दिल का क्या कसूर, आदत सुधारिये हुज़ूर !

दिल बड़ा बेचारा अंग है। शरीर में सबसे ज्यादा बदनाम भी वही है और सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी। गलती कोई करे, दोष दिल पर मढ़ दिया जाता है। आदमी रिश्वत खाए तो कहता है, दिल है कि मानता ही नहीं। नेता दल बदल ले तो कहता है, जनता की आवाज़ मेरे दिल तक पहुंची। अफसर फाइल दबा दे तो बोलता है, दिल से तो मैं आपकी मदद करना चाहता था। प्रेमी प्रेमिका बदल ले तो कहता है, दिल पर किसका बस चलता है?
बेचारा दिल सोचता होगा कि आखिर मेरा कसूर क्या है? मैं तो दिन-रात बिना छुट्टी, बिना वेतन और बिना किसी ओवरटाइम भत्ते के काम कर रहा हूं। न कभी हड़ताल करता हूं, न धरना देता हूं, न ट्रांसफर मांगता हूं। फिर भी हर गलती का ठीकरा मेरे सिर ही क्यों?
हमारे देश में दिल सबसे ज्यादा राजनीतिक प्राणी बना दिया गया है। चुनाव आते ही नेताओं के दिल अचानक गरीबों के लिए धड़कने लगते हैं। पांच साल तक जो दिल वातानुकूलित कमरों में सोया रहता है, वह चुनावी मौसम में जागकर गांव-गांव घूमने लगता है। जनता भी कम नहीं है। वह हर बार सोचती है कि इस बार नेता का दिल सचमुच बदल गया है लेकिन चुनाव परिणाम आते ही पता चलता है कि दिल नहीं, केवल दल बदला था।
कहते हैं कि दिल वालों की दिल्ली है। लेकिन दिल्ली पहुंचते-पहुंचते अधिकांश दिल सत्ता के गलियारों में कहीं गुम हो जाते हैं। वहां दिल की नहीं, केवल दिलचस्पी की राजनीति होती है। जनता महंगाई से कराहती रहे, बेरोज़गारी से जूझती रहे, लेकिन सत्ता और विपक्ष दोनों के दिल केवल कैमरों के सामने ही धड़कते हैं। कैमरा हटते ही दिल भी आराम मोड में चला जाता है।
प्रेम की दुनिया में भी दिल की हालत किसी सरकारी विभाग जैसी हो गई है। आवेदन कहीं और जमा होता है, फाइल कहीं और पहुंच जाती है और मंजूरी किसी तीसरे को मिल जाती है। पहले प्रेम पत्र लिखे जाते थे, अब लास्ट सीन और ब्लू टिक देखकर दिल टूटते हैं। आज का दिल प्रेम कम और नेटवर्क कवरेज ज्यादा खोजता है। मोहब्बत की गहराई का आकलन अब त्याग से नहीं, मोबाइल रिचार्ज और ऑनलाइन गिफ्ट से किया जाता है।
दिल की मजबूरी का बहाना बनाकर समाज ने कितने पापों को पुण्य घोषित कर दिया है। कोई कहता है, ‘दिल आ गया था।’ जैसे दिल कोई सरकारी भूखंड हो जिस पर कोई भी कब्जा कर ले। आश्चर्य यह है कि जब ईमानदारी, कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाने की बात आती है तब यही दिल छुट्टी पर चला जाता है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी दिल की दुर्दशा कम नहीं है। लोग सुबह उठते ही मोबाइल देखते हैं, रात को मोबाइल देखकर सोते हैं, बीच में जंक फूड, तनाव, आलस्य और प्रदूषण का प्रसाद ग्रहण करते हैं। फिर अचानक डॉक्टर बताते हैं कि दिल में समस्या है। मरीज तुरंत कहता है, पता नहीं ऐसा कैसे हो गया? मानो दिल ने स्वयं षड्यंत्र रचकर बीमारी बुला ली हो।
आजकल लोगों ने दिल को भी लोकतंत्र बना दिया है। जो मन आया, वही खिलाया। तेल, घी, मिठाई, पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक-सबको समान अवसर। व्यायाम और अनुशासन को विपक्ष में बैठा दिया गया है। फिर जब दिल विरोध प्रदर्शन करता है तो उसे हार्ट अटैक का नाम देकर अस्पताल पहुंचा दिया जाता है।
विडंबना देखिए, लोग दिल जीतने के हजार तरीके बताते हैं, लेकिन दिल बचाने के दो तरीके- संयम और व्यायाम-को सबसे ज्यादा नज़रअंदाज करते हैं। रिश्ता हो, राजनीति हो या स्वास्थ्य-हर जगह समस्या दिल की नहीं, आदतों की है। मगर आदत सुधारना सबसे कठिन काम है। इसलिए हम दिल को कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
दरअसल दिल तो आज भी अपना काम ईमानदारी से कर रहा है। बेईमान तो हमारी इच्छाएं, लालच, महत्वाकांक्षाएं और लापरवाहियां हैं। दिल तो केवल धड़कता है, फैसले तो दिमाग और स्वार्थ मिलकर लेते हैं। मगर जब परिणाम खराब आते हैं तो दोनों चुप्पी साध लेते हैं और बेचारे दिल को आगे कर देते हैं।
इसलिए अगली बार यदि कोई कहे कि दिल मजबूर था, तो उससे विनम्रतापूर्वक पूछिए, ‘जनाब, दिल मजबूर था या आदतें बेलगाम थीं?’ क्योंकि आज के दौर में दिल से ज्यादा इलाज की ज़रूरत आदतों को है। अंतत: यही कहना उचित होगा-
दिल का क्या कसूर, आदत सुधारिए हुजूर।
दिल तो मुफ्त में धड़क रहा है,
कहीं ऐसा न हो कि आपकी आदतें उसे भी निजीकरण की राह पर धकेल दें ! 
और तब अस्पताल के बिल देखकर यही गाना याद आएगा-
‘दिल तो आखिर दिल है ना, मीठी सी मुश्किल है ना...’
फर्क सिर्फ इतना होगा कि तब यह मुश्किल मीठी नहीं, महंगी पड़ चुकी होगी। 
(सुमन सागर

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