देश में गर्म होते दिनों का बढ़ता ़खतरा
विश्व के अनेक छोटे-बड़े देशों में निरन्तर उग्र होती गर्मी और बढ़ते तापमान ने एक ओर जहां दशकों के पुरातन रिकार्डों को तोड़ा है, वहीं धरती और अन्तरिक्ष के बीच पर्यावरण और ओज़ोन परत को भी खतरा बढ़ाया है। भारत का शुमार भी उन देशों में है जहां भीषण गर्मी ने धरती पर मानव जीवन और वनस्पति जगत को खतरे की ओर धकेला है। सम्पूर्ण विश्व में बढ़ती गर्मी से प्रभावित होने वाले देशों में भारत के साथ पोलैंड, क्रोएशिया, हंगरी, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन सहित योरुप के अनेक देश शामिल हैं। फ्रांस में इस वर्ष की गर्मी पिछले कई दशकों से अधिक रिकार्ड की गई है।
फ्रांस में गर्मी का 80 वर्ष पुराना रिकार्ड टूटा है। वहीं तापमान दशकों बाद 44 डिग्री सैल्सियस के पार गया है। बढ़ती गर्मी के कारण इन देशों में बिजली और पानी की सप्लाई पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। बिजली की मांग बढ़ने से फ्रांस और योरुप के कई देशों में बार-बार बिजली बंद होने लगी है। इन देशों की 90 प्रतिशत आबादी भीषण गर्मी, बिजली संकट और पेयजल आपूर्ति बाधित होने से प्रभावित हुई है। ब्रिटेन और फ्रांस में गर्मी बढ़ने के बार-बार अलर्ट जारी किये गये हैं। फ्रांस में भीषण गर्मी और लू की चपेट में आने से अब तक पांच दर्जन से अधिक मौतें हो चुकी हैं। भारत में भी प्रत्येक वर्ष लू के ताप से लोगों के मरने की खबरें आती रहती हैं।
भारत में भी इस वर्ष गर्मी ने भीषणता के पिछले कई रिकार्ड तोड़े। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों तथा बिहार के लगभग सभी क्षेत्रों में गर्मी का ताप अतीत के दशकों के रिकार्ड से ऊपर पहुंचा। देश में पड़ने वाले भीषण गर्मी वाले दिनों में पिछले कुछ वर्षों से निरन्तर इज़ाफा हुआ है। देश के अनेक राज्यों में मौजूदा मौसम की गर्मी और गर्म होते दिनों के संबंध में किये गये विश्लेषण की एक रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक के बाद से, निरन्तर पिछले पांच दशक में एक ओर जहां गर्मी की तीव्रता बढ़ी है, वहीं एक वर्ष में गर्म होते दिनों की संख्या में बड़ा इज़ाफा होते पाया गया है। वर्ष 1970 के बाद एक दशक में प्रति वर्ष अतीव गर्म दिनों की संख्या जहां 101 थी, वहीं 2016 से 2025 के बीच ऐसे दिनों की संख्या 141 से भी अधिक हो गई है। भविष्य में इन दिनों की संख्या और बढ़ने की चेतावनी जारी की गई है। इन गर्म होते दिनों में धरती के नीचे वाला पानी भी गर्म हुआ है। वहीं जीवों और प्राणियों को उपलब्ध होता पेयजल गर्म होते जाने से प्राणियों में रोगों की संख्या बढ़ी है। न्यूनतम तापमान बढ़ने से बर्फ के जमने और पिघलने की रफ्तार पर असर पड़ा है। इससे कहीं बाढ़ और कहीं सूखे की स्थिति बनी है। वहीं ओज़ोन की परत भी इस भीषण गर्मी के कारण प्रभावित होने से मौसम एवं वर्षा का गतिमान भी प्रभावित हुआ है।
वैज्ञानिकों और मौसम विज्ञानियों के अनुसार भारत में इस भीषण गर्मी से लू का ताप बढ़ने और मनुष्यों के भीतर पानी की कमी उपजने का खतरा भी बढ़ा है। देश के कई राज्यों में गर्मी से उपजी लू और हीट स्ट्रोक से जहां बीमारियों की संख्या बढ़ी है, वहीं बीमार होने वालों की तादाद भी बढ़ी है। देश के लाखों लोग अनजाने में अज्ञात रोगों का शिकार बनते जा रहे हैं। ओज़ोन परत के क्षतिग्रस्त होने की चर्चायें बहुत पहले से होते आ रही हैं। विश्व के बड़े देशों ने इस हेतु यत्न शुरू तो किये थे, किन्तु कुछ देशों के हठवाद और नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई के कारण ऐसे सभी यत्न हवाओं में लटक कर रह गये।
हम समझते हैं कि नि:संदेह इस बड़े खतरे का एक बड़ा हिस्सा मानव-निर्मित पाया गया है। धरती पर निरन्तर बढ़ती ऊर्जा और ताप ने एक ओर जहां धरती पर गर्मी को बढ़ाया है, वहीं ओज़ोन परत को पहुंचे नुक्सान के कारण सूर्य की किरणें सीधे धरती पर पहुंचने लगी हैं। इस कारण गर्म होते दिनों की संख्या और एक दिन में सूर्य-ताप से प्रभावित समय की अवधि बढ़ने से भी इस खतरे की भीषणता बढ़ी है। हम समझते हैं कि धरती पर जीवन को बचाने और सुरक्षित करने के लिए गर्मी का ताप बढ़ाते मानवीय कारकों को यथाशीघ्र नियंत्रित करना होगा अन्यथा स्थितियों की गम्भीरता एक दिन उस रसातल की ओर अग्रसर हो जाएगी जहां से वापिस लौटना अत्याधिक कठिन हो सकता है। विकास और उन्नति के इस युग में बेशक औद्योगिकरण जैसी क्रियाओं को रोकना संभव नहीं, किन्तु इस संबंधी अतिशयता पर अंकुश लगा कर संतुलन अवश्य बनाया जा सकता है। यह संतुलन जितना शीघ्र सम्भव हो पाएगा, धरती पर मानवता के उतना ही हित में होगा।



