कैसे खत्म हो इंसान बनाम बाघ के बीच संघर्ष ?
29 जुलाई अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर विशेष
एक ऐसा भी समय था, जब भारत में बाघों की घटती संख्या सिर्फ हमारे लिए ही एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समस्या नहीं थी बल्कि पूरी दुनिया चिंतित थी। वास्तव में अंधाधुंध शिकार, जंगलों की बेरहमी से कटाई और अवैध वन्यजीव व्यापार ने देश के इस राष्ट्रीय पशु को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया था। इसी कारण इस संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने साल 1973 में टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जो दुनिया में अपनी तरह का पहला वन्यजीव संरक्षण का उपाय था। पिछले साढ़े पांच दशकों के सतत प्रयासों का परिणाम आज यह है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा जंगली बाघों का घर बन चुका है। यह सिर्फ भारत के लिए नहीं बल्कि वैश्विक वन्यजीव संरक्षण के लिए भी प्रेरणादायक है। लेकिन इस सफलता के साथ एक नई चुनौती भी पैदा हो गई है। बाघों की बढ़ती संख्या के कारण कई क्षेत्रों में उनके पारंपरिक आवास छोटे पड़ने लगे हैं। भोजन और नये क्षेत्र की तलाश में अब बाघ जंगलों से निकलकर खेतों और इंसानी बस्तियों तक पहुंच रहे हैं। इसी से इंसान और बाघों के बीच रह-रहकर संघर्ष सामने आ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के मौके पर आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत बाघों की रक्षा के साथ-साथ इंसानों की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर पायेगा?
दरअसल मानव-बाघ संघर्ष का सबसे बड़ा कारण जंगलों का सिकुड़ना और उनका खंडित होना है। नई सड़कें, रेलवे लाइनें, खनन परियोजनाएं, बांध और तेजी से फैलते शहर, जंगलों को छोटे-छोटे हिस्से में बांट रहे हैं। बाघ स्वभाव से बड़े क्षेत्र में विचरण करने वाला जीव है। एक वयस्क बाघ को कई वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है। लेकिन जब उसका प्राकृतिक आवास सीमित हो जाता है, तो वह नये इलाकों की ओर बढ़ता है। जहां उसका सामना इंसानों से होता है। संघर्ष केवल बाघों के कारण ही नहीं बढ़ता बल्कि मानव गतिविधियां भी इसकी बड़ी वजह होती हैं। जंगलों के आसपास खेती का विस्तार, मवेशियों की चड़ाई, ईंधन और लकड़ी के लिए जंगलों पर निर्भरता तथा बस्तियों का वन क्षेत्रों तक फैल जाना, बाघ और मनुष्य के बीच दूरी कम कर देता है। कई बार मवेशियों का शिकार करने के बाद बाघ गांवों के आसपास चक्कर लगाने लगते हैं। इससे भय का वातावरण बन जाता है। दूसरी ओर घबराये हुए लोग कभी-कभी बाघ पर संगठित हमला कर देते हैं और उसे मार डालने की कोशिश करते हैं। इस तरह दोनों एक दूसरे से नुकसान उठाते हैं। हाल के सालों में कई राज्यों ने इस चुनौती का व्यवहारिक समाधान खोजने की दिशा में काम किया है। कैमरा ट्रैप, ड्रोन, रेडियो कॉलर और जीपीएस आधारित निगरानी से बाघों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
वन विभाग के त्वरित प्रतिक्रिया दल गांवों में पहुंचकर लोगों को सतर्क करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर बाघ को पकड़कर सुरक्षित स्थान पर ले जाते हैं। कई राज्यों में प्रभावित परिवारों को इस संघर्ष से हुए नुकसान की भरपायी करने के लिए शीघ्र से शीघ्र मुआवजा देने की व्यवस्था भी बनायी गई है, जिससे लोगाें में वन्यजीव संरक्षण के प्रति विश्वास भी बना रहे। हालांकि केवल तकनीक पर्याप्त नहीं होती, विशेषज्ञ मानते हैं कि वन्यजीव गलियारों का संरक्षण ही इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान है। वास्तव में यह ऐसे प्राकृतिक मार्ग होते हैं, जो अलग-अलग जंगलों और टाइगर रिजर्वों को आपस में जोड़ते हैं। यदि बाघ सुरक्षित रूप से एक जंगल से दूसरे जंगल तक चला जाए, तो उनके गांवों में भटकने की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसलिए विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय, इन गलियारों को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी इस सबमें महत्वपूर्ण है। जिन लोगों का जीवन जंगलों से जुड़ा है, वे संरक्षण के सबसे मजबूत साझेदार बन सकते हैं। यदि उन्हें समय पर मुआवजा, अजीविका की वैकल्पिक व्यवस्था, पर्यटन से रोजगार और वन संरक्षण से लाभ मिलें, तो वे बाघ को खतरे के बजाय प्राकृतिक धरोहर के रूप में स्वीकार करेंगे।
कई टाइगर रिजर्वों के आसपास ऐसे उदाहरण देखने को मिल रहे हैं, जहां स्थानीय लोगों ने संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभायी है। बाघ केवल एक आकर्षक वन्यजीव भर नहीं है बल्कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षक है। अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस हमें यही याद दिलाता है कि बाघ और इंसान दोनो की सुरक्षित मौजूदगी ही वास्तविक संरक्षण की कुंजी है। आने वाले वर्षों में भारत की सफलता इस बात से आंकी जायेगी कि वह केवल बाघों की संख्या बढ़ाने में नहीं बल्कि उनके साथ सुरक्षित और संतुलित सहअस्तित्व स्थापित करने में कितना सफल होता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



