क्या हसीना की वापसी से भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार होगा ?
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पिछले दिनों भारत में अपना निर्वासन समाप्त कर इस साल दिसम्बर में अपने देश लौटने की घोषणा ने भारत और बांग्लादेश के अलावा वैश्विक राजनयिक हलकों में बड़ी दिलचस्पी पैदा कर दी। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वह न्याय का सामना करने और अपनी पार्टी अवामी लीग को पुनर्जीवित करने के लिए स्वेच्छा से अपने देश लौटने का इरादा रखती हैं। छात्रों के भेदभाव विरोधी आंदोलन के चरम पर शेख हसीना ने 5 अगस्त, 2024 को ढाका छोड़ दिया था और तब से अपदस्थ प्रधानमंत्री भारत में रह रही हैं। भारत सरकार ने बांग्लादेश सरकार द्वारा कई बार की गई प्रत्यर्पण मांग का जवाब नहीं दिया। फिलहाल, शेख हसीना को 2024 के विरोध प्रदर्शनों में छात्रों की हत्या में उनकी कथित भूमिका के लिए मौत की सज़ा का सामना करना पड़ रहा है।
अचानक ऐसा क्या हुआ कि बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान जिनकी 15 अगस्त, 1975 को कुछ विद्रोही सैन्य अधिकारियों ने हत्या कर दी थी, की बेटी शेख हसीना ने अचानक अगले छह महीने के भीतर ढाका लौटने की योजना बनाई है? शेख हसीना कोई राजनीतिक नौसिखिया नहीं हैं। उन्होंने ज़रूर कुछ योजना बनायी होगी। यह मान लेना भी उचित है कि उन्होंने भारत सरकार के नेतृत्व से परामर्श किया होगा। शेख हसीना के भविष्य में भारत की हिस्सेदारी है। हसीना और उनके सलाहकारों ने अन्य देशों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी निकायों के साथ परामर्श किया होगा।
जहां तक बांग्लादेश की प्रतिक्रिया का सवाल है, बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सरकार इसे अशांति भड़काने के संभावित जाल के रूप में देखती है, लेकिन फिर भी बीएनपी प्रशासन की ओर से कुछ संयम है। सूत्रों का कहना है कि एक बार जब वह वापस लौटेंगी तो उनके साथ कानून के मुताबिक व्यवहार किया जाएगा। गौरतलब है कि हसीना ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि वापस लौटने पर वह अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में अपने हास्यास्पद मुकद्दमे का पर्दाफाश करेंगी। यह मानने के कारण हैं कि अपदस्थ प्रधानमंत्री और उनके सलाहकारों, जिनमें से कई ब्रिटेन और अमरीका में हैं, ने कानूनी निहितार्थों और बांग्लादेश में मुकद्दमा शुरू होने के बाद इसका अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की संभावना का आकलन किया है।
जहां तक भारत-बांग्लादेश संबंधों की बात है, भारत के लिए हसीना का अपनी मज़र्ी से बांग्लादेश लौटने पर सहमति जताना एक बड़ी राहत है। बीएनपी सरकार प्रत्यार्पण पर ज़ोर दे रही है और बांग्लादेश में आम राय है कि जब तक शेख हसीना को बांग्लादेश सरकार को नहीं सौंप दिया जाता, भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कोई सुधार नहीं हो सकता। वह अवरोध अब खत्म हो रहा है और भारतीय विदेश मंत्रालय के लिए ढाका के साथ संबंध सुधारने के लिए नए कदम उठाना आसान हो गया है। बांग्लादेश में चीन की चुनौती का मुकाबला करने के लिए नई दिल्ली को कुछ पूरक कदम उठाने होंगे। जून के अंतिम सप्ताह में बांग्लादेश के प्रधान मंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंधों के एक नए युग की शुरुआत की। तीस्ता व्यापक विकास और पुनर्स्थापन संधि पर हस्ताक्षर का उत्तर पूर्वी हिस्से में भारत की नदी प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। हसीना के अपने आप वापस जाने से भारतीय पक्ष के लिए द्विपक्षीय मुद्दों को मैत्रीपूर्ण तरीके से उठाने के लिए सही माहौल तैयार हुआ है।बांग्लादेश में बीएनपी सरकार अब पांच महीने पूरे करने जा रही है। इस दौरान पीएम तारिक रहमान ने संयम से काम लिया है। उन पर मुख्य विपक्षी जमात-ए-इस्लामी का जबरदस्त दबाव है जो हमेशा कोई भी मुद्दा उठाता है और उसे भारत विरोधी रंग दे देता है। नैशनल सिटीज़न पार्टी (एनसीपी) भी भारत के खिलाफ समान रूप से मुखर है, हालांकि दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। बीएनपी अब बांग्लादेश की संसद में एकमात्र पार्टी है जिस पर भारत द्विपक्षीय मुद्दों पर समझदार दृष्टिकोण के लिए निर्भर हो सकता है। अगर हसीना की वापसी के फैसले से बीएनपी सरकार और भारत के बीच बेहतर समझ की संभावना खुलती है, तो यह नई दिल्ली के लिए सकारात्मक विकास होगा। ढाका स्थित विश्लेषकों का कहना है कि अपने निर्वासन से दिसम्बर में बांग्लादेश लौटने की घोषणा करके हसीना अपने समर्थकों को उत्साहित करना चाहती हैं और उन्हें स्थानीय चुनावों में बड़े पैमाने पर भाग लेने के लिए कहना चाहती हैं।
हालांकि, इस बात की भी संभावना है कि हसीना की वापसी और मुकद्दमा शुरू होने के बाद बांग्लादेश की राजनीति फिर से गर्मा जाएगी। (संवाद)



