बरकरार है पराली जलाने की समस्या
पंजाब को अनेक समस्याएं दरपेश हैं। इनमें से कुछ समस्याएं तो ऐसी हैं, जिन पर दशकों से चर्चा होती रही है। उनके संबंध में बहुत कुछ लिखा और कहा भी जाता रहा है। उन्हें हल करने के लिए समय की सरकारों द्वारा कई तरह के कदम भी उठाए जाते हैं, परन्तु सफलता नहीं मिलती। परिस्थितियां पहले की भांति ही बनी रहती हैं। ऐसी ही समस्याओं में शामिल है, वर्ष में दो बार खेतों में धान की पराली और गेहूं की नाड़ जलाने का प्रचलन। पर्यावरण से जुड़ी इस समस्या को हल करने के लिए पिछले कई दशकों से सरकारें किसानों को प्रेरित करती आ रही हैं कि खेतों में पराली और नाड़ को आग लगाने से धरती की उपजाऊ शक्ति नष्ट होती है और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। इस संबंध में किसानों की तकनीकी रूप से सहायता करने के लिए उन्हें पराली की खेतों में गांठे बनाने और पराली वाले खेतों में हैपी सीडर या सुपर सीडरों द्वारा सीधी बुआई करने के लिए सब्सिडी और अनेक बार मशीनें भी दी जाती रही हैं। इस प्रचलन को रोकने के लिए सरकारों द्वारा सख्ती करते हुए किसानों पर मामले भी दर्ज किए जाते रहे हैं। उनके ज़मीनी रिकार्ड में ‘रैड एंट्री’ भी की जाती है, परन्तु इसके बावजूद पंजाब में अभी भी व्यापक स्तर पर नाड़ और पराली को खेतों में ही आग लगा कर जलाया जा रहा है।
इस बार भी उत्तर भारत में अब तक जो पराली को जलाने के मामले दर्ज किए गए हैं, उनमें पंजाब पहले स्थान पर है। यहां 15 सितम्बर, 2026 से 21 अक्तूबर, 2026 तक पराली को आग लगाने की कुल 474 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जो पिछले वर्ष की 415 घटनाओं से लगभग 14 प्रतिशत अधिक हैं, हालांकि 2024 की 1510 घटनाओं के मुकाबले में यह लगभग 69 प्रतिशत कम हैं। इस बार बीते बुधवार को एक दिन में पराली को आग लगाने के 70 मामले दर्ज किए गए, जिनमें तरनतारन के सबसे अधिक 31 मामले हैं। तरनतारन ज़िले में अब तक 229, अमृतसर में 128, गुरदासपुर में 30 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि संगरूर में पिछले वर्ष में 14 के मुकाबले इस बार 3 मामले ही दर्ज किए गए हैं।
दूसरी तरफ प्रदेश के कृषि और किसान भलाई मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां ने कहा है कि मौजूदा सीज़न के दौरान फसलों के अवशेषों का प्रबन्धन करने के लिए किसानों ने 21,019 मशीनें खरीदी हैं। ऐसी मशीनों के लिए किसानों को 50 प्रतिशत और पंचायतों को 80 प्रतिशतक तक सबसिडी दी जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि किसानों ने धान वाले खेतों में सीधी बुआई करने के लिए 14,274 सुपर सीडर के यूनिट भी खरीदे हैं और खेतों में ही गेहूं और नाड़ को मिलाने के लिए किसानों द्वारा मशीनें खरीदी जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार द्वारा तकनीकी ढंग से फसलों के अवशेषों का निपटारा करने के लिए किसानों को उत्साहित किया जा रहा है, उन्हें उम्मीद है कि इस बार समूचे रूप में पराली को आग लगाने के मामले पहले से ज़रूर कम होंगे।
हम इस संबंध में पंजाब सरकार और विशेष रूप से कृषि और किसान भलाई मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां से अपील करना चाहते हैं कि वह ज़िला कृषि अधिकारियों और अन्य सरकारी विभाग को किसानों को पराली को आग लगाने से रोकने के लिए प्रेरित करने हेतु सक्रियता से इस ओर लगाएं और इस संबंध में किसानों की तकनीकी और वित्तीय रूप से जिस भी ढंग से जितनी भी सहायता की जा सकती है, वह भी की जानी चाहिए। इसके साथ ही हम प्रदेश के किसान संगठनों से भी यह अपील करना चाहते हैं कि उनकी ओर से किसानों को प्रेरित करने के निचले स्तर तक के यत्न किए जाने चाहिएं। किसान संगठनों को स्वयं यह बात समझनी चाहिए कि खेतों में पराली और नाड़ को आग लगाने से ज़मीन की कम हो रही उपजाऊ शक्ति के कारण स्वयं किसानों का भी नुकसान होता है और पर्यावरण में भी धुआं भर जाने से जन-साधारण पर विशेष रूप से श्वास रोगियों के लिए भी बड़ी समस्याएं पैदा होती हैं। अनेक बार जब खेतों में आग लगाई जाती है तो तेज़ हवाएं चलने पर सड़कों से गुज़रने वाले लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और कई बार वाहन भी धुएं और आग का शिकार हो जाते हैं। इस तरह की दर्जनों ही घटनाएं अब तक रिकार्ड की जा चुकी हैं। पराली और नाड़ को आग लगाने से रोकने की ज़िम्मेदारी सिर्फ सरकारों की ही नहीं है, अपितु किसान संगठनों और समूचे समाज को भी इस संबंध में अपने-अपने ढंग से योगदान डालना चाहिए। सरकार को किसानों की तकनीकी और वित्तीय रूप से सहायता करनी चाहिए और दूसरी तरफ किसान व अन्य सामाजिक संगठनों द्वारा किसानों को इस पक्ष से जागरूक और प्रेरित भी ज़रूर करना चाहिए। ऐसे यत्नों से ही इस समस्या को हल किया जा सकता है, परन्तु इस संबंध में अभी तक किसान संगठनों ने उतनी प्रभावशाली भूमिका नहीं निभाई, जितनी उन्हें निभानी चाहिए थी। कई किसान संगठन तो पराली और नाड़ को खेतों में आग लगाने के रुझान को उत्साहित करते भी देखे जाते रहे हैं। इस संबंध में किसान संगठनों और विशेष रूप से उनके नेताओं को अपनी सोच में बड़ा बदलाव लाने की ज़रूरत है।
पंजाब में पर्यावरण प्रदूषण है और विशेष रूप से वायु प्रदूषण कम से कम हो, इसके लिए जहां कृषि से पैदा हो रहे प्रदूषण को कम करने की ज़रूरत है, वहीं उद्योगों से पैदा होते वायु प्रदूषण को भी प्रभावशाली ढंग से रोका जाना चाहिए। साफ-स्वच्छ पर्यावरण में सांस लेना पंजाब के लोगों का मूलभूत अधिकार है। प्रत्येक संबंधित पक्ष को इस सच्चाई को समझना चाहिए।

