देश के नौजवानों की बड़ी जीत

शिक्षा सुधारों को दी जाए विशेष प्राथमिकता

कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में दिल्ली जंतर-मंतर पर चल रहे विद्यार्थी आंदोलन को बड़ी सफलता मिली है। देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अंतत: इस्तीफा दे दिया है। विद्यार्थियों की अन्य मांगें जिनमें नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों को एक-एक करोड़ का मुआवज़ा देने, आंदोलनकारी विद्यार्थियों के विरुद्ध दर्ज केस वापिस लेने, भविष्य में पेपर लीक होने से रोकने के लिए सख्त व्यवस्था करने और समूचे तौर पर शिक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए भी सरकार के साथ आंदोलनकारियों की सहमति बन गई है। इस तरह यह बड़ा आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो गया। केन्द्रीय मंत्री डा. राजेन्द्र सिंह, जे.पी. नड्डा और कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरभ दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली में एक साझी कांफ्रैंस में इस समझौते का ऐलान कर दिया है। इसी प्रैस क्रांफ्रैंस में कॉकरोच जनता पार्टी के उक्त नेताओं ने आंदोलन को समाप्त करने की भी घोषणा कर दी है। नि:संदेह इस सफलता में कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ-साथ देश की कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों की भी बड़ी भूमिका रही है।
यहां वर्णनीय है कि कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में 20 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरुद्ध केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने और कुछ अन्य मांगों के लिए आंदोलन शुरू किया गया था। इस आंदोलन की रणनीति के तौर पर देश के प्रसिद्ध वातावरण प्रेमी और शिक्षा शास्त्री सोनम वांगचुक और कई अन्य विद्यार्थियों ने अनिश्चित समय के लिए भूख हड़ताल भी शुरू की थी। शुरुआत में केन्द्र सरकार ने इस आंदोलन को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की, परन्तु जब सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के कारण स्वास्थ्य बिगड़ने लगा तो केन्द्र सरकार ने सुरक्षा एजैंसियों द्वारा वहां से जब्री उठाकर उसको सफदरजंग सरकारी अस्पताल में दाखिल करवा दिया था। इससे यह आंदोलन और उग्र हो गया। देश के अलग-अलग हिस्सों में से विद्यार्थी और आम लोग जंतर-मंतर पर इकट्ठे होने लगे।
20 जुलाई को जंतर-मंतर से कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा विद्यार्थियों को संसद की ओर मार्च करने का आह्वान किया गया था। उसको केन्द्र सरकार की एजैंसियों के अनुमानों से उलट कहीं ज्यादा बड़ा प्रोत्साहन मिला। मैट्रो स्टेशन बंद करने और लोगों को इकट्ठे होने से रोकने के लिए और बहुत सारे कदम उठाने के बाद भी अलग-अलग मार्गों से एक लाख से ज्यादा लोग जब संसद की ओर बढ़ने लगे तो सरकार और सुरक्षा एजैंसियां को हाथों-पैरों की पड़ गई। संसद में तैनात सुरक्षाबलों के जवान तेज़ी से भाग-भाग कर गेट बंद करते नज़र आए। इसके अलावा जंतर-मंतर से लेकर संसद तक आंदोलनकारी विद्यार्थियों और सुरक्षाबलों के बीच तीखा टकराव और झड़पें भी देखने की मिलीं। सुरक्षाबलों द्वारा संसद के आस-पास कई स्थानों पर बैरिकेटिंग की गई थी। आंदोलनकारी विद्यार्थियों द्वारा ये रुकावटें तोड़ कर आगे बार-बार आगे बढ़ने के यत्न किए गये। विद्यार्थियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सुरक्षाबलों द्वारा भारी लाठीचार्ज किया गया। आंदोलनकारियों के खिलाफ अश्रुगैस एवं पैलेट गनों का उपयोग भी किया गया। इससे पहले ये बंदूकें लम्बे समय तक जम्मू-कश्मीर में चलाई जाती रही थीं, जिस कारण बहुत सारे विद्यार्थियों की आंखें भी जाती रही थीं। इस आंदोलन में प्रयोग की गई पैलेट गनों के साथ भी एक विद्यार्थी की आंख चली गई और कई विद्यार्थियों के शरीरों पर पैलेट बंदूकों से हुए जख्मों की विडियो वायरल हुई हैं। एक विद्यार्थी को विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी ने मीडिया के सामने भी पेश किया था। इसके अलावा ऐसे वीडियोज़ भी वायरल हुए थे, जिनमें पुलिस आंदोलनकारियों के विरुद्ध कील लगी लाठियों और करंट वाली रॉडों के साथ हमले करती नज़र आ रही थी। इस संबंधी सुरक्षाबलों का यह पक्ष हो सकता है कि उन्होंने राजधानी में अमन-कानून की स्थिति बनाए रखने और विशेष तौर पर संसद की सुरक्षा को यकीनी बनाने के लिए यह कार्रवाई की थी, परन्तु जिस बेरहमी से यह कार्रवाई की गई थी, उसके साथ राष्ट्रीय स्तर पर नौजवान विद्यार्थियों के साथ-साथ आम लोगों की भावनाओं को भी गहरी ठेस पहुंची थी।
इस दौरान केन्द्र सरकार ने बार-बार पेपर लीक होने की घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कानून बनाने का फैसला किया है, जिसमें ऐसा अपराध करने वाले लोगों को 10 वर्ष की कैद और एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा केन्द्र सरकार ने नीट पेपर लीक होने के घटनाक्रम से संबंधित पकड़े गये आरोपियों को सज़ाएं देने के लिए देश में चार ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ बनाने का भी ऐलान किया है।
देश के आम लोगों की भावनाएं यह थीं कि केन्द्र सरकार द्वारा आंदोलनकारी विद्यार्थियों के साथ दुश्मनों की तरह नहीं बल्कि अपने देश के नागरिक समझ कर मानवीय ढंग से व्यवहार करना चाहिए था और बातचीत करके उनकी सभी समस्याओं के हल निकालने चाहिएं।
इस पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में यह बात भी उभर कर सामने आई है कि भारत की शिक्षा प्रणाली आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। शिक्षा के निजीकरण, व्यापारीकरण और केन्द्रीकरण ने निचले वर्गों को तो छोड़ो, मध्यम वर्ग के नौजवानों के लिए भी उच्च रोज़गारोन्मुख शिक्षा प्राप्त करना और अच्छी नौकरियां प्राप्त करना मुश्किल बना दिया है। पहले देश की अलग-अलग यूनिवर्सिटियों द्वारा अपने-अपने स्तर पर पेशेवर कोर्सों के लिए दाखिला टेस्ट लिए जाते थे। इन टेस्टों के भी कई बार पेपर लीक हो जाते थे, परन्तु फिर भी विद्यार्थियों को दाखिला लेने में इतनी ज्यादा समस्या नहीं आती थी। परन्तु केन्द्र सरकार ने ज्यादातर रोज़गारोन्मुख कोर्सों में दाखिलों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा लेना शुरू कर दिये थे। इससे न तो पेपर लीक होने की समस्याएं खत्म हुईं और न ही विद्यार्थियों के दाखिलों संबंधी मुश्किलें कम हुई हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इस समय ज्यादातर रोज़गारोन्मुख कोर्सों के दाखिला टेस्ट होते हैं, जिनमें मुख्य तौर पर जे.ई.ई. मेन जोकि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में दाखिले में लिया जाता है, नीट (यू.जी.) जो कि मैडीकल क्षेत्र में दाखिले के लिए लिया जाता है, सी.यू.ई.टी.यू.जी. जो यूनिवर्सिटियों में आम दाखिले के लिए लिया जाता है। इसके अलावा जे.ई.ई. अडवांस्ड, आई.आई.टीज़ में दाखिले के लिए तथा ‘गेट’ पोस्ट ग्रैजुएट इंजीनियरिंग कोर्सों में दाखिले के लिए लिया जाता है। कानूनी क्षेत्र की यूनिवर्सिटियों में दाखिले लेने के लिए ‘कलाट’ नामक टेस्ट लिया जाता है और एम.बी.ए. के दाखिले के लिए ‘कैट’ नामक टेस्ट लिया जाता है। और भी कई ऐसे टेस्ट हैं जो रोज़गारोन्मुख दाखिलों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर लिए जाते हैं। इसके अलावा राज्य स्तर पर भी दाखिले के लिए कई टेस्ट लिए जाते हैं। इसी प्रकार नौकरियां प्राप्त करने के लिए राज्य स्तर पर पब्लिक सर्विस कमिशनों द्वारा और राष्ट्रीय स्तर पर यूनियन पब्लिक सर्विस कमिश्न द्वारा टेस्ट लिए जाते हैं।
इस तरह से कहा जा सकता है कि देश के विद्यार्थियों को अलग-अलग रोज़गारोन्मुख कोर्स तथा नौकरियां हासिल करने के लिए एक तरह से अग्नि परीक्षाओं में से गुज़रना पड़ता है। वे अच्छे कालेजों तथा यूनिवर्सिटियों में दाखिले लेने के लिए तथा अच्छी नौकरियां प्राप्त करने के लिए वर्षों तक तैयारियां करते हैं। ग्राणीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को अपने घर से दूर शहरों में आकर कोचिंग सैंटरों के निकट किराये पर कमरे लेकर लम्बे समय तक रहना पड़ता है, तथा भारी खर्च करना पड़ता है। राष्ट्रीय स्तर पर पेशेवर कालेजों तथा यूनिवर्सिटियों में सीटों की कमी के कारण लाखों विद्यार्थियों को कड़े मुकाबले में से गुज़रना पड़ता है। यदि मैडिकल क्षेत्र की बात करें तो एमबीबीएस में प्रवेश के लिए नीट की परीक्षा में इस बार लगभग 24 लाख विद्यार्थी शामिल हुए थे। पेपर लीक होने के बाद दूसरी बार लगभग 22 लाख विद्यार्थी दोबारा शामिल हुए थे। जबकि देश में एम.बी.बी.एस. की सभी सीटें सिर्फ 1.36.939 ही हैं। कम सीटें होने के कारण अधिकतर विद्यार्थियों को दाखिला कोर्सों की परीक्षा पास करने के लिए कोचिंग सैंटरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार 2025 में देश के 37.8 प्रतिशत विद्यार्थी दाखिले के लिए कोचिंग सैंटरों पर निर्भर थे। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर दाखिला टैस्ट लेने वाली सरकारी संस्थाओं में निपुण एवं पेशेवर ढंग से कार्य करने वाले अधिकारियों तथा कर्मचारियों की भारी कमी पाई जाती है। ये आरोप भी लगते हैं कि इन संस्थाओं में अधिकतर सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा अपनी विचारधारा वाले लोगों को ही नियुक्त किया जाता है। उनकी महारत और प्रवीणता को मुख्य नहीं रखा जाता। इसके अतिरिक्त दाखिला परीक्षाओं का काम करने वाली ज़्यादातर संस्थाओं के पास अपने पूरे कर्मचारी भी नहीं होते। वे बहुत-से काम ‘आऊट सोर्सिंग’ प्रणाली के ज़रिये ठेके पर करवाते हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ वर्ष पहले बनाई गई नैशनल टैस्ंिटग एजैंसी के पास अपने कर्मचारी 2500 से भी कम हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इन्हें सारे देश में लाखों विद्यार्थियों के कई टैस्ट लेने पड़ते हैं। इसके अलावा इन दाखिला परीक्षाओं को करवाने वाली इन संस्थाओं में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार भी पाया जाता है। यह भी आरोप लगते हैं कि कोचिंग सैंटरों के मालिकों तथा दाखिला परीक्षा करवाने वाली संस्थाओं के भ्रष्ट अधिकारियों की मिली-भुगत से भी पेपर लीक होते हैं। देश में विद्यार्थियों के लिए रोज़गारोन्मुख कोर्सों में दाखिला लेने तथा अच्छी नौकरियां हासिल करने में दरपेश मुश्किलों के कारण ही बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने तथा अपना भविष्य बनाने के लिए विदेशों की ओर रुख करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। विदेशों में भी वहां अब उन्हें पहले से अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
उपरोक्त पूरा विवरण यह बताता है कि देश में शिक्षा बेहद महंगी भी हो गई है और आम लोगों की पहुंच से बाहर भी होती जा रही है। इस कारण विद्यार्थी बेहद तनाव वाली स्थिति में से गुज़रते हैं। राजस्थान का शहर कोटा जो कोचिंग सैंटरों का गढ़ है, से प्रत्येक वर्ष दर्जनों विद्यार्थियों के आत्महत्या करने के समाचार आते हैं। शिक्षा की इस जटिल व्यवस्था के कारण गरीब परिवारों के बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और उनमें से बहुत-से अपराध की दुनिया में प्रवेश करके चोर, लुटेरे तथा गैंगस्टर बन जाते हैं, जिस कारण देश में अमन एवं कानून की गम्भीर समस्या भी पैदा होती जा रही है। 
यह पूरी चर्चा इस बात की मांग करती है कि केन्द्र सरकार तथा अलग-अलग राज्य सरकारें शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी निवेश बढ़ा कर स्कूलों, कालेजों तथा यूनिवर्सिटियों को बेहतर बनाने, उनकी संख्या में और वृद्धि करने, देश के आम लोगों के बच्चों के लिए सस्ती एवं स्तरीय शिक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए। दाखिला प्रणाली को पेपर लीक होने तथा अन्य अनियमिताओं से मुक्त करना भी बेहद ज़रूरी है। समूची शिक्षा व्यवस्था की परख करके बदल रहे संसार के अनुसार उसे अधिक रोज़गारोन्मुख बनाने की भी ज़रूरत है।
इसके साथ ही देश की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के दृष्टिगत पाठ्यक्रम निर्धारित करते समय शिक्षा के क्षेत्रीय संदर्भों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। केन्द्र सरकार द्वारा शिक्षा के किए जा रहे भगवाकरण से भी देश में बड़ी चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। देश का खासा यह मांग करता है कि विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया जाए। इसके साथ ही शिक्षा के माध्यम से देश में आपसी सद्भावना बढ़ाने को भी प्राथमिकता दी जाए। ऐसे बहुपक्षीय दृष्टिकोण से ही देश में पैदा हुए शिक्षा प्रणाली के संकट का समाधान किया जा सकता है और युवाओं को देश के विकास तथा अन्य सार्थक कार्यों की ओर लगाया जा सकता है।   

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