घातक है बच्चों को डराना

‘प्रियंका, ठीक है। तुम स्कूल नहीं जाओगी, अभी बुलाती हूं पुलिस वाले को।’ ‘बॉबी तुम बहुत जिद्द करते हो, रूको बुलाता हूं, साधु बाबा को जो तुझे झोली में डालकर जंगल में ले जायेगा’, आदि-आदि ऐसी कई डरावनी धमकियां हमें बच्चों के संदर्भ में सुनने को मिलती हैं। 
क्या कभी सोचा है कि यह डराने धमकाने की प्रवृत्ति आपके लिए आगे चलकर सिरदर्द बन सकती है? इस आदत से बच्चों में जो भय व्याप्त हो जायेगा, उससे उनको मुक्त करना इतना कठिन कार्य होता है। फिर भले ही बच्चे को लाख बार पुचकारो व सीने से लगाओ लेकिन उसके भीतर बैठा डर उसे पूरी तरह से झकझोर कर रख देता है।
डर के प्रभाव से बच्चे का मानसिक विकास तो रूकता ही है लेकिन कभी-कभार तो किलकारियों से गूंजता घर तनाव व सन्नाटे का रूप भी ले सकता है। बच्चों को डराने व धमकाने में विशेष रूप से मां की सक्रिय भूमिका होती है जिससे वे बच्चे के मन में दहशत व भय अनायास ही पैदा कर अपना कार्य आसानी से कर लेती हैं।
जहां तक प्रश्न है छोटे बच्चों की जिद्द का तो यह हर घर परिवार की समस्या है क्योंकि बच्चे अबोध व चंचल मन के होते हैं। वे दूसरे बच्चों की देखा-देखी घर में जिद्द का वातावरण उत्पन्न कर कोहराम तक मचाते हैं व कई बार ऐसी चीजें लेने की जिद्द कर बैठते हैं जिन्हें दिलवाना संभव नहीं होता। हालांकि उसे समझाने का प्रयास किया जाता है लेकिन जब बच्चा अपनी जिद्द से बाज आता नहीं दिखता तो तैश में आकर माता या पिता उसे मारने-पीटने पर उतारू हो जाते हैं अथवा कमरे में बंद करने या फिर डराने जैसे सहारे को अपनाते हैं।
कई अवसरों पर माता-पिता इतना कठोर रवैय्या अपना लेते हैं कि वे बच्चों को अंधेरे कमरे या स्टोर में देर तक बंद कर अपनी मस्ती में खो जाते हैं और बच्चा रो-रोकर बेहोश तक हो जाता है। 
बच्चों को डराने-धमकाने से उनका बाल जीवन पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। रह रह कर उसे डरावनी बातें याद आती हैं और वह सिहर उठता है। इस तरह की डरावनी स्मृतियों से बच्चों को ‘स्नायुरोग’ हो जाता है। बच्चे प्रकृति का अनुपम उपहार होते हैं वे तो उस गीली मिट्टी की भांति होते हैं कि उन्हें चाहे जिस सांचे में ढाला जा सकता है। 
 मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चे मारपीट, डांट-डपट से हरगिज नहीं मानते। यदि परिवार में माता-पिता उसे डराने-धमकाने व पीटने का सहारा लेते हैं तो निश्चय ही यह बच्चों के प्रति बरती गयी पारिवारिक हिंसा का ही रूप है। बच्चों को अक्सर छोटी-छोटी गलतियों व जिद्द के लिए इतनी भयभीत करने वाली सजा न दें कि उनके मस्तिष्क पर इसका प्रतिकूल असर हो। डर व भय से बच्चा अपने से बड़ों को प्राय: अपना दुश्मन ही समझने लगता है। ऐसे व्यवहार तथा सोच से बच्चे का बौद्विक विकास तो अवरूद्ध होगा ही, साथ ही साथ उसमें चारित्रिक दोष भी उत्पन्न होते देर नहीं लगेगी।
बच्चों की जिद्द खत्म करने के लिए उन्हें मारना-पीटना, धमकाना व भयभीत करना कोई विकल्प नहीं है तो सदैव प्यार करना, दुलारना व उसकी हर जिद्द को पूरा करना भी उचित नहीं है। हां कभी-कभार उसे डांटा-डपटा जा सकता है ताकि वह अनुशासित रहे परन्तु यह बात गांठ बांध लें कि हमेशा यह रवैय्या बच्चों के साथ न अपनाया जाये।
यदि बच्चों के साथ हमेशा सख्ती बरती जाये तो वे भी धीरे-धीरे बड़े होने के साथ समझने लगते हैं व इस तनाव से मुक्त होने के लिए घर की चारदीवारी से अपना पीछा छुड़ाने की भी ताक में रहते हैं और यह स्थिति परिवार के लिए सर्वाधिक परेशानी वाली होती है। ऐसे नाजुक समय में यह कहकर हाथ नहीं झटक सकते कि क्या करें, जो होना था, सो हो गया।
हालांकि, बच्चों को समझाना इतना आसान नहीं है फिर भी आप स्वयं बच्चे के साथ सहानुभूति जताने की कोशिश करें और भय की जगह स्नेह का वातावरण बनायें। कुछ समय के लिए उसके साथ बच्चों की-सी भूमिका निभाएं। उन्हें मार पीट का आदी बनाकर जीवन के हाशिए पर मत धकेलिये।
यदि हम उन्हें मजबूत होने से पूर्व ही तोड़कर कुंठा, भय, तनाव आदि के माहौल में डाल देंगे तो बाल मन का क्या हश्र होगा, यह आप सभी जानते हैं। हम बच्चों के सही मायने में हितैषी और एक जिम्मेदार माता-पिता कहलाने के अधिकारी बनें न कि डर, भय व आतंक के पर्याय बन कर रह जायें।  (उर्वशी)

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