विमानन कम्पनियों को लूट की छूट क्यों ? 

कमाल की बात है कि एक हफ्ते पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह विमानों का किराया तय करने के नियम बना रही है और जल्दी ही उसे अधिसूचित किया जाएगा। असल में सुप्रीम कोर्ट ने कई अवसरों पर विमानों के बढ़ते किराए को लेकर चिंता जताई थी। इसीलिए जब सरकार ने कहा कि वह किराए को विनियमित करने के लिए नए नियम ला रही है, जिनसे आम लोगों को राहत मिले, लेकिन अब सरकार ने यह नियम बनाया है कि वह विमानों का किराया तय नहीं करेगी, बल्कि विमानन कम्पनियां अपने हिसाब से मांग और आपूर्ति को देखते हुए किराया तय करेंगी। सरकार ने जो कथित नियम बनाए हैं उनमें कहा है कि प्राकृतिक या किसी अन्य आपात स्थिति में ही सरकार किराया नियमित करेगी। हालांकि उसमें भी सरकार कुछ नहीं कर पाती है। पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले से लेकर महाकुंभ के आयोजन तक यह दिखा कि सरकार के निर्देश के बावजूद कम्पनियों ने कई गुना ज्यादा किराया वसूल किया। सरकार ने अपनी नीतियों के कारण दो कम्पनियों का एकाधिकार बनाया है। पिछले एक साल में घरेलू उड़ानों में 35 से लेकर 115 फीसदी तक किराया बढ़ा है और सरकार कुछ नहीं कर पाई है।
सर्जियो गोर क्या वायसराय हैं?
जब सर्जियो गोर भारत में अमरीका के राजदूत बन कर आए थे तो उन्हें लेकर देश के सत्ता प्रतिष्ठान में बडे उत्साह का माहौल था। वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी हैं और उन्होंने ट्रम्प के चुनाव अभियान में बहुत सक्रिय हिस्सेदारी की थी। माना जा रहा था कि गोर को भारत का राजदूत नियुक्त करने से दोनों देशों के संबंधों में और ज्यादा गरमाहट आएगी, लेकिन हुआ इसके विपरीत। गोर के राजदूत बनने के बाद भारत और अमरीका के संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं। ट्रम्प लगातार भारत को निशाना बना रहे हैं और अपने देश में भारतवंशियों को भी परेशान कर रहे हैं। इस बीच गोर को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। विपक्ष के कई नेता और विपक्ष के इकोसिस्टम के इन्फ्लूएंसर गोर को ‘वायसराय गोर’ कहने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि भारत पर ब्रिटिश शासन के समय वायसराय ही देश पर राज करते थे। वे राजा की तरह पूरे देश में घूमते थे। गोर भी उसी तरह देश भर में घूम रहे हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश का भी दौरा किया है। पिछले दिनों वे अमृतसर पहुंचे थे। वहां बड़ी संख्या सिख संगत के लोगों ने उनका स्वागत किया। उनके स्वागत के दौरान भारत विरोधी नारे लगे। ‘खालिस्तान जिदाबाद’ का नारा भी लगाया गया। पता नहीं क्यों भारत की ओर से आधिकारिक रूप से इसका विरोध नहीं दर्ज कराया गया।
बंगाल में पुस्तक संस्कृति पर हमले
भाजपा को जब ममता बनर्जी बाहरी बता रही थी और बांग्ला संस्कृति के लिए खतरा बता कर प्रचार कर रही थी, तब भाजपा ने दावा किया था कि वह बांग्ला संस्कृति पर आंच नहीं आने देगी। लेकिन सरकार बनने के बाद ऐसा लग रहा है कि बंगाली लोगों के खान-पान के बाद अब उनकी पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर हमले हो रहे हैं। वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस के समय जो राजनीतिक संस्कृति बनी थी, वह नहीं बदली है। अब भी पहले की तरह ही विपक्षी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन पर और उनके घरों पर हमले हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल की यह संस्कृति रही है कि दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों के बाहर और जगह-जगह पर किताबों की दुकानें लगाई जाती हैं। राजनीतिक दल भी किताबों के स्टॉल लगाते हैं। लोग किताबें खरीदते हैं। यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन जाधवपुर यूनिवर्सिटी के बाहर से लेकर दूसरे कई हिस्सों में सीपीएम के बुक स्टॉलों पर हमले हुए हैं। कुछ दिन पहले लोगों ने देखा ही है कि कैसे दुर्गा पूजा के दौरान मांस-मछली नहीं खाने की अपील कराई गई। जब इस पर विवाद हुआ तो भाजपा के नेता मंदिरों में बैठ कर मछली खाते दिखाई दिए।
एनडीए को एक-एक सीट की चिंता
भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को लोकसभा की एक-एक सीट की चिंता है। इसलिए कई सांसदों पर अनुशानहीनता के आरोप लगने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही है। पिछले दो साल से पश्चिम बंगाल की बशीरहाट लोकसभा सीट खाली है। इस साल मई में खाली हुई असम की नगांव सीट पर चुनाव आयोग ने उप-चुनाव करवा लिया है, लेकिन बशीरहाट सीट खाली रखी गई है। इसका एकमात्र कारण यह है कि मुस्लिम बहुल इस सीट पर उप-चुनाव हुआ तो भाजपा नहीं जीत पाएगी। इसलिए आयोग चुनाव ही नहीं करा रहा है। इसके बावजूद चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले कठघरे में खड़े किए जा रहे हैं। बहरहाल, बिहार में जनता दल (यू) के कई सांसद बागी हो गए हैं। बांका के सांसद गिरधारी यादव ने अपने बेटे को एनडीए के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ाया था। संसद में भी वह सरकार की लाइन से अलग बोलते हैं, लेकिन उनके खिलाफ  कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। ऐसे ही भागलपुर के सांसद अजय मंडल अपने प्रतिद्वंद्वी शैलेश कुमार उर्फ  बुलो मंडल को राज्य सरकार में मंत्री बनाए जाने से नाराज़ हैं और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। तीसरी सांसद लवली आनंद के पति आनंद मोहन और मधेपुरा के सांसद दिनेशचंद्र यादव भी पार्टी से उलट कामकाज कर रहे हैंक लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही, क्योंकि इस समय एनडीए एक भी सांसद गंवाने की जोखिम नहीं ले सकता।
भाजपा में खत्म हो रहा अनुशासन 
भाजपा में अभी जो स्थिति है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व को चुनौती नहीं दे सकता है। यह भी दूर की कौड़ी है कि मोदी और शाह में अनबन है, जिसकी वजह से मंत्रिपरिषद में फेरबदल टल रहा है। हो सकता है कि मोदी और शाह में कुछ मुद्दों पर असहमति हो, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इस वजह से मंत्रिमंडल में फेरबदल नहीं हो रहा है या शाह के करीबी नेताओं की मंत्रिमंडल से छुट्टी हो जाएगी। वैसे राजनीति में कभी भी और कुछ भी संभव है।
 बहरहाल केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन का इस्तीफा हो गया और कहा जा रहा है कि कई मंत्रियों को इस्तीफे के लिए कहा गया है, लेकिन वे इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। कथित तौर पर कई मंत्रियों ने कहा है कि अगर हटाना है तो प्रधानमंत्री खुद ही उन्हें सरकार से हटा दें। अगर ऐसा है तो यह भाजपा की पिछले 12 साल की राजनीति में नई चीज़ है। इन्हीं अटकलों के बीच भाजपा के अंदर की खींचतान सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की आठ सीटों पर जिस तरह बिल्कुल नए व गुमनाम से चेहरे तय किए गए, उससे पार्टी के कई नेता नाराज़ है। दो बार सांसद रहे और उत्तर प्रदेश में भाजपा का बड़ा दलित चेहरा रहे धर्मेंद्र कश्यप समाजवादी पार्टी मे शामिल हो रहे हैं। ऐसे ही पिछले दिनों ओडिशा के पुराने नेता और केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव ने बिना नाम लिए पार्टी के कई नेताओं पर अपने खिलाफ  साज़िश रचने का आरोप लगाया। 

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