पूर्वी घाट की बोरा गुफाओं का रहस्य
सुबह के 5 बज रहे थे। अभी हल्का सा धुंधला था या फिर आसमान बदलियों से घिरे होने के कारण ऐसा लग रहा था। क्याेंकि उस समय पूर्वी घाट की पहाड़ियां, घने बादलों से लिपटी हुई थी लेकिन रातभर हुई बारिश के बाद जंगल से उठती मिट्टी की गंध, हवा में ताजगी बिखेरती तैर रही थी। स्थानीय लोग जो शायद काफी जल्दी जगते हैं, चलते हुए आपस में बार-बार एक बात कह रहे थे, ‘अगर आज गुफा देखनी है तो सावधानी से जाइयेगा।’ बारिश में वह कभी भी अपना मिजाज बदल सकती है। मैं एक खोजी हूं, इसलिए इस तरह की चेतावनियां मेरे लिए ज्यादा मायने नहीं रखतीं, क्योंकि ऐसी चेतावनियां अकसर सुनने को मिलती हैं, लेकिन मेरा लालच अपने पाठकों और दर्शकों को एक रहस्य-रोमांच की यात्रा पर ले जाने का होता है। इसलिए मैं ऐसी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। लेकिन आज न जाने क्यों स्थानीय लोगों की बातों से मुझे हल्का सा डर लग रहा था, लग रहा था उनकी बातों में कोई अंजाना भय छिपा हुआ है। कुछ देर बाद ही मैं आंध्र प्रदेश के अनंतगिरि पहाड़ी क्षेत्र में स्थित बोरा गुफाओं के प्रवेश द्वार पर खड़ा था। बाहर बारिश की बूंदे थीं, तो भीतर करोड़ों वर्षों का मौन कैद था। मेरे कदम जैसे ही अंधेरी गुफा की दुनिया में आगे बढ़े, ऐसा लगा मानो मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया हूं। बाहर पक्षियों का शोर था, भीतर केवल पानी की टप-टप और बूंदों की जो गूंज थी, वो शायद हजारों वर्षों से बिना रुके उमड़-घुमड़ रही थी।
मेरे साथ चल रहे स्थानीय गाइड ने टॉर्च की रोशनी एक विशाल चट्टान पर डाली और मुझे वह चट्टान अचानक किसी शिवलिंग सरीखी दिखाई देने लगी। कुछ दूर दूसरी आकृति किसी मानव चेहरे जैसी लग रही थी। मेरा गाइड मुस्कुराया और उसने हल्के से कहा, ‘ये सब चमत्कार वर्षा की इन बूंदों का है जो हर सेकंड उन पत्थरों को नई-नई शक्लें दे रही हैं। मैंने एक क्षण को टॉर्च बुझा दी और लगा वह सारा जादुई संसार जो मुझे रोमांचित कर रहा था, एक झटके में गायब हो गया। क्योंकि इतना गहरा अंधेरा मैंने अब के पहले ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था। अपनी हथेली तक दिखायी नहीं दे रही थी। तभी लगा मेरे सिर के ऊपर से चमगादड़ों का एक झुंड फड़फड़ाता निकला। हवा का एक तेज झोंका मेरे चेहरे से टकराया और कुछ पलों के लिए ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य चीज मेरे बिल्कुल पास से गुजरी हो। शायद गाइड को एहसास हो गया था कि मेरे मन में भय अपनी जगह बना रहा है, इसलिए उसने आश्वस्तकारी आवाज में कहा, ‘डरिये मत... यहां आवाजें कई तरह के काल्पनिक भ्रम पैदा करती हैं।’
वास्तव में गुफा का हर कोना हर छोटी से छोटी ध्वनि को भी कई गुना बढ़ाकर तो लौटाता ही था, उसे कई आकार, प्रकार भी दे देता था। जो भले शक्ल में न दिखते हों, लेकिन ध्वनि के जरिये एहसास होते थे। पानी की एक छोटी सी बूंद भी कई बार लगता जैसे किसी के हल्के कदमों की आहट है, तो कई बार लगता एक नहीं कई कदमों की आहट का समूह है। शायद हवाओं और बारिश की बूंदों की वजह से ही मानसून को लेकर बोरा पहाड़ियों में अनगिनत कहानियां बनती रही हैं। बहरहाल मैं जितना भीतर बढ़ता गया, रहस्यमयी आवाजों के साथ-साथ कई गुना ज्यादा ठंडक भी बढ़ती गई। ऊपर से लगातार रिसता पानी, चट्टानों पर गिर कर मोती जैसा बिखर रहा था। कहीं पतली धाराएं, कहीं तीखे पतले झरने, कहीं मानसून ने गुफा को जैसे फिर से जीवित कर दिया हो और कई जगहों परीक्षा लेता मौन भी पसरा था। मैंने गाइड से पूछा आखिर यह रिसता हुआ पानी जाता कहां है? मुझे लगा गाइड कोई मेरी तुरंत समझ में आने वाला जवाब देगा, लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया उलटे मुंह बिचकाते हुए कंधे उचका दिए, मतलब मेरी तरह उसे भी नहीं पता था कि मानसून ने जिस गुफा को जीवित कर दिया है, उसमें टपकने वाला और कई जगहों पर मनमोहने वाली रफ्तार से गिरने वाला पानी आखिर जाता कहां है?
इसी दौरान मेरी नज़र एक बेहद सकरी दरार पर पड़ी, वहां से तेजी से पानी भीतर जा रहा था। मुझे लगा यह भीतर जा रहा पानी जाने क्या मुसीबत खड़ी कर सकता है, इसके बारे में तो जानना ही चाहिए। लेकिन गाइड ने बड़ी इत्मिनान से कहा, ‘यही तो रहस्य है साब, ऊपर की बारिश का बहुत सारा पानी चट्टानों की दरारों से रिसकर भूमिगत रास्तों में जाने कहां खो जाता है, उसका रास्ता मेरे जैसे गाइड को क्या, किसी पुराने से पुराने आर्कियोलॉजिस्ट को भी नहीं पता चला।’ मुझे लगा बोरा गु्रफाओं का रहस्य कोई भूत-प्रेत नहीं, कोई ऊपर नीचे की हवा नहीं बल्कि स्वयं प्रकृति है। भू-वैज्ञानिक भी बताते हैं कि बोरा गुफाएं लाखों वर्षों तक चूना पत्थर पर पानी की लगातार क्रिया की देन है। वर्षा का पानी वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड लेता है, उसे हल्का सा अम्लीय बनाता है और यही पानी धीरे-धीरे चट्टानों को घोलता है और धरती के भीतर एक विशाल कक्ष के अंदर अनंत क्रमिक कक्षाओं की श्रृंखला शुरु होती है। यही पानी सुरंगें और घुमावदार प्राकृतिक स्तंभ निर्मित करता चलता है। छत से लटकती नुकीली संरचनाएं और ऊपर उठते पत्थर दरअसल प्रकृति द्वारा निर्मित वो रहस्यमयी मूर्तियां हैं, जिन्हें बहुत करीने से प्रकृति ने सिर्फ आकार नहीं दिया बल्कि उन्हें तराशा भी है।
जब लगभग एक घंटे बाद मैं गुफा के सबसे विशाल कक्ष में पहुंचा मैंने कुछ देरे के लिए अपनी गुफा टॉर्च बंद कर दी। अब मेरे चारों तरफ गिरते हुए बल्कि कहना चाहिए बहते हुए, पानी की रहस्यमयी आवाजों का घेरा था। उस क्षण मुझे एहसास हुआ, मैं जिस जगह खड़ा हूं, वहां इंसानों का नहीं पृथ्वी का इतिहास लिखा हुआ है। बाहर सभ्यताएं बनीं और मिट गईं, साम्राज्य उठे और गिरे, लेकिन इन चट्टानों पर गिरती पानी की बूंदें लगातार अपना काम करती रहीं। लगभग एक घंटे बाद जब मैं वापस लौटने लगा, तो बाहर बारिश और तेज हो रही थी। गुफा के मुहाने से बाहर निकलते हुए लगा जैसे किसी दूसरे ग्रह से मैं अभी-अभी धरती में आया हूं। मैंने पीछे मुड़कर आखिरी बार उस काले गुफा द्वार को देखा, वहां बिल्कुल शांति थी। मानो कुछ हरकत ही न हुई हो। लेकिन मैं जानता था कि उस प्रवेश द्वार के काफी भीतर अभी भी लाखाें बूंदें गिर रही है और हर बूंद एक नया आकार गढ़ रही है। हर मानसून में उस मौन संसार में एक रहस्यमयी, नया, अछूता और मौलिक संसार जोड़ा जाता है। शायद इसी कारण बोरा गुफाएं केवल एक पर्यटन स्थल नहीं हैं बल्कि यह हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति अपने सबसे बड़े रहस्य कभी शोर मचाकर नहीं बताती और उन्हें अंधेरे, पानी और समय की परतों में छुपाकर रखती है और केवल उन्हीं को उनकी एक झलक मिलती है, जो धैर्य के साथ उस समय अंधेरे में उतरने का साहस रखते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





