प्रधानमंत्री आवास पर धरने को लेकर इतना हल्ला क्यों ?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री आवास से थोड़ी दूरी पर धरना-प्रदर्शन किया। इसे लेकर ऐसा हल्ला मचा, जैसे यह पहली बार हुआ हो। भाजपा से ज्यादा टीवी चैनलों ने हल्ला मचाया। भाजपा के नेताओं को सब पता है कि पहले भी प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन होते रहे हैं, लेकिन भाजपा और मीडिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रदर्शन को गलत बताया। ऐसा माहौल बनाया, जैसे राहुल गांधी ने बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। अतीत में खुद भाजपा नेताओं ने भी प्रधानमंत्री आवास के सामने प्रदर्शन किया है। अटल बिहारी वाजपेयी नेता प्रतिपक्ष रहते 1998 में प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठे थे, जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी थी। वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा नेता प्रधानमंत्री आवास सात रेसकोर्स रोड के बाहर धरने पर बैठे। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल ने खुद बाहर आकर वाजपेयी की बात सुनी और उनका धरना खत्म कराया था। इसके बाद भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आवासों के बाहर प्रदर्शन हुए। 2012 में निर्भया कांड के बाद युवाओं ने इंडिया गेट पर धरना दिया था और घंटों तक राष्ट्रपति भवन के दरवाज़े झकझोरते रहे थे। तत्कालीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिदे ने पुलिस को निर्देश दिया था कि युवाओं पर कोई कार्रवाई नहीं करनी है। इस बार तो सरकार ने छात्रों से बात भी नहीं की और लाठीचार्ज करा दिया था।
भाजपा का हर दांव उलटा पड़ रहा 
इन दिनों भाजपा और उसकी सरकार का हर दांव उलटा पड़ रहा है। सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठवाने की रणनीति हो या छात्रों पर लाठीचार्ज की रणनीति हो, दोनों का विपरीत असर हुआ है। ऐसे ही राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने के खिलाफ  भाजपा की ओर से राज्यों में कांग्रेस कार्यालयों पर प्रदर्शन की रणनीति भी उलटी पड़ती दिख रही है। इससे यह संदेश जा रहा है कि भाजपा को किसी भी मुद्दे पर अपनी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन पसंद नहीं है। कांग्रेस कार्यालयों पर भाजपा के प्रदर्शन को छात्रओं और युवाओं अपने खिलाफ प्रदर्शन माना। उनका कहना है कि राहुल उनकी बात लेकर प्रदर्शन करने गए थे और वह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं था, फिर क्यों भाजपा उसे राजनीतिक रंग दे रही है। पटना में इसकी गूंज सबसे ज्यादा सुनाई दी। वहां भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ता कांग्रेस मुख्यालय पर प्रदर्शन करने पहुंचे,  जहां उनकी कांग्रेस कार्यकर्ताओं से भिड़ंत हो गई। उसी समय हज़ारों छात्र पटना में अलग-अलग जगह प्रदर्शन कर रहे थे। ऐसा लगा जैसे भाजपा छात्रों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने कांग्रेस कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। वहां भी भाजपा के इस प्रदर्शन का सकारात्मक संदेश नहीं है।
सीजेपी पर मेहरबान है सरकार
आम तौर पर यह माना गया है और कांग्रेस इकोसिस्टम के लोग तो अब भी मान रहे है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां छात्रों की नाराज़गी का लाभ न उठा सकें, इसके लिए भाजपा ने योजना के तहत कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का गठन कराया। बहरहाल इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार सीजेपी पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रही है। 20 जुलाई को प्रदर्शन पर हुई पुलिस कार्रवाई सीजेपी को लोगों पर नहीं थी। वह कार्रवाई छात्रों का समर्थन करने आए भीम आर्मी, जामिया, जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों पर थी। वास्तविकता यह है कि जिस दिन से आन्दोलन शुरू हुआ, उस दिन से सरकार सीजेपी पर मेहरबान है। जैसे दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर पहले प्रदर्शन की अनुमति 15 मिनट के अंदर दी थी। सीजेपी ने 6 जून को प्रदर्शन का ऐलान कर दिया लेकिन अनुमति नहीं ली। 6 जून की सुबह अभिजीत दीपके दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे और वहीं उनसे आवेदन लिया गया और वहीं मंजूरी दे दी गई थी। दूसरी बार भी उन्हें प्रदर्शन की अनुमति हाथोहाथ मिल गई और 28 जून से वहां सोनम वांगचुक अनशन पर बैठ गए। यही नहीं, 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान कॉकरोच पार्टी का मंच टूट गया, लेकिन उसी रात 9 बजे के बाद पुलिस वाले वहां खड़े रहे और मंच फिर से बनवाया। मौजूदा स्थिति में यह सब सामान्य बात नहीं है।
पंजाब में अकेले लड़ेगी भाजपा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 17 जुलाई को पंजाब यात्रा के दौरान यह बात और साफ हो गई है कि भाजपा आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने की तैयारी कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी रविदास समाज के डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख निरंजन दास से भी मिले। पिछले साल केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। गौरतलब है कि पंजाब में करीब 33 फीसदी दलित आबादी है। भाजपा इस बार इनके वोट में अच्छा खासा हिस्सा हासिल करने की उम्मीद कर रही है। पंजाब में हिन्दू आबादी करीब 38 फीसदी है और 50 से ज्यादा सीटों पर हिन्दू मतदाताओं का खासा असर है। भाजपा इन सीटों पर फोकस करके चुनाव लड़गी। कहने को तो भाजपा ने भी प्रदेश अध्यक्ष जट्ट सिख समुदाय के केवल सिंह ढिल्लों को बनाया है, लेकिन सबको पता है कि भाजपा की राजनीति हिन्दू वोट की होती है। कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी और वारिस पंजाब दे के प्रमुख चेहरे भी जट्ट सिख समुदाय के हैं। जट्ट सिख समुदाय लगभग 22 फीसदी आबादी वाला है, लेकिन मालवा क्षेत्र की 69 सीटों पर अच्छा खासा असर रखता है। भाजपा को पता है कि चार पार्टियों के बीच जट्ट सिख वोट बंटता है तो 38 फीसदी हिन्दू आबादी ही भाजपा को सबसे बड़ी या दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बना सकती है। 
ममता का अब भी है दबदबा
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी हार कर सत्ता से बाहर हो गई। सत्ता गंवाने के बाद उनकी पार्टी भी टूट गई, लेकिन ममता बनर्जी अब भी जनता के बीच अन्य नेताओं से ज्यादा लोकप्रिय हैं। यह उन्होंने 21 जुलाई को दिखाया। असल में इस दिन हर साल वह शहीद दिवस मनाती हैं। 1993 में वाम मोर्चा के शासन के दौरान एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से युवा कांग्रेस के 13 लोगों की जान गई थी। तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद ममता बनर्जी अपने बैनर तले हर साल यह कार्यक्रम करती हैं। इस बार उनकी पार्टी छोड़ चुके विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में शहीद दिवस का आयोजन किया। उनकी वजह से प्रशासन ने ममता को आयोजन के लिए एस्प्लेनेड के सामने वाली पुरानी जगह नहीं दी। उन्होंने नई जगह पर रैली का आयोजन किया। ऋतब्रत बनर्जी गुट ने अलग रैली का आयोजन किया और इस बार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने भी अलग आयोजन किया। तीनों कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा भीड़ ममता बनर्जी की रैली में जुटी और सबसे कम ऋतब्रत बनर्जी के कार्यक्रम में।

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