रंग बदल गये तेरी मौसमी बहार के
आप समझते नहीं, और ज़माना आपके हाथ से निकल कर कहीं दूर जा चुका होता है। मैंने ऐसे बहुत से मीरे कारवां देखे हैं, जो इस बात के गुमां में ही चल बसे कि वह मीरे कारवां हैं, मीरे कारवां थे, और मीरे कारवां रहेंगे। हो सकता है कभी उन्होंने अपने आपको सेवा, ईमानदारी और समर्पण भाव से इस लक्ष्य के लिए समर्पित किया हो, कि अपना और अपने समाज का अन्दर-बाहर बदल देना है क्योंकि दूबे जी से चौबे जी बनने के लिए उन्होंने नई लीक पकड़ने का प्रयास किया हो, कुछ छोड़ा हो, बहुत कुछ नया और अच्छा अपनाया है, परन्तु बहुत जल्दी उन्हें समझ आ गया कि पुराने मेहनत और सबका हो जाने के इरादे से चलोगे तो दूबे जी से ज़ीरो जी हो जाओगे, चौबे जी बनने का बजाय।
परन्तु इस बीच दुनिया के चतुर सुजानों ने एक और चोर रास्ता पकड़ लिया बिना कुछ किये ज़ीरो से हीरो हो जाने का रास्ता। यह कामयाब हो गया और लोग जन-सेवक हो जीवन बलिदन करने की बजाय मीडिया दुलारे हो गये। घर-घर में श्रद्धा से पहचाने जाने की बजाय उनकी दीवार पर टंगी एक ऐसी तस्वीर हो गये, जो लोगों को रंक से राजा या हथेलियों पर सरसों जमाने की प्रेरणा देने लगी।
जनाब प्रश्न तो घर-घर में एक नई तस्वीर बन कर बंट जाने का है। यह आपको अपनी ज़िंदगी में सबका प्रेरक बन जाने की नहीं रही। प्रेरक जो कहलाते थे, उनकी तस्वीर तो उतार कर रद्दी की टोकरी में फेंक दी गई। अब तस्वीरें लगती हैं जो आपको प्रेरणा देती हैं मिट्टी से सोना हो जाने की और वह भी गोगिया पाशा के नये गिली गिली गिली कहने के अन्दाज़ से।
जनाब खुली बात है, आज भी खुल जा सिम-सिम कहने से बन्द गुफायें खुल जाती हैं। फटीचर लोगों के लिए राजसी जीवन के नये अन्दाज़ खुल जाते हैं, लेकिन आपको अपने साथ चालीस चोरों को पटा उनका प्रशस्ति गायन भी रखना पड़ता है। गरीब गुरबा की बेहतरी के लिए अपना जीवन समर्पण कर देने का संकल्प आजकल तेल लेने चला गया है। उसकी जगह ले ली है भाषण देते हुए अपना ढोल पीटने, और अपना गाल बजा कर वोटर के लिए एक स्वप्ना गालीच बिछा देने की सामर्थ्य ने। जितना ही यह गालीचा बड़ा बना सकोगे उतना ही अधिक मरमुक्खे लोग अपने साथ समेट सकोगे। फिर शुरू होगी इन सब राजनीति के नये रंगरूटों की, जो जन्म लेते ही सिपाहसालार हो गये, और आजकल अपने रास्ते की कामयाबी तयशुदा गारण्टी के साथ बेच रहे हैं।
माफ कीजिये हमें शायरों के यह दिलजले नखरे सिद्ध करने की कोई बीमारी नहीं कि ‘हम तो मेले में लुट गये यारो और तमाशबीन दुकानें सजा कर बैठ गये।’
हमें ऐसे बाज़ार उखाड़ने की कोई इच्छा नहीं, बल्कि इच्छा तो यह है कि किसी तरह इस बाज़ार में हमारी दुकानें भी लग जाएं। हमने भी अपनी जो दुकान सजायी है वह पूरी तरह कामयाब हो जाये। याद है न पहले शराफत की दुकानें सजाने का एक गौरव होता था, कामयाबी का अपूर्व इतिहास होता था, लेकिन आजकल तो इसकी असली दुकान हो जाने का दावा करना ही पर्याप्त हुआ। कभी भारत में एक गांधी हुए थे जो दुनिया को अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए बलिदान का संदेश दे गये। फिर सरहदी गांधी हुए जो ईमानदारी से उनकी राह पर चलने का प्रयास करते रहे, परन्तु अब तो घर-घर स्वघोषित गांधी हैं, जो नाम लेते हैं सेवा, समर्पण और अहिंसा दर्शन के प्रेरक गांधी का, और मौलिक हो जाने के फेरे में नये अर्थ तलाशते हैं नाथू राम गोडसे के कृत्य के। जीवन में कामयाबी का झंडा खलनायक चढ़ा रहे हैं, और नायक मार्ग दर्शक मण्डल में चले गये हैं। मार्ग दर्शक मण्डल में रह कर भी वह एक हारे हुए उच्छवास के साथ अपने चरण वन्दना के नये रंगरूट तलाशने के वास्ते तत्पर हो जाते हैं।
लेकिन याद रखिये यहां तो चरण वन्दना के पैमाने बदल गये हैं। निजीकरण का सैलाब आ गया है। सरकारी क्षेत्र एक सुविधाजनक लेबल बन कर रह गया। अब निजीकरण के शाहसवार ही सूत्रधार हैं। वे अपने चयनित लोगों के लिए राजनीति में, समाज में सफलता का क्षेत्र हमवार करते हैं। नये खून को प्रवेश देने के नाम पर जान लड़ा देने वाले। खेल से बाहर कर दिये गये। नये युग के ध्वजवाहक सामने आ गये। जो अपने कन्धों पर अपना इतिहास लेखक अपना अम्पायर लाद कर साथ लाये हैं। उनके बगलगीर हैं, चन्द मीडियावीर जो अखबारों को उनकी तस्वीरों का एलबम सजा रहे हैं, लेकिन फिर भी पेड पत्रकारिता के विरुद्ध झंडा बुलंद करते हैं। गोद में बैठ कर पत्रकारिता का गोदी मीडिया हो जाना एक स्वागत योग्य आशीर्वाद बन गया है।

