नासिक में स्थित पहाड़ पर बना हरिहर किला
मैं नासिक में अपने एक दोस्त के घर पर था कि यू-ट्यूब स्क्रॉल करते हुए मैंने हरिहर फोर्ट ट्रेक की रॉक-कट सीढ़ियां देखीं। एकदम से मन में सवाल उठे- इन सीढ़ियों पर चढ़ना कितना कठिन होगा? क्या सीढ़ियों पर चढ़ना वास्तव में बहुत डरावना है? मुझे इन प्रश्नों के उत्तर चाहिए थे... दोस्त ने कहा कि हरिहर किला भारत का सबसे कठिन ट्रेक है। इस कथन ने मेरी जिज्ञासा में इज़ाफा किया। हरिहर किले को हर्षगढ़ किला भी कहते हैं और यह त्रियंब्केश्वर श्रृंखला में समुद्र की सतह से लगभग 3676 फीट की ऊंचाई पर है। इसकी विशिष्ट रॉक-कट सीढ़ियां हर साल हज़ारों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। मुझे इस तथ्य ने अधिक आकर्षित किया कि जिस समय सिर्फ बुनियादी औज़ार व साधन ही उपलब्ध थे, तब इस किले को और उसकी सीढ़ियों को पहाड़ काटकर बनाना कितना कठिन रहा होगा।
बहरहाल, हरिहर किले तक पहुंचने का तरीका पूर्णत: इस बात पर निर्भर करता है कि आप ट्रेकिंग के लिए किस मार्ग का चयन कर रहे हैं। अगर आप निर्गुदपदा की तरफ से इस पर चढ़ना चाहते हैं, तो इगतपुरी प्रमुख टाउन है और अगर आप मेरी तरह हर्षवादी तरफ से चढ़ना चाहते हैं, तो नासिक प्रमुख शहर है। दोनों इगतपुरी व नासिक महाराष्ट्र के अन्य शहरों से सड़क व रेल से बहुत अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं। इगतपुरी से निर्गुदपदा तक पहुंचने के लिए त्रियंब्केश्वर के लिए बस लें व निर्गुदपदा उतर जायें। आप अन्य बस/साझा टम भी ले सकते हैं गोटी के लिए और अन्य ट्रांसपोर्ट भी ले सकते हैं निर्गुदपदा के लिए। बहरहाल, अगर नासिक से हर्षवादी जाना है, मेरी तरह, तो नासिक से त्रियंब्केश्वर के लिए बस लें, जो सुबह 5 बजे से चलना शुरू हो जाती हैं। भीड़ से बचने के लिए सवेरे जाना ही अच्छा रहता है। त्रियंब्केश्वर से हर्षवादी लगभग 13 किमी है और सीधा पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपलब्ध नहीं है। कचरोली गांव से होते हुए ट्रांसपोर्ट उपलब्ध है, लेकिन बहुत कमी के साथ। मैंने त्रियंब्केश्वर से 400 रुपये में ऑटो हायर किया, जिसने मुझे गांव हर्षवादी बेस पर उतार दिया। वापसी के लिए भी मैंने उसे ऑटो चालक को कॉल किया वर्ना मुझ हिचहाईकिंग पर निर्भर करना पड़ता।
निर्गुदपदा की तुलना में हर्षवादी आसान रास्ता है और बेस गांव से सीढ़ियों तक पहुंचने में 1 से 1.5 घंटा लगता है। ट्रेल की मार्किंग अच्छी है और खोने का कोई डर नहीं है। साथ ही पूरे ट्रेक पर हरिहर दिखायी देता रहता है और आप उसी दिशा में बढ़ते रह सकते हैं। निर्गुदपदा से रूट लम्बा है और सीढ़ियों तक पहुंचने में लगभग 2 घंटे लगते हैं। साथ ही यह ट्रेल थोड़ी उलझन भरी है और अगर आप नियमित ट्रेकर नहीं हैं, तो खोने की आशंका है। सीढ़ियों से कुछ मीटर पहले दोनों रूट आपस में मिल जाते हैं और फिर एक ही रूट पर आगे बढ़ना पड़ता है। सीढ़ियों के दोनों तरफ ताकें बनी हुई हैं, जिससे चढ़ते में सहारा मिल जाता है। चढ़ने की तुलना में उतरना अधिक कठिन है।
मेरे नज़दीक यह सम्पूर्ण ट्रेक मध्यम स्तर का कठिन ट्रेक है। मध्यम मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि रॉक-कट सीढ़ियों को चढ़ने व उतरने में ही खतरा व कठिनाई है, वर्ना जिस किस्म की फिटनेस चाहिए उसके लिए यह आसान ट्रेक है। हर साल मानसून के शुरू होते ही हज़ारों ट्रेकर्स इस शानदार किले की ओर रुख किया करते थे। मानसून में सीढ़ियां चढ़ना बहुत अधिक खतरनाक हो जाता है, खासकर अत्यधिक भीड़ की वजह से। मुझे यह जानकारी मिली है कि मानसून में इस किले को पर्यटकों के लिए बंद कर दिया जाता है। चूंकि इस साल मानसून देर तक रहा, इसलिए मध्य अक्तूबर के बाद ही हरिहर किले को जनता के लिए खोला गया था। नासिक से सुबह 5 बजे की बस में सवार होकर मैं लगभग सुबह 6 बजे त्रियंब्केश्वर पहुंचा था। त्रियंब्केश्वर शिव मंदिर (12 ज्योतिर्लिंगों में से एक) के दर्शन करने के बाद ही मैंने हर्षवादी (हरिहर फोर्ट ट्रेक का बेस गांव) के लिए ट्रांसपोर्ट लिया था। ऑटो से सफर करते हुए बाहर के नज़ारे खूबसूरत व मंत्रमुग्ध करने वाले थे, लेकिन सड़क की हालात बहुत खराब थी, जिससे झटके बहुत लग रहे थे। हवा में ठंडक थी और किला बादलों के साये में था। आसपास के क्षेत्रों का नज़ारा मनमोहक था। मुझे सीढ़ियों तक पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए प्रारम्भिक ट्रेल एक छोटी सी झील से शुरू की। कुछ तीर के निशान बने हुए हैं ताकि आप सही रास्ते पर रहें। ट्रेल जंगल व खुले पठार का मिश्रण है, जो आपको सीढ़ियों तक ले जाती है। ट्रेक रूट से वैतरना रिजर्वायर का नज़ारा दिलकश है। वाव! इस किले को किसी ने कैसे तराशा होगा? सीढ़ियों को देखते ही मैं स्तब्ध रह गया। मैं एक तरफ बैठकर इस विशाल शाहकार को निहारता रहा। कुल 117 सीढ़ियां हैं, जिनके साइड में ताकें हैं, जिनमें अपने हाथ फंसाकर सीढ़ियां चढ़ना आसान हो जाता है। सीढ़ियां चढ़ने के बाद गुफा आती है, जहां से आसपास का नज़ारा हमेशा के लिए दिलोदिमाग में बस जाता है। लेकिन याद रहे कि अगर आप यहां से फिसल गये तो इतिहास बन जायेंगे। इसके बाद कुछ और सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, विशाल समतल भूमि तक पहुंचने के लिए, जो किले का सबसे ऊपरी हिस्सा प्रतीत होता है। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद एक छोटा सा तालाब है, जिसके एकतरफ एक मंदिर है। इसके बाद भी एक छोटे से पहाड़ को चढ़ना पड़ता है हरिहर किले के सबसे ऊंचे बिंदु पर पहुंचने के लिए। लेकिन इस पर चढ़ना न भूलें, क्योंकि आसपास के क्षेत्र का 360 डिग्री नज़ारा देखने को मिलता है। किले से उतरने में डेढ़ घंटे का समय लगा।
अगर आप हरिहर किले को देखना चाहते हैं तो मानसून के बाद अक्तूबर से दिसम्बर के बीच में योजना बनाएं जब हर तरफ हरियाली देखने को मिलती है। जनवरी से मार्च तक का भी समय बुरा नहीं है, आप रात में तारे देखने के लिए टेंट लगा सकते हैं और किले के ऊपर से सूरज को उगता हुआ देख सकते हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





