भारत की कृषि के विकास का एक दशक
जब माननीय प्रधानमंत्री ने वर्ष 2014 में पदभार संभाला, तब कृषि और किसान कल्याण को भारत के विकास एजेंडे के केंद्र में रखा गया। वर्ष 2015 से यह प्रतिबद्धता उत्पादन और कृषि आय में सुधार से आगे बढ़कर कृषि क्षेत्र को अधिक उत्पादक, सुदृढ़, प्रौद्योगिकी-आधारित और टिकाऊ बनाने के व्यापक परिवर्तन में परिलक्षित हुई है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया है कि विकसित भारत के लिए भारतीय कृषि का भी विकास होना चाहिए। भारत केवल अपनी खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित न रहे, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरे। लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ और अटल बिहारी वाजपेयी के ‘जय विज्ञान’ के आह्वान को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने देश को ‘जय अनुसंधान’ का मंत्र दिया। ये शब्द केवल नीतिगत दिशा का वक्तव्य नहीं थे, बल्कि एक व्यावहारिक दृष्टि के परिचायक थे, जिसकी दूरदर्शिता और विवेक की पुष्टि एक दशक बाद सामने आए साक्ष्यों से स्पष्ट रूप से हुई।
खाद्य सुरक्षा से नए मॉडलों तक : यह विजन भारतीय कृषि को देखने के हमारे दृष्टिकोण में निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान की। आज हमारी ज़िम्मेदारी पोषण सुरक्षा, किसानों की समृद्धि, संसाधन सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की मजबूत नींव तैयार करना है। हरित क्रांति को विज्ञान, उन्नत बीजों, सिंचाई, बुनियादी ढांचे, संस्थागत ऋण, कृषि विस्तार सेवाओं और नीतिगत सहायता से गति मिली। कृषि को अतीत की प्राथमिकताओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। किसानों की आकांक्षाएं बदल गई हैं, नागरिकों के उपभोग के तौर-तरीके बदल गए हैं।
वर्ष 1995-96 और 2014-15 को संरचनात्मक बदलाव के महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया है, क्योंकि ये भारतीय कृषि के विकास के अलग-अलग चरणों को दर्शाते हैं। पहला चरण आर्थिक उदारीकरण के क्रमिक प्रभाव, बाज़ारों के साथ बढ़ते एकीकरण, बदलते उपभोग पैटर्न और अनाज उत्पादकता वृद्धि की धीमी गति को दर्शाता है। दूसरा चरण सिंचाई के विस्तार, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बाजार सुधारों तथा स्थिरता और जलवायु अनुकूलन पर बढ़ते ध्यान से प्रेरित अधिक विविधीकृत, प्रौद्योगिकी-सक्षम और सुदृढ़ कृषि प्रणाली के उभार का संकेत देता है। हमारी कृषि को इस नए भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप ढलना होगा। किसानों को उन मूल्य शृंखलाओं से जोड़ना आवश्यक है, जहां वास्तविक आर्थिक अवसर तेजी से ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात में केंद्रित हो रहे हैं।
किसान-केंद्रित विकास की व्यवस्था : भारत सरकार ने इस बदलाव के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा दे रही है। पीएम-कुसुम कृषि को नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ रही है। ई-नाम कृषि बाजारों को डिजिटल रूप से जोड़ रहा है, जबकि कृषि अवसंरचना कोष, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना और पीएमएफएमई फसल कटाई के बाद की अवसंरचना और प्रसंस्करण को मज़बूत कर रहे हैं। अब इन पहलों को बीज से मिट्टी तक, खेत से बाजार तक और प्रयोगशाला से आजीविका तक एकीकृत किसान-केंद्रित मूल्य शृंखला में समाहित करना होगा। इस परिवर्तन में प्रौद्योगिकी की भूमिका केंद्रीय होगी। वर्ष 2014 से 2025 के बीच फसलों की 3,236 किस्में जारी की गईं जबकि 2003 से 2014 के दौरान यह संख्या 1,540 थी। अगली कृषि क्रांति उत्कृष्टता, लचीलेपन और ज्ञान की क्रांति होनी चाहिए।
प्रयोगशाला से अंतिम मील तक : अनुसंधान और कृषि विस्तार की भूमिका इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो गई है। कृषि अनुसंधान में निवेश किया गया प्रत्येक रुपया पर्याप्त आर्थिक लाभ उत्पन्न करता है, जबकि कृषि विस्तार वैज्ञानिक ज्ञान को खेतों में व्यावहारिक सुधारों में बदलता है। हमें अपनी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों, स्टार्टअप, निजी नवप्रवर्तकों और किसानों के बीच संबंध सुदृढ़ करने होंगे। इसके साथ ही हमें संसाधनों से जुड़ी चुनौती का भी सामना करना होगा। भारत जल, उर्वरक, ऊर्जा और भूमि के उपयोग को लगातार बढ़ाकर कृषि उत्पादन का विस्तार नहीं कर सकता। भू-जल का क्षरण, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट, जलवायु में अस्थिरता और चरम मौसमी घटनाएं एक नए उत्पादन प्रतिमान की मांग करती हैं।
हमारी नीतियों को पानी, पोषक तत्वों और ऊर्जा की प्रत्येक इकाई के कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। अनुसंधान में जलवायु-अनुकूल किस्मों, पानी और पोषक तत्वों का कुशल उपयोग करने वाली फसलों, मृदा जीवविज्ञान में सुधार, एकीकृत कीट प्रबंधन, संरक्षण कृषि और सटीक कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हमारा लक्ष्य भारतीय कृषि उत्पादों को ऐसी गुणवत्ता, अनुरेखणीयता, सुरक्षा और ब्रांड पहचान प्रदान करना होना चाहिए, जिन्हें विश्व स्तर पर मान्यता मिले। किसानों को केवल घरेलू उपभोक्ताओं से ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मूल्य शृंखलाओं से भी जोड़ना होगा। इससे रोज़गार सृजित होंगे, ग्रामीण उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा।
हरित क्रांति ने भारत के खाद्य भविष्य को सुरक्षित किया। कृषि के अगले परिवर्तन को भारत की समृद्धि, पोषण, प्राकृतिक संसाधनों और वैश्विक नेतृत्व को सुरक्षित करना होगा। माननीय प्रधानमंत्री ने देश को स्पष्ट दिशा दी है कि भारतीय कृषि विकसित भारत का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बने। विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ते हुए किसान केवल विकास का लाभार्थी न रहे, बल्कि भारत के विकसित भविष्य का निर्माता भी बने। भारत को अब कृषि में इसी परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना है और 2047 के भारत की नींव इसी पर टिकेगी।
(लेखक भारत सरकार में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री हैं। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

