दो बूंदों से लिखी मानवता की जीत

आज विश्व पोलियो दिवस पर विशेष

कभी पोलियो का नाम सुनते ही माता-पिता के दिल में डर पैदा हो जाता था। हंसता-खेलता बच्चा अचानक चलने की क्षमता खो बैठे या किसी के हाथ-पैरों में सदा के लिए कमज़ोरी आ जाने के कारण ज़िंदगी खतरे में पड़ जाए, पोलियो की तस्वीर कुछ ऐसी ही दर्दनाक और भयावह थी। लेकिन विज्ञान की ताकत, स्वास्थ्य कर्मचारियों की मेहनत और लोगों के साझा संकल्प ने इस बीमारी को दुनिया के बड़े हिस्से में लगभग इतिहास का हिस्सा बना दिया है। हर वर्ष 24 अक्तूबर को मनाया जाने वाला ‘विश्व पोलियो दिवस’ इसी लंबी लड़ाई, महान वैज्ञानिक उपलब्धि और मानवता के साझा संकल्प को याद करने का दिन है। यह तारीख विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 24 अक्तूबर, 1914 को न्यूयार्क में जन्मे अमरीकी वैज्ञानिक डॉ. जोनस साल्क ने पोलियो के विरुद्ध पहली सफल और प्रभावशाली वैक्सीन विकसित की थी। पोलियो, जिसे पोलियोमाइलाइटिस भी कहा जाता है, वायरस के कारण होने वाली संक्रामक बीमारी है। यह मुख्य रूप से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। 
1952 में अमरीका में पोलियो का एक भयानक प्रकोप सामने आया। इसी दौर ने वैज्ञानिकों पर एक प्रभावी टीका तैयार करने का दबाव बनाया था। जोनस साल्क ने चिकित्सा शिक्षा हासिल करने के बाद वायरसों और रोग प्रतिरोधक प्रणाली पर शोध किया। उनका विश्वास था कि यदि वायरस को बेअसर करके भी शरीर में रोग प्रतिरोधक प्रतिक्तिया पैदा की जा सके तो पोलियो के विरुद्ध एक प्रभावी टीका बनाया जा सकता है। साल्क और उनकी टीम ने निष्क्रिय किए गए पोलियो वायरस का इस्तेमाल करके वैक्सीन तैयार की। उनकी यह सोच उन कुछ अन्य वैज्ञानिकों के दृष्टिकोण से अलग थी, जो कमज़ोर लेकिन जीवित वायरस के इस्तेमाल की दिशा में आगे बढ़ रहे थे।
वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभावशीलता जांचने के लिए 1954 में अमरीका में लगभग 18 लाख बच्चों पर परीक्षण किया गया। 12 अप्रैल, 1955 को परीक्षणों के परिणाम सार्वजनिक किए गए और साल्क की वैक्सीन को पोलियो के विरुद्ध प्रभावी पाया गया। साल्क की सोच उनकी खोज से भी बड़ी थी। वैक्सीन को निजी पेटेंट के माध्यम से बड़ी दौलत कमाने का साधन बनाने के बजाय उन्होंने इसे मानवता की भलाई से जोड़ा। जब उनसे वैक्सीन के पेटेंट के बारे में पूछा गया तो उनका मशहूर जवाब था, ‘क्या आप सूरज को पेटेंट कर सकते हैं?’ यह कथन आज भी वैज्ञानिक सेवा और मानवतावादी सोच की मिसाल के रूप में याद किया जाता है।
पोलियो के विरुद्ध लड़ाई को आगे बढ़ाने में एक और महान वैज्ञानिक डॉ. अल्बर्ट सबिन का योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने मौखिक पोलियो वैक्सीन विकसित की, जिसे मुंह के माध्यम से बूंदों के रूप में दिया जा सकता था। मौखिक वैक्सीन की आसान विधि ने बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियानों को आसान बनाया। यहीं से पोलियो के विरुद्ध वह तस्वीर बनी, जिसमें स्वास्थ्य कर्मचारी बच्चे के मुंह में वैक्सीन की कुछ बूंदें डालते थे। 1988 में ‘ग्लोबल पोलियो इरेडिकेशन इनिशिएटिव’ की शुरुआत हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रोटरी इंटरनेशनल और अन्य सहयोगी संस्थाओं ने दुनिया को पोलियो से मुक्त करने के लिए व्यापक अभियान चलाया।
पोलियो उन्मूलन की वैश्विक कहानी में भारत का अध्याय सबसे प्रेरणादायक है। एक समय था जब भारत पोलियो के सबसे अधिक मामलों वाले देशों में शामिल था। 1995 में भारत ने ‘पल्स पोलियो इम्यूनाइज़ेशन कार्यक्रम’ शुरू किया। इसके बाद ‘दो बूंद जिंदगी की’ का नारा देश के हर कोने में गूंजने लगा। पोलियो बूथों पर लंबी कतारें लगतीं, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मेलों में विशेष टीकाकरण केंद्र बनाए जाते और स्वास्थ्य कर्मचारी घर-घर पहुंचते। यह अभियान धीरे-धीरे जन आंदोलन बन गया। आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, नर्सों, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों और हजारों स्वयंसेवकों ने इस अभियान को ज़मीनी स्तर पर सफल बनाया। 
भारत में जंगली पोलियो वायरस का अंतिम दर्ज मामला 13 जनवरी, 2011 को पश्चिम बंगाल में सामने आया था। तीन वर्ष तक कोई नया मामला सामने न आने के बाद 27 मार्च, 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र को पोलियो मुक्त प्रमाणित किया, जिसमें भारत भी शामिल था। यह उपलब्धि भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। 
भारत भले ही पोलियो मुक्त है, लेकिन दुनिया अभी पूरी तरह पोलियो मुक्त नहीं हुई। जब तक कहीं भी जंगली पोलियो वायरस मौजूद है, इसके दोबारा फैलने का खतरा बना रहता है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जंगली पोलियो वायरस का संचरण अभी भी वैश्विक उन्मूलन अभियान के लिए चुनौती बना हुआ है। इसलिए पोलियो टीकाकरण को लेकर लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। पोलियो मुक्त देशों में भी निगरानी, टीकाकरण और स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी जारी रखना ज़रूरी है। पोलियो के मामलों में आई ऐतिहासिक कमी हमें राहत देती है, लेकिन अंतिम जीत के लिए सतर्कता अभी भी ज़रूरी है। लक्ष्य स्पष्ट है, धरती के हर बच्चे को पोलियो से पूरी तरह सुरक्षित करना।
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