पाकिस्तान की पैरवी से कश्मीर का भला कैसे होगा ?

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में फारूक अब्दुल्ला लंबे समय से प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। नेशनल कांफ्रैंस के अध्यक्ष और तीन बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके फारूक अब्दुल्ला के राजनीतिक बयानों का असर केवल प्रदेश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति और भारत-पाकिस्तान संबंधों पर भी पड़ता है। उनके बेटे उमर अब्दुल्ला इस समय जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में फारूक अब्दुल्ला का हर बयान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है। हाल ही में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा उठाता है, इसलिए कश्मीर के लोग बचे हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली से न्याय की उम्मीद नहीं है और दिल्ली के दबाव के कारण दुनिया चुप है। उनके इस बयान ने एक बार फिर राष्ट्रीय हितों, कश्मीर की पहचान और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर बहस छेड़ दी है।
सवाल यह है कि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठाने से कश्मीर के लोगों का अस्तित्व कैसे सुरक्षित रहता है? क्या पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय बयानबाजी कश्मीरियों की सुरक्षा, रोज़गार, शिक्षा और विकास की गारंटी है? पाकिस्तान दशकों से कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है लेकिन सीमापार आतंकवाद, घुसपैठ और हिंसा की घटनाओं ने जम्मू-कश्मीर के सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुंचाई है। ऐसे में पाकिस्तान की पैरवी को कश्मीरियों के बचे रहने का आधार बताना तर्कसंगत नहीं लगता। फारूक अब्दुल्ला को स्पष्ट करना चाहिए कि उनके बयान का वास्तविक आशय क्या है और वे किस आधार पर पाकिस्तान की भूमिका को इतना महत्वपूर्ण मानते हैं।
फारूक अब्दुल्ला के विवादित बयान कोई नई बात नहीं हैं। नवंबर 2017 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को लेकर उन्होंने कहा था कि वह पाकिस्तान के पास है और युद्ध करने से भी स्थिति नहीं बदलेगी। इसी दौरान उन्होंने पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और उसके परमाणु हथियारों का उल्लेख करते हुए भी बयान दिया था। इन टिप्पणियों पर देशभर में राजनीतिक विवाद हुआ। आलोचकों ने आरोप लगाया कि ऐसे बयान पाकिस्तान के पक्ष को मजबूती देते हैं। दूसरी ओर, फारूक अब्दुल्ला ने अपने रुख को वास्तविक परिस्थितियों को स्वीकार करने और युद्ध के बजाय शांति का रास्ता अपनाने की ज़रूरत से जोड़कर प्रस्तुत किया। यहां यह समझना ज़रूरी है कि शांति की वकालत करना और पाकिस्तान के दावों को स्वीकार करने का संकेत देना दो अलग-अलग बातें हैं।
जुलाई 2017 में कश्मीर विवाद के समाधान के लिए अमरीका और चीन जैसे देशों की भूमिका पर चर्चा करने संबंधी उनके बयान ने भी राजनीतिक बहस को जन्म दिया था। भारत का आधिकारिक रुख रहा है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दे भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाए जाने चाहिएं ऐसे में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता का सुझाव भारतीय कूटनीतिक नीति से अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। किसी भी लोकतंत्र में सरकार की विदेश नीति की आलोचना करना गलत नहीं है लेकिन राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े विषयों पर बयान देते समय तथ्यों और संवैधानिक स्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है।
अप्रैल 2017 में कश्मीर में पत्थरबाजी करने वाले युवाओं को लेकर फारूक अब्दुल्ला के बयान भी विवाद का विषय बने थे। उन्होंने युवाओं की नाराज़गी और उनकी शिकायतों को समझने की ज़रूरत पर जोर दिया था। निश्चित रूप से युवाओं की समस्याओं को सुनना और उनके भविष्य के लिए अवसर उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। बेरोज़गारी, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर गंभीरता से काम होना चाहिए लेकिन युवाओं की समस्याओं को समझने और हिंसक गतिविधियों को उचित ठहराने के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है। राजनीतिक नेतृत्व का दायित्व युवाओं को हिंसा से दूर करके लोकतांत्रिक रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है। फारूक अब्दुल्ला ने हालिया बयान में कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने कभी भारतीय होने से इन्कार नहीं किया और उनका भारत से जुड़ाव महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा मौलाना आजाद के समय से रहा है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सत्ता के लिए हिंदू-मुसलमान को आमने-सामने किया गया। सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना देश के प्रत्येक राजनीतिक दल की जिम्मेदारी है लेकिन किसी भी नेता को धार्मिक आधार पर राजनीति के आरोप लगाने से पहले अपने राजनीतिक कार्यकाल व अपनी पार्टी की भूमिका पर भी आत्ममंथन करना चाहिए। कश्मीर की पहचान किसी एक धर्म, दल या नेता तक सीमित नहीं है। इसमें कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, आतंकवाद से प्रभावित परिवारों की पीड़ा, सीमावर्ती नागरिकों की कठिनाइयां और सभी समुदायों की आकांक्षाएं शामिल हैं।
फारूक अब्दुल्ला के बयानों की आलोचना करते समय उनके राजनीतिक विचारों और उनके समुदाय के प्रति भावनाओं को एक ही नजरिये से देखना भी उचित नहीं होगा। किसी नेता की मंशा पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने के बजाय उसके सार्वजनिक बयानों, नीतियों और उनके प्रभावों का तथ्यात्मक विश्लेषण होना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर जिम्मेदार भाषा का प्रयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का समाधान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा। केन्द्र सरकार को नागरिकों की शिकायतों का निष्पक्ष समाधान करना चाहिए, रोज़गार के अवसर बढ़ाने चाहिए और विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना चाहिए। प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व को भी जनता के प्रति अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। युवाओं को शिक्षा, कौशल विकास, खेल और उद्यमिता से जोड़ना चाहिए, ताकि वे हिंसा तथा कट्टरता के प्रभाव से दूर रह सकें। आतंकवाद और सीमापार से होने वाली हिंसा के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
फारूक अब्दुल्ला जैसे अनुभवी नेता से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शब्दों के दूरगामी प्रभाव पर विचार करें। यदि उन्हें केंद्र सरकार की नीतियों से शिकायत है तो वे प्रमाणों और तथ्यों के साथ अपनी बात रखें। पाकिस्तान की भूमिका पर चर्चा करते समय उसके दावों के साथ उसके व्यवहार और कश्मीर के लोगों पर पड़े प्रभावों का भी निष्पक्ष आकलन होना चाहिए। पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा उठाता है, इसलिए कश्मीर के लोग बचे हुए हैं, इस दावे का औचित्य स्पष्ट करना उनकी जिम्मेदारी है।

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