बंगाल में शहीदी दिवस मनाने को लेकर खींचतान तेज़

21 जुलाई को शहीद दिवस मनाने को लेकर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच खींचतान पश्चिम बंगाल की राजनीति में हर साल होने वाली घटना है। लेकिन इस साल दो राजनीतिक दलों के बीच की इस असमान लड़ाई में एक और राजनीतिक गुट भी शामिल हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के एक बागी गुट, जिसकी अगुवाई राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋ तब्रत बनर्जी कर रहे हैं, ने शहीद दिवस मनाने का दावा पेश किया है। उनका दावा है कि उन्हें 65 से ज़्यादा विधायकों का समर्थन हासिल है, जिन्होंने 2026 के राज्य विधानसभा चुनावों में तृणमूल उम्मीदवार के तौर पर चुने जाने के बाद अपना पाला बदल लिया है। इस चुनाव में तृणमूल टिकट पर 80 विधायक निर्वाचित हुए थे।
अब अगले हफ्ते यह कार्यक्रम तीन अलग-अलग जगहों पर आयोजित किया जाएगा। ऋ तब्रत का गुट मेयो रोड पर गांधी प्रतिमा के पास यह कार्यक्रम आयोजित करेगा, जबकि ममता बनर्जी का वफादार गुट एमपी बिड़ला तारामंडल के पास शहीदों को श्रद्धांजलि देगा और कांग्रेस शहीद मीनार पर ऐसा करेगी। टीएमसी का तीसरा गुट यानी वे 20 लोकसभा सांसद, जो एनडीए के सहयोगी के तौर पर नई पार्टी एनसीपीआई में शामिल हुए हैं, भी रैली करने का दावा कर रहा है। लेकिन उन्होंने अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई कदम नहीं उठाया है। पुलिस को कोई पत्र नहीं भेजा गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने टीएमसी के ममता बनर्जी गुट को निर्देश दिया है कि वे सड़क का एक हिस्सा ट्रैफिक के लिए खुला रखें। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि कार्यक्रम में 2,500 से ज़्यादा कार्यकर्ता शामिल नहीं होने चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री के प्रति वफादार गुट ने पहले विक्टोरिया हाउस (एक बिजली कंपनी का मुख्यालय) के पास कार्यक्रम आयोजित करने की कोशिश की थी। पुलिस ने यह कहते हुए अनुमति देने से इन्कार कर दिया था कि इससे सेंट्रल बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट में  टै्रफिक व्यवस्था बिगड़ जाएगी, जिसके बाद वे कोर्ट चले गए। चित्तरंजन एवेन्यू और बेंटिंक स्ट्रीट के जंक्शन पर स्थित विक्टोरिया हाउस के आस-पास का इलाका दोनों टीएमसी गुटों की पसंद रहा है, क्योंकि वहां सड़क का लंबा हिस्सा होने के कारण भीड़ जुटाना आसान होता है। 1 जनवरी 1998 को पार्टी बनने के बाद से टीएमसी के लिए 21 जुलाई एक खास राजनीतिक कार्यक्रम रहा है, लेकिन इस बार राज्य की राजनीति में एक अभूतपूर्व स्थिति देखने को मिल सकती है। इस तरह एक ही दिन तीन अलग-अलग जगहों पर तृणमूल के दो गुट और राज्य कांग्रेस एक ही कार्यक्रम मनाएंगे। मौके का फायदा उठाते हुए प्रदेश कांग्रेस भी मैदान में उतर आई है। राज्य कांग्रेस प्रमुख शुभंकर सरकार ने कहा कि चूंकि 1993 में उस दिन पुलिस फायरिंग में कांग्रेस कार्यकर्ता मारे गए थे, इसलिए इसे मनाने का सबसे बड़ा हक हमारा है। ममता बनर्जी के प्रति वफादार गुट के पास विधायकों और कार्यकर्ताओं की कमी है। उनकी संख्या लगभग हर दिन घट रही है क्योंकि एक के बाद एक विधायक ऋ तब्रत गुट में शामिल हो रहे हैं।
पिछली सरकार के नेताओं और मंत्रियों के घोटालों के लगभग हर दिन सामने आने से उनके समर्थक निराश हैं। उनमें से बहुत से लोगों के तारामंडल के पास होने वाले कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना नहीं है। कांग्रेस, जिसके 294 सदस्यों वाली विधानसभा में केवल दो विधायक हैं, इस कार्यक्रम को मनाकर केवल अपनी संगठनात्मक मौजूदगी का एहसास कराएगी। 21 जुलाई वह दिन है जब ममता बनर्जी (जो तब कांग्रेस में थीं) के नेतृत्व में एक बड़े समूह के 14 कार्यकर्ता ‘राइटर्स बिल्डिंग’ (तब राज्य सचिवालय) तक मार्च के दौरान पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे। उस समय राज्य कांग्रेस बंटी हुई थी। बनर्जी सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ  आंदोलन कर रही थीं, जबकि तत्कालीन प्रदेश प्रमुख सोमेन मित्रा के नेतृत्व वाला दूसरा गुट अधिक संयमित रास्ता अपनाना चाहता था।
टीएमसी का शहीद दिवस शहर में हर साल ट्रैफिक जाम का कारण बनता है। कार्यकर्ता और नेता पूरे साल इसका बेसब्री से इंतजार करते थे, क्योंकि यहीं पर मंच के नीचे मौजूद भीड़ के सामने नए नेताओं से परिचय कराया जाता था। दूसरे शब्दों में, 21 जुलाई वह दिन था जब आम कार्यकर्ताओं को पता चलता था कि पार्टी प्रमुख किस पर मुस्कुराती हैं और किस पर नाराज़ होती हैं।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि टीएमसी के गठन के बाद से हर साल, हर कार्यकर्ता इस कार्यक्रम में शामिल होने की पूरी कोशिश करता है। पार्टी नेतृत्व के लिए यह आम कार्यकर्ताओं तक पहुंचने और उनके निरंतर समर्थन का भरोसा पाने का एक मौका होता है। लेकिन इस वर्ष 21 जुलाई का यह दिन पहले के मौकों से अलग होगा। 15 साल में पहली बार टीएमसी सत्ता से बाहर है।
दोनों गुटों के पास इस दिन को मनाने का दावा करने के पीछे एक जैसी वजहें हैं। यह हाल ही में अलग हुए दोनों गुटों के लिए लोगों का समर्थन जानने का एक इम्तिहान होगा। इस साल के आखिर में कोलकाता और आस-पास की कई नगर पालिकाओं में निकाय चुनाव होने हैं। रैली में शामिल लोगों की संख्या और उनका जोश, दोनों ही बातें आगे की चुनावी योजनाओं को तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी। (संवाद)

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