी परंपरा के मुताबिक आषाढ़ मास के पहले रविवार से होती है। यह हिंदू त्योहार मूलत: देवी महाकाली की पूजा को समर्पित एक वार्षिक त्योहार है। यह मूलरूप से जुड़वां शहर हैदराबाद और सिकंदराबाद का मुख्य उत्सव है, पर तेलंगाना राज्य के दूसरे हिस्सों में भी मनाया जाता है। त्योहार के पहले और आखिरी दिन देवी येल्लम्मा के लिए खास पूजा की जाती है। लोग यह त्योहार अपनी मन्नतें पूरी होने के बाद देवी को धन्यवाद देने के एक तरीके के रूप में भी मनाते हैं। बोनम का मतलब तेलगू में होता है खाना या भोजन यानी वह भोजन जो देवी मां को चढ़ाया जाता है। इस भोजन के रूप में घर की औरतें चावल बनाती हैं, जिन्हें दूध, गुड़ के साथ एक नये मिट्टी या पीतल के बर्तन में पकाया जाता है और इस बर्तन को नीम के पत्तों, हल्दी और सिंदूर से सजाया जाता है। इसे औरतें अपने सिर पर रखती हैं और मंदिर में देवी मां को बोनम यानी भोजन, चूड़ियां व साड़ी चढ़ाती हैं। 
बोनालू में मां काली के अलग-अलग रूपों जैसे मायसम्मा, पोचम्मा, येल्लम्मा, डोक्कलम्मा, पेदाम्मा, पोलेरम्मा, अंकलम्मा, मारेम्मा तथा नूकलम्मा की पूजा की जाती है। यह पर्व सन् 1813 में हैदराबाद और सिकंदराबाद के इलाके से ही शुरु हुआ था। यह वह समय था, जब इस जुड़वां शहर में प्लेग की बीमारी फैली थी, जिससे हजारों लोगों की जान चली गई थी। तब हैदराबाद से एक मिलिट्री बटालियन को उज्जैन भेजा गया था और हैदराबाद में प्लेग के खतरे को लेकर मिलिट्री बटालियन ने मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकाली मंदिर में देवी मां से प्रार्थना की थी कि अगर लोग इस महामारी से ठीक हो जाते हैं, तो वे सिकंदराबाद में महाकाली की मूर्ति स्थापित करेंगे। भक्तों का मानना है कि महाकाली ने बीमारी को फैलने से रोका था, इसलिए मिलिट्री बटालियन ने यहां मां महाकाली को बोनालू चढ़ाकर एक मूर्ति स्थापित की, तब से शहर के अलग-अलग हिस्सों में बोनालू की रस्म मनायी जाती है। इसकी शुरुआत आषाढ़ के पहले रविवार को गोलकुंडा किले के जश्न से शुरु होती है। 
इसके बाद सिकंदराबाद में उज्जैनी महाकाली मंदिर व दूसरे रविवार को बाल्कमपेट येल्लम्मा मंदिर में उत्सव मनाया जाता है। जबकि तीसरे रविवार को चिलकलगुडा के पास पोचम्मा और कट्टा मैसम्मा मंदिर और फिर हैदराबाद के पुराने शहर में लाल दरवाजा स्थित मथेश्वरी मंदिर में जश्न मनाया जाता है। इसके अलावा अक्कन्ना मदन्ना मंदिर, शाह अली बांदा में मुथ्यालम्मा, जैसे दूसरे मंदिर में भी बोनालू मनाने की मशहूर परंपरा है। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक साड़ी, गहने और दूसरे एक्सेसरीज पहनती हैं। कुंवारी टीनएज लड़कियां पारंपरिक पोशाक की खूबसूरती दिखाने के लिए गहने के साथ हाफ साड़ी पहनती हैं। कुछ महिलाएं देवी के सम्मान में ढोल की ताल पर बर्तनों को बैलेंस करते हुए नाचती हैं। गोलकोंडा से शुरु होने वाले इस उत्सव में औरतें बोनालू लेकर चलती हैं। माना जाता है कि उस बोनालू यानी भोजन में मां की आत्मा होती है। जब वे मंदिर पहुंचती हैं तो लोग आत्मा को शांत करने के लिए उनके पैरों पर पानी छिड़कते हैं, क्योंकि मान्यता है कि माता की आत्मा गुस्सैल होती है। 
इस दौरान भक्त थोट्टेलु चढ़ाते हैं जो कि छोटे रंगीन कागज के स्ट्रक्चर होते हैं, जिन्हें डंडियों से सहारा दिया जाता है और सम्मान की निशानी के तौर पर चढ़ाया जाता है। इस त्योहार के तीन प्रमुख भाग होते हैं। पहला बोनालू जिसमें देवी मां को दिव्य प्रसाद चढ़ाया जाता है और परिवार भी इस प्रसाद को घर के अन्य सदस्यों और मेहमानों के साथ खाता है। दूसरा रंगम या भविष्यवाणी करना, यह असली त्योहार की अगली सुबह होता है, जिसमें एक महिला खुद पर देवी महाकाली का आह्वान करती है और यह रिवाज निभाती है। जब भक्त भविष्य के बारे में जानकारी मांगते हैं, तो वह अगले साल के बारे में बताती है। तीसरा प्रमुख हिस्सा है घटम, जिसका मतलब तांबे का बर्तन है, जिसे देवी मां के रूप में सजाया जाता है और एक पुजारी उसे पारंपरिक धोती पहनकर तथा पूरी तरह हल्दी लगाकर ले जाता है। घटम को त्योहार के पहले दिन से आखिरी दिन तक जुलूस के रूप में ले जाया जाता है। जब इसे पानी में डुबो दिया जाता है, तब घटम के साथ ढोल भी बजाये जाते हैं। आमतौर पर हरिबावली में अक्कन्ना मदन्ना मंदिर का घटम जूलूस में सबसे आगे होता है, जिसे हाथी पर रखा जाता है। इसके साथ घुड़सवार घोड़े और मॉडल होते हैं, जो अक्कन्ना और मदन्ना को दिखाते हैं। यह जुलूस शाम को नयापुल में घटम के विसर्जन के बाद खत्म होता है। जुड़वां शहरों में महाकाली के दूसरे मशहूर मंदिरों के घटम भी यहां इकट्ठा होते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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