मूर्तिकार की बुद्धिमत्ता

एक राज्य में बहुत ही सुन्दर तथा आकर्षक मूर्तियां बनाने वाला एक मूर्तिकार रहता था। उसके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की विशेषता यह थी कि उन्हें देखकर ऐसे लगता था कि मूर्ति अभी बोल उठेगी। उसके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की चर्चा देश विदेश में भी होती थी। उसकी बनी मूर्तियों को खरीदने वाले लोग दूर-दूर से आते थे और मूर्तिकार को मूर्ति का मूल्य देने के साथ-साथ उसकी कारीगरी के लिए ईनाम भी देते थे। एक बार राज्य के राजा ने उस मूर्तिकार को अपने दरबार में बुलाकर कहा, श्री मान-मेरे राज महल के लिए एक ऐसी मूर्ति बना कर दो जो कि आज तक आपने पहले कभी ना बनाई हो और ऐसी मूर्ति पहले किसी ने कभी ना देखी हो। यदि तुम्हारे द्वारा बनाई हुई मूर्ति मुझे और रानी को पसन्द आ गई तो तुम्हें सोने की अशर्फियां देने के साथ-साथ तुम्हें राज्य का मूर्तिकार भी घोषित किया जाएगा।
मूर्तिकार ने कहा, महाराज मैं अमनी ओर से ऐसी मूर्ति बनाऊंगा जिसको देखकर आप और राजमहल में आने वाले शाही अतिथि उसे अवश्य पसंद करेंगे। आप मुझे अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। मैं आपको निराश नहीं होने दूंगा। मूर्तिकार ने कुछ महीने लगाकर एक बहुत ही सुन्दर मूर्ति तैयार करके उसे राजा के दरबार में पेश किया। राजा और रानी को मूर्ति बहुत पसन्द आई। राजा ने अपने मंत्रियों और दरबारियों को मूर्ति के संबंध में अपने विचार बताने को कहा। 
कुछ दरबारियों के मन में मूर्तिकार के प्रति राजा की प्रियता तथा मिलने वाले ईनाम से ईर्ष्या उत्पन्न हो गई। उन्होंने मूर्ति में से कई नुक्स निकाल दिएा। मूर्ति कार उन दरबारियों की बातें सुनकर ना तो घबराया और ना ही क्रोधित हुआ। उसने बड़े शान्त स्वभाव से कहा, महाराज आपके दरबारी कला की बारीकियों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यह मूर्ति आपके राज महल में रखी जानी है। 
बड़े-बड़े शाही अतिथि इस मूर्ति को देखेंगे। बहुत अच्छा हुआ कि इन लोगों ने इस मूर्ति के नुक्स बताकर मुझे इसे और सुन्दर बनाने का अवसर प्रदान किया है। मूर्तिकार मूर्ति को उठाकर अपने घर ले गया और कुछ दिन बाद उसने वह मूर्ति राजा के दरबार में पुन: पेश करते हुए राजा को कहा, राजन आपके दरबारियों के आदेश के अनुसार मैंने मूर्ति के सभी नुक्स दूर कर दिए हैं। अब आप सब मूर्ति को ध्यान से देख लें, यदि फिर भी किसी को कोई नुक्स लगता है तो मैं उसे भी दूर कर देता हूं। राजा के बिना कुछ बोले ही सभी दरबारियों ने मूर्ति को बहुत सुन्दर कह दिया। राजा ने मूर्तिकार को कहा श्री मान मुझे तो ऐसे लग रहा है कि अपने मूर्ति में कोई बदलाव किया ही नहीं। 
मूर्तिकार राजा की बात सुनकर बोला, महाराज अपने बिल्कुल ठीक पहचाना मूर्ति में कोई नुक्स था ही नहीं, फिर मैं मूर्ति में बदलाव क्या करता, यदि मैं उस समय दरबारियों के आदेश को नकारता तो इनके आदेश का उल्लंघन होता, ये मेरी बात का बुरा मान जाते, अब अपना आदेश सुनायें। राजा मूर्तिकार की दूर दर्शिता और बुद्धिमत्ता को देखकर बहुत हैरान हुआ। दरबारियों के पास भी चुप रहने के बिना और कोई चारा नहीं था। राजा ने मूर्तिकार को पुरस्कार देते हुए कहा कि आज से तुम मेरे दरबार में बैठोगे। 
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