बार-बार भारत के चक्कर क्यों लगा रहे मार्को रूबियो ?
पांच महीने से भी कम समय में अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की दो बार भारत यात्रा हो चुकी है। यूं तो अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में दो देशों के बीच संबंधों का आंकलन मुलाकातों की संख्या से नहीं किया जाता बल्कि इस बात से होता है कि कठिन परिस्थितियों में दो साझेदार देश एक दूसरे के हितों का कितना सम्मान करते हैं। मगर अनौपचारिक रूप से इस सम्मान का एक कयास मुलाकातों के ज़रिये भी होता है। इसलिए जब 20 अक्तूबर, 2026 को मार्को रूबियो फिर से भारत की यात्रा पर आ गये, तो दुनियाभर के कूटनीतिक हलके में इसे न केवल नोटिस लिया गया बल्कि कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरु हो गई कि आखिर मार्को रूबियो बार-बार भारत की यात्रा पर क्यों जा रहे हैं? ..और इसके कई अनुमानित अर्थ निकाले गये। मसलन चीन को लेकर रणनीति, भारत के साथ व्यापार के रिश्तों को बढ़ाना, रूस से भारत के संबंध और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन जैसे कई तरह के कयास लगाये गये। लेकिन सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि रूबियो जितनी बार भी भारत की यात्रा पर आये हैं, हर बार यात्रा का उद्देश्य एक जैसा नहीं रहा, होता भी नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि रूबियो अमरीका के विदेश मंत्री हैं। इसलिए अमरीका की व्यापक विदेश नीति के संदर्भ में ही इसे देखना चाहिए, न कि सिर्फ भारत-अमरीका की दोस्ती के चश्मे से।
20 अक्तूबर, 2026 को देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में जब भारतीय विदेश मंत्री एस.जयशंकर और अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की मुलाकात हुई, तो इसका मतलब साफ था कि अब भारत और अमरीका के बीच होने वाला व्यापार समझौता अंतिम चरणों में है। मार्को रूबियो ने इस संबंध में खुद ही कहा कि अब बस दोनों देशों के बीच होने वाले समझौते के कुछ ही मसले सुलझाने बाकी हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग पर विस्तार से चर्चे हुए। इसके बाद रूबियो जामनगर स्थित एक रिफाइनरी के दौरे पर गये। दरअसल रूबियो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भारत की यह रफाइनरी वेनेजुएला में ज्यादा तेल बनाने का समझौता करे।
मालूम हो कि इसी साल जनवरी में ट्रम्प प्रशासन ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के बाद वेनेजुएला के तेल उत्पादन को बढ़ाने का निश्चिय किया है। इस तरह रूबियो का हाल में जल्दी-जल्दी दोबारा भारत आना महज एक अनौपचारिक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं था बल्कि यह यात्रा ठोस आर्थिक हितों के कारण की गई है। भारत और अमरीका के बीच व्यापार समझौते की राह लंबे समय से आसान नहीं साबित हो रही। दरअसल अमरीका के शुल्क नीतियां और भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर पैदा हुए तनाव ने व्यापार संबंधी बातचीत को बार-बार प्रभावित किया है। ट्रम्प प्रशासन ने भारत के निर्यात और रूस से ऊर्जा खरीद पर दबाव बनाने के लिए शुल्क तथा प्रतिबंधों के विकल्पों का इस्तेमाल किया है। इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि अमरीका रणनीतिक साझेदारी की बात तो करता है, लेकिन आर्थिक हितों के मामले में कठोर सौदेबाजी से पीछे नहीं रहता। भारत के लिए भी अमरीका बाजार का महत्व असंदिग्ध है। भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात, निवेश, तकनीकी सहयोग और रोजगार के अवसरों पर व्यापार समझौते का असर पड़ सकता है। लेकिन किसी समझौते की सफलता केवल इस बात से नहीं आंकी जानी चाहिए कि उस पर कितनी जल्दी हस्ताक्षर हुए। असली कसौटी यह है कि बाज़ार तक पहुंच, शुल्क, कृषि, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और निवेश के नियम दोनों पक्षों के लिए कितने संतुलित हैं।
भारत-अमरीका संबंधों की सबसे कठिन परीक्षा रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर हो रही है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ायी है, क्योंकि कीमत, उपलब्धता और घरेलू ऊर्जा ज़रूरतों के लिहाज से यह हमारे लिए आर्थिक रूप से उपयोगी है। गौरतलब है कि भारत अपनी तेल ज़रूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक आयात करता है।
भारत में बार-बार आ रहे अमरीकी विदेश मंत्री का एक कारण चीन और बदलती विश्व व्यवस्था है। क्योंकि व्यापार और ऊर्जा के विवादों के बावजूद भारत और अमरीका के रिश्तों का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक आधार हिन्द-प्रशांत क्षेत्र ही है। चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति दोनों देशों के लिए अलग-अलग कारणों से चुनौती बन री है। अमरीका भारत को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में महत्वपूर्ण साझेदार मानता है। जबकि भारत समुद्री सुरक्षा, रक्षा, तकनीक, खुफिया सहयोग और आधुनिक सैन्य क्षमताओं के विकास में अमरीका से लाभ उठाना चाहता है, क्योंकि क्वाड—भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह है। इसलिए मार्को रूबियो की बार-बार यात्रा से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि भारत-अमेरिका संबंधों का कोई स्वर्णिम अध्याय शुरु हो गया है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



