आगरा की सैर
दिल्ली से आगरा तक का सफर हमने कितनी उम्मीदों, कितनी पुरानी यादों और किस कदर उमड़ते उत्साह के साथ तय किया था, यह शायद सिर्फ हम दोनों के दिल ही जानते थे। शादी के बाद ज़िंदगी जिम्मेदारियों की ऐसी भूलभुलैया में उलझ गई थी कि कहीं चैन से साथ घूमने का, एक-दूसरे की आंखों में देखकर सुकून के दो पल बिताने का मौका ही नहीं मिला। पहले करियर की जद्दोजहद, फिर बच्चों की परवरिश और घर परिवार की अनगिनत उलझनें। इन सबके बीच हमारे अपने सपने जैसे कहीं बहुत पीछे छूट गए थे। बरसों बाद जब बच्चों की पढ़ाई थोड़ी पटरी पर आई और घर की जिम्मेदारियों से कुछ राहत मिली, तब मेरी पत्नी ने एक दिन अचानक चाय का कप थमाते हुए कहा था कि ज़िंदगी पता नहीं कब तक यूँ ही भागती रहेगी। उसने बड़ी मासूमियत से कहा था कि उसे एक बार ताजमहल देखना है। कहते हैं कि मोहब्बत वहां जाकर और भी गहरी लगने लगती है, और वह उस एहसास को जीना चाहती थी।
उसकी आंखों में उस वक्त एक ऐसी ललक दिखी जिसे मैंने बरसों से नहीं देखा था। मैंने उसी पल अपने मन में यह तय कर लिया कि इस बार चाहे जो हो जाए, उसकी यह छोटी सी लेकिन बेहद खास इच्छा मैं ज़रूर पूरी करूँगा। हमने अपनी यात्रा की पूरी योजना बनाई और सफर पर निकल पड़े।
सफर के दौरान वह पूरे रास्ते छोटे बच्चों जैसी उत्सुकता और खुशी में डूबी रही। कभी वह कार की खिड़की से बाहर भागते हुए हरे भरे खेतों को निहारती, कभी आसमान में उड़ते परिंदों को देखती, तो कभी सड़क किनारे तेजी से पीछे छूटते पेड़ों को देखकर मुस्कुरा उठती। बीच-बीच में वह अचानक मेरी तरफ मुड़ती और पूछती कि सच बताइए, ताजमहल तस्वीरों से भी ज्यादा सुंदर होता है क्या? मैं उसकी इस बालसुलभ जिज्ञासा पर हंस देता और उसे चिढ़ाते हुए कहता कि इतिहास गवाह है कि शाहजहां ने उसे अपनी बेपनाह मोहब्बत की निशानी के तौर पर बनाया था, अब इतना बड़ा बादशाह भला झूठ तो नहीं बोल सकता। मेरी यह बात सुनकर वह जोर से खिलखिलाकर हंस पड़ती। उसकी वह हंसी मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत आवाज थी।
हमारी कार को आगरा शहर की सीमा में दाखिल होते होते शाम ढलने लगी थी। आसमान पर सूरज की धुंधली लालिमा तैर रही थी और शहर की संकरी सड़कें भारी भीड़, गाड़ियों के शोर और धुएं से भरने लगी थीं। ट्रैफिक की वजह से हमारी रफ्तार बहुत धीमी हो गई थी। हमें सबसे बड़ा अफसोस इसी बात का हो रहा था कि जिस ताजमहल को देखने के लिए हमने इतनी लंबी योजना बनाई थी, उसे देखने का समय लगभग खत्म हो चुका था।
मेरी पत्नी का खिलखिलाता हुआ चेहरा अचानक उतर गया। उसकी आंखों की चमक की जगह एक गहरी उदासी ने ले ली। उसने भारी मन से पूछा कि क्या इतनी दूर आकर भी हमें ताजमहल देखे बिना ही वापस लौटना पड़ेगा। मैं उसे इस तरह निराश नहीं देख सकता था। मैंने तुरंत माहौल को हल्का करने और उसकी उम्मीद जगाए रखने के लिए कहा कि अभी रात पूरी कहां हुई है, अगर आज ताज नहीं देख पाए तो क्या हुआ, चलो आज शाम को आगरा का लाल किला ही देख लेते हैं, कल सुबह इत्मीनान से ताजमहल देखेंगे।
हम जल्दी-जल्दी अपनी गाड़ी पार्क करके आगरा किले की तरफ निकल पड़े। रास्ते में पुरानी इमारतें, भीड़भाड़ वाले सजे हुए बाजार और देश विदेश के पर्यटकों की आवाजाही देखकर आगरा शहर का एक अलग ही ऐतिहासिक रंग महसूस हो रहा था। हर तरफ एक अजीब सी चहल-पहल थी। लेकिन जब हम किले के विशाल मुख्य द्वार तक पहुँचे, तब तक सूरज पूरी तरह डूब चुका था और वहां एक गहरा सन्नाटा उतरने लगा था। लाल पत्थर के उस किले के भारी भरकम लोहे के दरवाजे बंद हो चुके थे। वहां तैनात गार्ड ने हमें दूर से ही हाथ हिलाकर वापस जाने का इशारा कर दिया।
मेरी पत्नी ने अब पूरी तरह निराश होकर एक लंबी सांस ली और कहा कि लगता है आज हमारी किस्मत ही खराब है, जो चाहा वह कुछ भी नहीं हो पा रहा। मैं भी भीतर से बहुत उदास हो चुका था, मगर उसे यह दिखाना नहीं चाहता था। मैं उसे सांत्वना देने के लिए कुछ शब्द ढूँढ ही रहा था कि तभी किले के बाहर खड़े दो तीन आदमी हमारी तरफ बड़े इत्मीनान से बढ़ते हुए आए। उनके चेहरों पर एक मुस्कान थी।
उनमें से एक ने बेहद मीठी आवाज़ में कहा कि साहब, लगता है पहली बार आगरा आए हो। मैंने बिना कुछ सोचे समझे बस हां में सिर हिला दिया। वह तुरंत एक गहरा अपनापन दिखाते हुए बोला कि कोई बात नहीं साहब, निराश क्यों होते हो, असली मजा तो आगरा में रात के वक्त ही आता है। उसने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा कि आज चांदनी रात होने वाली है, यहां पीछे से ताजमहल का नजारा ऐसा दिखता है कि लोग बस पलकें झपकाना भूल जाते हैं।
उसके दूसरे साथी ने बात को और पुख्ता करते हुए आगे बढ़ाया और कहा कि हम लोग यहीं पर्यटन विभाग के लिए काम करते हैं। अगर आप दोनों चाहें तो हम आपको एक ऐसी बढ़िया जगह से ताज दिखा देते हैं जहां से पूरा नजारा साफ दिखता है और वहां भीड़भाड़ का भी कोई झंझट नहीं होगा। (क्रमश:)



