चीन के साथ पुन: टकराव

1962 में चीन ने सीमांत मामले को लेकर भारत पर हमला किया था। पिछले 64 वर्ष में दोनों देशों के बीच बहुत कुछ घटित हुआ, प्रत्येक स्तर पर सैकड़ों बार आपस में बैठकें भी हुईं, सैकड़ों दोनों देशों के प्रत्येक तरह के प्रतिनिधिमंडलों ने एक-दूसरे के देश के दौरे भी किए, दर्जनों बार दोनों देशों के उच्च नेताओं ने एक दूसरे देश की यात्राएं कीं, ब्रिक्स जैसे संगठनों के दोनों देश सदस्य भी बने रहे और सबसे बड़ी बात दोनों का आपसी व्यापार भी लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी सितम्बर महीने में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने आए थे। वहां के राष्ट्रपति और यहां के प्रधानमंत्रियों की भी अब तक अनेक बार समय-समय पर बैठकें होती रही हैं। चीन ने भारत की हज़ारों किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा किया हुआ है परन्तु इसके बावजूद उसकी लगातार लालसा भारत की सीमाओं के भीतर घुसपैठ करके अधिक से अधिक और क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की रही है।
भारतीय प्रांत अरुणाचल प्रदेश पर वह आज भी अपना दावा पेश कर रहा है। यहां तक कि यदि कोई बड़ा भारतीय नेता वहां की यात्रा करता है तो चीन सरेआम इसकी आलोचना करता है। यहां तक कि उसने अरुणाचल प्रदेश के ज्यादातर क्षेत्रों के अपने तौर पर नाम भी रखे हुए हैं। भूटान की सीमा के निकट दोनों देशों की सेनाएं कई महीनों तक एक-दूसरे के सामने तैनात रही थीं। 15 जून, 2020 को तिब्बत के गलवान में चीनी सैनिकों के साथ हुए टकराव में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। उस समय से ही इस उत्तर-पूर्वी सीमा पर भारी तनाव बना दिखाई देता रहा है। दोनों देशों में सीमांत मामले को लेकर सैन्य अधिकारियों की लगभग 3 दर्जन उच्चस्तरीय बैठकें भी हो चुकी हैं, परन्तु इस सब के बावजूद दोनों देशों में अविश्वास बना रहा है। चीन भारत के कई सीमांत क्षेत्रों पर अपना अधिकार जताता रहा है। दूसरी ओर भारत इन्हें अपना हिस्सा मान कर इन पर अपनी प्रभुसत्ता जताता आया है। भारत का जब किसी पड़ोसी देश से तनाव पैदा होता है तो चीन उसकी प्रत्येक तरह की सहायता के लिए खड़ा हो जाता है। पिछले दशकों में जहां उसकी आर्थिकता मज़बूत हुई है वहीं उसने अपनी सैन्य शक्ति भी बेहद मज़बूत कर ली है। इसकी धौंस वह भारत को ही नहीं, अपितु अपने ज्यादातर छोटे पड़ोसी देशों को भी देता रहता है। 
नि:संदेह उसकी लालच भरी विस्तारवादी नीतियों को रोकना मुश्किल है। अब एक बार फिर चीन अपनी शरारत पर उतर आया है। इसका खुलासा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने किया है। राजस्थान के अलवर में ‘हिमवीर सम्मान समारोह’ में सम्बोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पिछले जुलाई महीने से अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर टकराव पैदा हुआ है, जो अभी तक जारी है। चीन को ‘सबसे मुश्किल सीमा’ और ‘सबसे बड़ा दुश्मन’ बताते हुए उन्होंने कहा कि इस शक्तिशाली हो चुके देश का मुकाबला पारम्परिक तरीकों से नहीं, अपितु सेना को आधुनिक बनाने से ही किया जा सकता है। इसके लिए शक्तिशाली ड्रोन और एंटी ड्रोनों की ज़रूरत होगी। उन्होंने यह भी कहा  कि सीमाओं पर विवाद तब होता है, जब चीनी सैनिक अपने निर्धारित रास्तों को छोड़ कर आगे बढ़ कर गश्त करना शुरू कर देते हैं।
नि:संदेह यह बड़ी चिन्ताजनक स्थिति है, परन्तु आश्चर्यजनक बात यह है कि ऐसा सब कुछ होते हुए भी भारत ने चीन के साथ व्यापक स्तर पर अपने व्यापारिक संबंध जारी रखे हुए हैं। यहीं बस नहीं, इससे ऐसा प्रभाव भी मिलता है, जैसे भारत का इस देश के साथ व्यापार के बिना गुज़ारा नहीं हो सकता। इस वर्ष पहले 9 महीनों में चीन के साथ भारत का व्यापारिक घाटा 100 अरब डॉलर का माना गया है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले में 20 प्रतिशत से भी अधिक है। ऐसा होते हुए भी जिस तरह का रवैया अब तक चीन ने भारत के प्रति धारण किया हुआ है, उसके लिए भारत को भी उसके प्रति अपनी नीतियों में बड़े बदलाव करने की ज़रूरत होगी और यह भी स्पष्ट प्रभाव देना होगा, कि भारत प्रत्येक स्थिति में डोकलाम की घटना की भांति चीन के समक्ष डट कर खड़ा होने की हिम्मत रखता है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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