एक लाचार संगठन बन गया है संयुक्त राष्ट्र

आज स्थापना दिवस पर विशेष

जब दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध छिड़ता है, निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं, अस्पताल मलबे में बदलते हैं और बच्चे भूख से बिलखते हैं तो सारी दुनिया के पीड़ित देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ की याद आती है और संयुक्त राष्ट्र की ओर से चिंता जताई जाती है, युद्धविराम की अपील की जाती है और मानवीय संकट पर दुख व्यक्त किया जाता है। लेकिन पिछले लंबे समय से देखने में आ रहा है कि दुनिया के अधिकांश देशों की सदस्यता से बनने वाला यह संगठन अब लाचार दिखाई दे रहा है। अब सवाल उठता है कि यदि दुनिया की सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय संगठन युद्ध रोकने में निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकता, तो आज उसकी क्या ज़रूरत रह गई है? उसकी भूमिका देखकर भी प्रश्न उठता है कि क्या वह शांति का प्रहरी है या महाशक्तियों की मनमानी का मूक दर्शन।
दो विश्व युद्धों की तबाही ने दुनिया को समझाया था कि राष्ट्रों के अहंकार की कीमत आम नागरिक चुकाते हैं। राष्ट्र संघ की विफलता और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय इसके उद्देश्य थे—वैश्विक शांति बनाए रखना, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और राष्ट्रों के बीच सहयोग बढ़ाना। आज 193 सदस्य देशों वाला यह संगठन महासभा, सुरक्षा परिषद, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय और सचिवालय सहित विभिन्न अंगों के माध्यम से काम करता है। लेकिन आठ दशक बाद भी युद्ध, तबाही, विस्थापन और मानवीय त्रासदियां जिस तरह और जिस निरंतरता के साथ जारी हैं, उससे इस दुनिया के सबसे बड़े संगठन की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के सबसे अधिक प्रभावशाली अंग सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों—अमरीका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को इसके गठन के समय से ही वीटो अधिकार मिला हुआ है। शेष दस सदस्य अस्थायी रूप से केवल 2 वर्ष की अवधि के लिए चुने जाते हैं। इस व्यवस्था में युद्ध या किसी भी विवादास्पद मुद्दे को यदि संयुक्त राष्ट्र सभा में पेश किया जाता है, तब विचार विनिमय के बाद भी निर्णय लेने के समय किसी एक भी स्थायी सदस्य का विरोध भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक कर गिरा सकता है। परिणामत: अंतर्राष्ट्रीय बहुमत कई बार महाशक्तियों के हितों के सामने बेबस दिखाई देता है।
1945 की शक्ति-संरचना आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं करती। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राज़ील जैसे देशों की स्थायी सदस्यता की मांग तथा अफ्रीकी देशों के अधिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न लंबे समय से लंबित है। सुरक्षा परिषद का विस्तार और वीटो के इस्तेमाल पर जवाबदेही अब अनिवार्य है। नरसंहार और बड़े पैमाने पर नागरिक हत्याओं जैसे मामलों में वीटो के दुरुपयोग पर अंकुश लगना ज़रूरी है।
वर्तमान में चल रहे पश्चिम एशिया के संघर्ष ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की सीमाओं को उजागर कर दिया है। इज़राइल-हमास युद्ध, गाज़ा में विनाश, पश्चिमी तट पर हिंसा और बड़े पैमाने पर विस्थापन ने अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुनौती दी है। जिस तरह अमरीका और इज़राइल मिलकर ईरान को लेकर मनमानी कर रहे हैं, वह भी संयुक्त राष्ट्र को हाशिये पर रखा रेखांकित करता है। रूस और यूक्रेन के युद्ध का कोई हल ढूंढने में संयुक्त राष्ट्र विफल रहा है। चीन ने भारत के एक बड़े हिस्से पर न केवल कब्ज़ा किया हुआ है, अपितु वह इसके अन्य हिस्सों पर भी दावा करता रहता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र इस पर कोई कदम आज तक नहीं उठा सका है। कारण स्पष्ट है कि इन तीनों ही मामलों में अमरीका, चीन और रूस जो संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य हैं, वे अपने विशेषाधिकार वीटो का इस्तेमाल अपने या अपने समर्थक देश के स्वार्थ पूर्ति के लिए करते आए हैं और अभी भी कर रहे हैं। 
संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों ने राहत पहुंचाने, युद्धविराम की अपील करने तथा नागरिकों की दुर्दशा दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है, लेकिन संगठन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। वह संकट को पहचानता है, लेकिन उसे समाप्त कराने के लिए पर्याप्त राजनीतिक दबाव नहीं बना पाता। इज़राइली नागरिकों पर हमले और बंधक बनाना अस्वीकार्य हैं। उसी तरह फिलिस्तीनी नागरिकों को सामूहिक दंड देना, अंधाधुंध हमलों का शिकार बनाना और जबरन विस्थापन की स्थिति पैदा करना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन मित्र और विरोधी राष्ट्रों के लिए अलग-अलग नहीं होना चाहिए।आज संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रतिनिधिक, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है। (एजेंसी)

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