कहानी-छूट

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

मानसिक द्वन्द बिलोने की तरह होते हैं जो बेशक व्यक्ति को बुरी तरह से मथ देते हैं लेकिन मक्खन भी इसी प्रक्रिया से निकलता है। मिनी कई दिन तक विचारों का बिलौना करती रही और अंतत: अपने तरीके से निष्कर्ष का मक्खन निकाल ही लिया। एक दिन सुबह नवल ने देखा कि वह अपनी अलमारी खोले कपड़ों को इधर-उधर कर रही है। नवल के भीतर आशंका के नाग ने फन फैलाया लेकिन उसने अपने अहम की केंचुली नहीं उतारी।  
‘यूं अचानक कहां जा रही हो? ना किसी से पूछा, ना किसी को बताया... छूट मिलने का मतलब मनमर्जी करना नहीं होता।’ नवल ने गुस्से से कहा।
‘चुप रहने का मतलब भी डरना नहीं होता।’ मीनू ने एक-एक शब्द को हाईलाइट करते हुए कहा तो नवल अपने कहे की जल्दबाजी पर झेंप गया। उसे तो लगा था कि आज फिर मीनू उसके कनाडा जाने को लेकर क्लेश करेगी। या हो सकता है कि छूट की कोई नई परिभाषा गढ़ लाई हो लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो नवल और माया अनुमान लगा रहे थे। वे उसमें आये परिवर्तन से हैरान भी थे और किंचित भयभीत भी। भयभीत इसलिए कि वे मीनू के अगले कदम की कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे क्योंकि आशा के विपरीत वह तो बिल्कुल शांत लग रही थी। सारे काम भी पहले की तरह ही कर रही थी बल्कि पहले से भी अधिक बेहतर।
कुछ ही दिनों में मीनू के आचरण का यह बदलाव सबको सुखद लगने लगा। सास-बहू के बीच होने वाली तनातनी कम हो रही थी क्योंकि वह उसके साथ किटी पार्टियों और उसकी सहेलियों के घर आने-जाने लगी थी। छोटे से छोटे काम में भी वह माया की सलाह लेने लगी। करती चाहे वह अपनी पसंद से ही थी लेकिन सास से पूछकर उसका स्वाभिमान अवश्य पोषित कर देती थी। दोनों के बीच दोस्ती वाला न सही लेकिन आपसी समझ वाला रिश्ता तो उगने ही लगा था। जहां नवल उसमें आये इस परिवर्तन से हैरान था वहीं माया निश्चिंत.... उसे अब अपनी विरासत सुरक्षित जो लगने लगी थी।
‘कहीं यह इसका कोई छिपा एजेंडा तो नहीं!’ जानने के लिए उसने अपने कनाडा जाने की बात दुबारा छेड़ी। इस पर भी मीनू ने कोई बहस नहीं की बल्कि अपनी खुशी ही जाहिर की तो नवल उलझन में पड़ गया।
‘क्या हो गया है इसे? क्या चल रहा है इसके मन में? कहीं कोई बड़ी साजिश तो नहीं पल रही?’ सोचकर नवल और भी अधिक परेशान हो रहा था जबकि मीनू अब भी वैसी ही शांत थी।
दूसरी तरफ नवल का अकेले कनाडा जाना नाते-रिश्तेदारों में एक नई गॉसिप का जन्मदाता बन गया। जहां भी चार लोग जमा होते, यही चर्चा का मुद्दा होता। अधिकतर लोग यही कहते- ‘एक बार गया तो वापस मुड़कर नहीं आएगा।’ मीनू तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थी लेकिन माया के मन में अवश्य खलबली मचने लगी थी।
‘कहीं लोगों का कहा सच हो गया तो? कहीं इसने वहीं बसने का मन बना लिया तो? बेचारी मीनू कितनी भोली है। इसे पता ही नहीं कि इसके पांवों के नीचे से जमीन भी खिसक सकती है। मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।’ मीनू के बारे में सोचकर माया का मन सहानुभूति से भर उठा। एक स्त्री ही दूसरी स्त्री की दुश्मन होती है जैसे मुहावरे का स्थान अब एक स्त्री ही दूसरी स्त्री के मन को बेहतर समझ सकती है ने ले लिया था। माया ने तय कर लिया कि वह बहू के पाले में रहेगी ना कि बेटे के। 
‘मीनू, तुम कितने दिन विदाउट सैलरी रह सकती हो?’ एक दिन माया ने उससे पूछा।
‘विदाउट पे तो रह सकते हैं लेकिन उसका कोई पुख्ता आधार होना चाहिए जैसे बीमारी या ऐसा ही कुछ।’ मीनू ने उन्हें जानकारी दी।
‘बिना किसी कारण रहना पड़े तो?’ माया ने आगे पूछा।
‘बिना किसी कारण विदाउट पे रहना ही क्यों है? इससे अच्छा तो नौकरी से ब्रेक ही ले लो।’ मीनू ने हंसकर कहा। 
‘तो ठीक है, तू अपनी नौकरी से ब्रेक ले और नवल के साथ कनाडा चली जा। नई-नई शादी है, तुम दोनों को साथ रहना चाहिए। यह समय लौटकर नहीं आएगा।’ माया ने कहा तो मीनू और नवल दोनों आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगे। मीनू खुश थी क्योंकि चाहती तो वह भी यही थी लेकिन वह इस चाहत का नाम उसे मिलने वाली छूट नहीं सुनना चाहती थी। खुश तो नवल भी कम नहीं था। वह भी अपने नवेली दुल्हन से दूरी कहां चाह रहा था।
‘तुम तो बड़ी जादूगरनी निकली... पिछले दिनों पीहर गई थी या काला जादू सीखने? क्या जादू किया है तुमने मां पर... मैं तो लाख कोशिश करके भी तुम्हें साथ ले जाने के लिए उन्हें राजी नहीं कर पाता और तुमने बिना कुछ कहे ही यह कर दिखाया।’ कहते हुए नवल ने उसे नाटकीय अंदाज में सलाम ठोका जैसे कोई बादशाह को ठोकता है। मीनू खिलखिलाने लगी।
‘ऐसा ही कुछ समझो मीनू ने इठलाकर कहा।
‘इन मांओं के पास सचमुच काला जादू सिखाने की कला होती है।’ उसने मन ही मन सोचा और वह दिन याद करने लगी जब उसने नवल के साथ हुई बहस के बाद छूट में मिली देहरी को लांघने का फैसला कर लिया था। 
मां को बताया तो मां ने कहा था- ‘तुम बेशक आ जाओ। यह घर आज भी उतना ही तुम्हारा है जितना विवाह से पहले था लेकिन जरा सोचो, क्या मेरा-तुम्हारा कभी झगड़ा नहीं हुआ? तब तो तुमने कभी घर छोड़ने की बात नहीं की थी। क्योंकि हम खून के रिश्ते से बंधे हैं। नवल और उसके परिवार के साथ तुम्हरा बंधन सामाजिक है। उसे प्रगाढ़ बनने में समय तो लगेगा ना? तुम लोगों का आपस में भरोसा जमते-जमते ही जमेगा। मैदान छोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कही जाएगी।’
‘सांकल और पाजेब के बीच के अंतर को समझना पड़ेगा बेटा। पौधे को नर्सरी से लाकर घर में प्लांट करते हैं तो एक बारगी उसका मुरझाना स्वाभाविक है लेकिन जैसे ही पौधा नई जमीन में अपनी जड़ें जमा लेगा वैसे ही उसकी ग्रोथ होने लगेगी। पति उस पौधे के कमजोर तने को सहारा देने वाली छड़ी का काम करता है और परिजन उर्वरा का। फिर वह पौधा न केवल वृक्ष बनेगा बल्कि फूलों से भी लदेगा और फलों से भी। इसीलिए तो बड़ी-बूढ़ी महिलाएं नववधुओं को फले-फूलने का आशीर्वाद दिया करती थी।’ मां ने समझाया तो मीनू अपने व्यवहार और आचरण पर फिर से विचार करने लगी।
‘मां सही कहती है। विश्वास कोई दही तो है नहीं जो रात भर में जम जाये। मुझे इस रिश्ते को समय देना चाहिए। इस तरह से यदि सभी शादीशुदा जोड़े बात-बात पर घर छोड़ने का मानस बनाने लगेंगे तो कोई घर कभी बस ही नहीं सकेगा।’ मीनू ने उसी पल अपने विचारों को यू टर्न दे दिया था और घर लौट आई थी।
उसके बाद की कहानी तो सबके सामने ही है। इस तरह से इस कहानी की हैप्पी एंडिंग होती है। मिनी भी छूट की सही परिभाषा समझ गई थी। (समाप्त)

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