पर्यावरण में बढ़ता गर्मी का प्रभाव
पूरे विश्व में गर्मी का भीषण प्रकोप एक बार फिर ऊपर की ओर बढ़ा है। यूं, यह क्रम विगत लगभग डेढ़-दो दशक से चल रहा है। यूरोपीय देश इस गर्मी का अधिक शिकार हो रहे हैं जबकि भारत में भी गर्मी की विकरालता ने पूरे देश को चेताया और चौंकाया है। विश्व के बड़े मौसम वैज्ञानिक वर्षों से इस बढ़ती गर्मी के संबंध में चेतावनियां जारी करते आ रहे हैं, किन्तु आज तक इस संबंध में न तो किसी देश का प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हुआ है, न वैश्विक धरातल पर जन-संगठनों अथवा संस्थाओं ने ही कोई विशेष भूमिका निभाने का यत्न किया है। नि:संदेह इस स्थिति के लिए विश्व के प्राय: सभी देश किसी न किसी सीमा तक उत्तरदायी हैं, तथापि योरुप और पश्चिमी देशों के क्रिया-कलाप और उनकी कार्य-प्रणाली पर अधिक उंगलियां उठी हैं। नि:संदेह विश्व में मौजूदा चरण पर विकास और उन्नति के पथ पर तकनीकी उपकरणों और आधुनिक आविष्कारों के कारण कार्बन सहित अनेक गैसों और ग्रीन गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है। इस कारण धरती और आकाश के बीच बढ़ती गर्मी के कारण ओज़ोन की परत विशेष तौर पर प्रभावित हुई है जिस कारण मौसमों की गतिशीलता और उनका परिवर्तन-क्रम परिवर्तित होने लगा।
चालू वर्ष में जून से अगस्त के बीच पूरी धरती पर गर्मी का भीषण प्रकोप देखा गया। मौसम विशेषज्ञों द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार इस बढ़ती गर्मी के कारण जलवायु परिवर्तन की गतिशीलता भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। गर्मी का प्रकोप बढ़ने से विश्व भर के देशों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति तीव्र हुई है। इससे झीलों, नदियों और सागरों में पानी का स्तर बढ़ा है। इस कारण एक ओर जहां नदियों में बाढ़ का खतरा बढ़ा है, वहीं समुद्रों के किनारे बसे शहरों के अनेक हिस्से डूब जाने अथवा पानी में गर्क हो जाने की आशंका है। इससे झीलों में भी पानी का स्तर बढ़ा है। झीलों का आकार बढ़ने से उनके किनारों पर टूटन का खतरा उपजा है। ये झीलें यदि कभी टूटती हैं, तो इससे जन-धन सम्पत्तियों की भारी हानि होने की आशंका है।
मौजूदा हीट-वेव को जांचने के लिए वैज्ञानिकों ने यूरोप के 854 शहरों का सर्वेक्षण किया तो बड़े एवं पर्यावरणीय चिन्ताजनक आंकड़े सामने आए। इन आंकड़ों के अनुसार इस काल के दौरान योरुप में 50,391 लोगों की मौत इस हीट-वेव के कारण हुई। इनमें से 32,619 मौतें वातावरणीय बदलाव प्रदूषण के कारण हुईं अर्थात ये लोग बढ़ती गर्मी के प्रकोप को सहन नहीं कर पाये। बढ़ती गर्मी के आलम का पता इस बात से भी चल जाता है कि मौतों का यह प्रतिशत 2020 के आंकड़ों से 71 प्रतिशत अधिक है। इस कारण कई देशों में रेड हीट वेव अलर्ट जारी किये गये। इससे यह अनुमान भी सहज रूप से लगाया जाता है कि वातावरण में सूर्य-ऊर्जा का तापमान भी बढ़ा है और धरती से उपजने वाली कार्बन गैसों का प्रभाव भी निरन्तर तीव्रता से बढ़ रहा है। योरुपीय देश फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इटली में गर्मी का प्रकोप सर्वाधिक महसूस किया गया है। इसी वर्ष जून और जुलाई के आखिरी सप्ताहांत के बीच गर्मी अत्यधिक रही। भारत के केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस वातावरण के संबंध में चेताते हुए कहा है कि योरुप शेष विश्व से आठ गुणा अधिक कार्बन गैसों का उत्सर्जन करके वातावरणीय परिवर्तनों को प्रभावित करता है। इस कारण वर्षा का क्रम कम और अस्थिर होने लगता है, किन्तु बादलों के फटने और बाढ़ों का खतरा बढ़ जाता है। निष्कर्ष- स्वरूप कहना चाहें, तो पूरे विश्व के देशों ने पिछले वर्ष 2025 में 58.4 अरब टन ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन किया। इस दौरान कोयला, जीवाश्म ईंधन, तेल और कई प्रकार की गैसों के उपयोग से कार्बन-उत्सर्जन की मात्रा निरन्तर बढ़ती चली गई।
पिछले वर्ष विश्व के बड़े देशों ने तापमान को वापिस 1.5 डिग्री तक लाने की घोषणा की थी, किन्तु यह घोषणा सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रही। वैज्ञानिकों के अनुसार हालांकि स्थितियों में निकट भविष्य में सुधार होने की कोई बड़ी सम्भावना दिखाई नहीं देती, किन्तु यदि ये वायदे और दावे पूरे भी हो जाते हैं, तो भी निकट भविष्य में स्थितियों में सुधार आने की कोई बड़ी सम्भावना दिखाई नहीं देती। इन विशेषज्ञों के अनुसार इस बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं, धान और मक्का के उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है। नि:संदेह यह स्थिति किसी भी सूरत मानव और मानवता के हित में नहीं है। इसे किसी भी तरह से नियंत्रण में लाये जाने की बेहद आवश्यकता है। इस हेतु तेल, कोयला, गैस और अन्य जीवाश्म स्रोतों पर अंकुश लगाया जाना बहुत ज़रूरी है। अब तक की स्थितियों के अनुसार पश्चिम देश, स्वयं योरुप और कुछ बड़े देश इस हेतु अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं। उन्हें जवाबदेही के धरातल पर लाया जाना होगा। भारत में भी इस हेतु तात्कालिक उपाय किये जाने की बड़ी ज़रूरत है। ये उपाय जितनी जल्दी किये जाएंगे, उतना ही अच्छा होगा।

