चांद की गवाही में दाम्पत्य की निष्ठा को दर्शाता है करवा चौथ

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी की नीरव रात्रि में जब आकाश में चंद्रमा अपनी रजत आभा बिखेरता है, तब भारतीय घरों की छतों और आंगनों में एक अनूठा दृश्य आकार लेता है। सोलह श्रृंगार से सजी स्त्रियां हाथों में पूजित करवा, दीप और छलनी लिए चंद्रदेव के दर्शन की प्रतीक्षा करती हैं। दिन भर के निर्जला व्रत की तपस्या, आंखों में प्रिय के दीर्घ जीवन की कामना और हृदय में दाम्पत्य की मंगल कामना— सब कुछ उस एक क्षण में सिमट आता है, जब छलनी से छनकर चांद का प्रतिबिंब जीवनसाथी के चेहरे पर ठहर जाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का दृश्य नहीं, भारतीय भाव-संस्कृति में प्रेम की सबसे आत्मीय अभिव्यक्तियों में से एक है।
लेकिन करवा चौथ का वास्तविक अर्थ क्या केवल चंद्रदर्शन, व्रत और पति की दीर्घायु की कामना तक सीमित है? चांद को अर्घ्य देकर मांगी गई लंबी उम्र की कामना तभी पूर्ण होती है, जब जीवन की हर धूप-छांव में दो दिल एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहते हैं। करवा चौथ दरअसल प्रेम, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने के संकल्प का उत्सव है। शरद ऋतु के इस पर्व की आत्मा में दाम्पत्य प्रेम का ऐसा भाव छिपा है, जो समय की सीमाओं को लांघकर हर युग के दाम्पत्य को एक नई अर्थवत्ता प्रदान करता है। निस्संदेह, वह भाव है-निष्ठा। वह अटूट विश्वास, जो दो अपरिचित व्यक्तियों को जीवन की एक साझा यात्रा पर निकलने का साहस देता है; यह वह आत्मीयता है जो सुख में मुस्कान और दु:ख में संबल बनती है; और वह प्रतिबद्धता है जो परिस्थितियां बदल जाने पर भी रिश्ते की जड़ों को सूखने नहीं देती।
भारतीय परंपरा में चंद्रमा मन की शीतलता, प्रेम की कोमलता और भावनाओं की गहराई का प्रतीक रहा है। करवा चौथ की रात्रि में चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित करना इसी आस्था का हिस्सा है। किन्तु जीवन के आकाश में हर दिन पूर्णिमा नहीं होती। कभी आर्थिक संकट के बादल घिरते हैं, कभी बीमारी घर की दहलीज पर दस्तक देती है, कभी जिम्मेदारियों का बोझ प्रेम की सहज अभिव्यक्ति को दबा देता है और कभी समय की दौड़ में दो लोगों के बीच संवाद का पुल ही कमजोर पड़ने लगता है। ऐसे क्षणों में न तो श्रृंगार काम आता है, न उत्सव की चकाचौंध और न ही तस्वीरों में कैद प्रेम की सुंदर मुद्राएं। काम आता है तो केवल वह विश्वास, जो कहता है— तुम्हारी कठिनाई मेरी कठिनाई है, तुम्हारा दु:ख मेरा दु:ख है और तुम्हारी लड़ाई में तुम अकेले नहीं हो।
दाम्पत्य की निष्ठा का वास्तविक अर्थ यही है। यह केवल किसी एक दिन अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र की प्रार्थना करना नहीं बल्कि उसके जीवन को बेहतर, सुरक्षित और सम्मानपूर्ण बनाने में अपनी भूमिका निभाना है। प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण शब्दों में नहीं, उन छोटे-छोटे कर्मों में मिलता है, जिन्हें करने के लिए किसी उत्सव, प्रशंसा या प्रतिदान की अपेक्षा नहीं होती। विवाह के आरंभिक दिनों में प्रेम का आकर्षण सहज होता है। एक-दूसरे की प्रतीक्षा, छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराना, बिना किसी विशेष कारण के उपहार देना और साथ बिताए गए क्षणों को स्मृतियों में संजोना, इन सबमें रिश्ते की नवीनता बोलती है। लेकिन जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है, प्रेम को अनेक नई जिम्मेदारियों से गुजरना पड़ता है। बच्चों की परवरिश, माता-पिता की देखभाल, आजीविका की चिंता, बदलती सामाजिक परिस्थितियां और उम्र के साथ आती शारीरिक सीमाएं दाम्पत्य की दुनिया को बदल देती हैं।
यहीं प्रेम का अधिक परिपक्व रूप सामने आता है। जब पत्नी अपने जीवनसाथी की बीमारी में रात-रात भर जागती है, जब पति अपनी पत्नी की थकान को बिना कहे समझ लेता है, जब दोनों अपने निजी सुखों से थोड़ा समझौता करके एक-दूसरे के सपनों को जगह देते हैं, तब निष्ठा किसी धार्मिक शब्द की परिभाषा नहीं रह जाती। वह जीवन का जीवंत अनुभव बन जाती है। वर्षों के साथ चेहरे पर झुर्रियां उतर सकती हैं, बालों की रंगत बदल सकती है और आंखों की चमक मंद पड़ सकती है, लेकिन यदि मन में एक-दूसरे के लिए आदर और अपनापन बचा रहे, तो प्रेम की आभा फीकी नहीं पड़ती। शायद इसी कारण जीवन के उत्तरार्ध में साथ बैठे वृद्ध दंपति का दृश्य किसी नवविवाहित जोड़े से कम सुंदर नहीं होता। उनके प्रेम में आकर्षण की चंचलता भले कम हो गई हो, लेकिन साझा संघर्षों, अनगिनत स्मृतियों और निभाए गए वचनों की गहराई समाई होती है।
करवा चौथ की परंपरा में पत्नी के व्रत और पति की दीर्घायु की कामना को विशेष स्थान प्राप्त है। इस आस्था का सम्मान करते हुए यह समझना भी आवश्यक है कि आधुनिक दाम्पत्य में प्रेम और निष्ठा का आदर्श पारस्परिक होना चाहिए। जिस प्रकार पत्नी अपने जीवनसाथी के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की कामना करती है, उसी प्रकार पति का भी उत्तरदायित्व है कि वह पत्नी के स्वास्थ्य, सम्मान, आकांक्षाओं और स्वतंत्र व्यक्तित्व के प्रति संवेदनशील रहे। किसी रिश्ते में निष्ठा का अर्थ केवल साथ बने रहना नहीं बल्कि एक-दूसरे के आत्म-सम्मान की रक्षा करना भी है। प्रेम का अर्थ अधिकार जताना नहीं, विश्वास देना है; समर्पण का अर्थ स्वयं को मिटा देना नहीं बल्कि दो व्यक्तित्वों के बीच ऐसी साझेदारी बनाना है, जिसमें दोनों को विकसित होने का अवसर मिले। दाम्पत्य की मर्यादा तभी सुरक्षित रहती है, जब उसमें संवाद हो, असहमतियों के लिए जगह हो और कठिन समय में भी अपमान के स्थान पर संवेदना को चुना जाए।
इस दृष्टि से करवा चौथ केवल स्त्री की तपस्या का पर्व नहीं बल्कि पति-पत्नी दोनों के लिए अपने संबंधों को परखने और उन्हें अधिक आत्मीय बनाने का अवसर बन सकता है। एक दिन का व्रत भले पत्नी रखे, लेकिन जीवन भर रिश्ते की गरिमा बनाए रखने का संकल्प दोनों का होना चाहिए। आज का समय रिश्तों के सामने नई चुनौतियां लेकर आया है। तकनीक ने दूर बैठे लोगों को करीब कर दिया है, लेकिन कभी-कभी पास बैठे दो व्यक्तियों के बीच भी अनकही दूरियां पैदा हो जाती हैं। व्यस्त दिनचर्या, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और संवाद की कमी वैवाहिक संबंधों को प्रभावित करती हैं। ऐसे समय में करवा चौथ का सांस्कृतिक संदेश और प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि किसी भी रिश्ते की वास्तविक समृद्धि उसकी बाहरी भव्यता में नहीं बल्कि उसके भीतर बसे विश्वास में होती है। चंद्रमा के दर्शन के समय पति का चेहरा देखने वाली स्त्री की आंखों में केवल अपने सुहाग की लंबी उम्र की आकांक्षा नहीं होती; वहां साझा भविष्य के स्वप्न, बीते वर्षों की स्मृतियां और आने वाले कल के प्रति एक मौन विश्वास भी होता है। उस क्षण में वह अपने जीवनसाथी के साथ बिताए जाने वाले उन अनगिनत दिनों की कामना करती है, जिनमें हंसी हो, संवाद हो, स्वास्थ्य हो और एक-दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ने का साहस हो।
करवा चौथ हमें यही सिखाता है कि चांद की शीतलता को जीवन में उतारना केवल चंद्रदर्शन से संभव नहीं। उसके लिए मन में करुणा, व्यवहार में ईमानदारी और रिश्ते में अटूट विश्वास आवश्यक है। चांद हर महीने घटता-बढ़ता है, फिर पूर्णिमा को अपनी संपूर्ण आभा के साथ लौट आता है। दाम्पत्य में भी कभी उजाला अधिक होता है, कभी अंधेरा घना; किंतु निष्ठा का दीप जलता रहे तो कठिनतम रात्रि भी बीत जाती है। चांद को साक्षी मानकर मांगी गई उम्र की दुआ अपनी जगह है, लेकिन उस उम्र के हर दिन को प्रेम, सम्मान और विश्वास से भर देना ही दाम्पत्य की सच्ची साधना है। करवा चौथ की सार्थकता इसी में है कि छलनी से दिखने वाला चांद केवल एक रात का उत्सव न बने, बल्कि जीवनभर साथ निभाने की प्रतिबद्धता का उज्ज्वल प्रतीक बन जाए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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