बयानबाज़ी की मर्यादा

देश के राजनीतिक मंच पर जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है, वह चिंता पैदा करने वाला है। कई प्रकार की हो रही कार्रवाईयों के अलावा छोटे-बड़े नेताओं द्वारा अपने विरोधियों के खिलाफ कई बार इस तरह की बयानबाज़ी की जाने लगी है, जो मर्यादा की हद पार कर जाती है। लोकतंत्र में आपसी विचारधारक विरोध होना स्वाभाविक है परन्तु यदि ऐसे विरोध ऩफरत और दुश्मनी में बदलता दिखाई दे तो वह पूरे प्रबंध के लिए घातक साबित हो सकता है। निचले स्तर पर तो बहुत बार ऐसा कुछ दिखाई देता है परन्तु यदि यह ऊपरी स्तर तक पहुंच जाए और ऐसे दृश्य अक्सर देखने को मिलने लग जाएं तो यह पूरे राजनीतिक प्रबंध के लिए नुकसानदायक साबित नहीं होंगे, बल्कि समूचे ताने-बाने पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष रूप में देखा जाने लगेगा। इस संबंधी बड़े विवाद उस समय भी पैदा होता है, जब बड़े नेता मर्यादा से बाहर हो जाते हैं। ऐसा कुछ लगभग सभी पार्टियों के बड़े-छोटे नेताओं द्वारा किया जाता रहा है।
पिछले लम्बे समय से ‘वोट चोरी’ के मामले पर जिस कद्र बहुत बार आपे से बाहर होते बड़े कांग्रेसी नेता राहुल गांधी द्वारा बयानबाज़ी की जाती रही है, वह कई बार मर्यादा से बाहर जाती दिखाई तो देती ही है परन्तु उससे उनके अंदर पैदा हो रही बौखलाहट का भी भली-भांति पता चल जाता है। पिछले लगभग 12 वर्ष से कांग्रेस को पार्टी के तौर पर बड़ी ऐसी राजनीतिक हार का मुंह देखना पड़ा है, जिसकी उनको उम्मीद नहीं थी, जिस कारण वह हर प्रयास अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए जल्दबाज़ी में दिखाई देते हैं, परन्तु जिस तरह का व्यवहार बड़े कांग्रेसी नेताओं ने धारण कर लिया है, उससे उनको कोई बड़ी प्राप्ति न होती दिखाई देने के साथ उनकी निराशा सिर चढ़ कर बोलती नज़र आ रही है। इसी कड़ी में मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा दिखाई गई बौखलाहट को देखा जा सकता है। खड़गे पार्टी के बड़े नेता ही नहीं, अपितु उन्हें परिपक्व और समझदार नेता भी माना जाता है, परन्तु इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि कई बार वह आपे से बाहर होकर ब्यानबाज़ी करते दिखाई देते हैं। 
पिछले दिनों बिहार की राजधानी पटना में एक समारोह में सम्बोधित करते हुए जब उन्होंने कहा कि कांग्रेस एस.आई.आर. प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों में शामिल लोगों को जेलों में भेजेगी तो सभा में मौजूद एक व्यक्ति ने कहा कि मोदी अभी नहीं जाएंगे। इस पर खड़गे ने तिलमिला कर मंच से तीन बार यह कहा कि ‘मोदी ही नहीं उसका बाप भी जाएगा’। देश के प्रधानमंत्री के स्वर्गीय पिता संबंधी इस्तेमाल की गई ऐसी शब्दावली किसी भी तरह शोभनीय नहीं कही जा सकती। इसके साथ जहां राजनीतिक पार्टियों के भीतर कड़वाहट बढ़ती है, वहीं निम्न स्तर तक भी ऐसा माहौल पैदा हो जाता है। इस संबंध में बड़े भाजपा नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तो कहा है कि जब किसी पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता ही भाषा की मर्यादा भूल जाता है तो उसके कार्यकर्ताओं से किस तरह सलीके की उम्मीद की जा सकती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध करें, नीतियों पर सवाल उठाएं, सरकार की आलोचना करें, परन्तु व्यक्तिगत मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए।  
नि:संदेह राजनीतिक पार्टियों के छोटे-बड़े नेताओं द्वारा ऐसी बयानबाज़ी देश के माहौल को और गंदा करने में सहायक हो सकती है, जिससे सभी पार्टियों को सचेत होने की ज़रूरत होगी। पंजाब में भी पिछले कुछ समय से एक-दूसरे के खिलाफ निजी कड़वाहट पैदा करने वाली की जा रही बयानबाज़ी ने माहौल में पहले ही बेहद भड़काहट पैदा की हुई है और अब जब चुनाव निकट आ रहे हैं तो ऐसी भड़काहट राज्य के लिए और भी नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। हम सभी बड़े-छोटे नेताओं को इस पक्ष से एक स्तर पर रह कर बयानबाज़ी तथा क्रियान्वयन की अपील करते हैं, ताकि चुनाव के समय माहौल को और खराब होने से बचाया जा सके। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द 

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